पुस्तक: संघ कार्यपध्दति का विकास




प्रस्तावना :

नागपुर के एक वरिष्ठ संघ कार्यकर्ता माननीय श्री बापूराव वन्हाडपांडे द्वारा लिखित, 'संघ कार्यपध्दति का विकास' नामक यह पुस्तक जैसे उद्बोधक है, वैसे ही वह रोचक भी है। नये स्वयंसेवकों को संघ के विस्तारित स्वरूप, असंख्य उच्च विद्या विभूषित कार्यकर्ता गण, सम्पन्न अधिकारी वर्ग, संघ कार्यार्थ अपना सारा जीवन समर्पित करने वाले हजारों संघ-प्रचारक, सब प्रकार की सुविधाओं से युक्त कार्यालय, और चारों ओर 'संघ' के नाम का दबदबा ही अनुभव में आता और दिखाई देता है। यह सही है कि, विगत 70 वर्षों की लगातार साधना के फल स्वरूप ही संघ आज एक विशाल वट वृक्ष की भांति खड़ा हुआ दिखाई देता है। उसकी जड़ें भी इतनी रसमय हैं कि उसकी अनेक शाखाएं भी वट वृक्ष की तरह फलती-फलती दिखाई देने लगी हैं। किंतु मूल रूप में संघ कैसा था, उसका बीजारोपण कैसे हुए, जलसिंचन कैसे हुआ, उसकी देखभाल, संवर्धन किस तरह से किया गया- आदि बातों की सम्यक जानकारी नये स्वयंसेवकों को नहीं होती। वही जानकारी इस पुस्तक में मा. बापूराव ने देने का प्रयास किया है और वह भी अत्यंत सुबोध-सरल भाषा में होने से, सभी स्वयंसेवकों के लिए पठनीय बन गयी है।  
संघ संस्थापक डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने हर बात किय तरह सुनियोजित ढंग से की, इसकी जानकारी तो आप को इस पुस्तक में मिलेगी ही किंतु वह करते समय अपने सहयोगियों पर उसे लादा जा रहा है, इसका अभ्यास भी उन्होंने कभी किसी को नहीं होने दिया। डॉक्टरजी की कार्यशैली की इस विशेषता की ओर सभी कार्यकर्ताओं को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। डॉक्टरजी ने 12-14 वर्ष आयु के किशोरों को साथ लेकर संघर्ष शुरु किया किन्तु उस समय उसका नाम भी उन्होंने निश्चित नहीं किया था। संगठन का नाम क्या रखा जाए, इस संबंध में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ विचार-विनिमय किया। किसी ने 'शिवाजी संघ' नाम सुझाया तो किसी ने 'जरीपटका मंडल' और किसी ने 'हिन्दू स्वंयसेवक संघ' नाम सुझाया किन्तु अन्त में नाम निश्चित हुआ- ''राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ''। यह नाम डाक्टरजी के मन में अवश्य रहा होगा किन्प्तु इसके निर्धारण में सभी को चर्चा-विचार विनिमय का अवसर उपलब्ध कराया गया, और इस तरह वह नाम सुनिश्चित किया गया। प्रार्थना के सम्बंध में भी यही बात हुई। आज अखिल हिन्दुस्तान में कही जाने वाली प्रार्थना भी, संघ की स्थापना के 15 वर्षों बाद तैयार की गई। प्रथम 15 वर्षों तक एक श्लोक मराठी में और एक श्लोक हिंदी में- ऐसे दो श्लोक मिलाकर प्रार्थना की जाती थी। पंजाब, बंगाल, मद्रास, महाकोशल, उत्तार प्रदेश जैसे गैर-मराठी प्रदेशों में संघ का कार्य 1937 से ही प्रारंभ हो चुका था और वहां के स्वयंसेवक भी यही मराठी-हिंदी प्रार्थना ही कहते थे। उस प्रार्थना को हिंदी श्लोक में एक पंक्ति मूलतया इस प्रकार की थी, 'शीघ्र सारे दुर्गुणों से मुक्त हमको कीजिए'- इसमें जो नकारात्मक, निराशा का भाव है, वह डॉक्टरजी को पसंद नहीं आया। अत: उन्होंने उस पंक्ति को बदलकर उसे स्थान पर- शीघ्र सारे सद्गुणों को पूर्ण हिंदू कीजिए' यह पंक्ति स्वीकार की। दुगुणों के अभाव का अर्थ सद्गुणों का सदभाव तो नहीं होता। इससे यही स्पष्ट होता है कि डॉक्टरजी का मौलिक सिचन्तन कितना सूक्ष्म और मूलग्राही होता था। संघ द्वारा स्वीकृत उत्सवों के सम्बन्ध में भी इसी मौलिक चिंतन का साक्षात्कार होता है। संघ ने किसी भी व्यक्ति को अपना गुरु नहीं माना है। वस्तुत: हिंदू समाज में यह 'गुरु परंपरा' हजारों वर्षों से चली आ रही है। डॉक्टरजी भी उसी परंपरा का अनुकरण कर स्वयं गुरु स्थान पर आरुढ़ होते तो इसके लिए न तो उन दिनों और न आज भी कोई उन्हें दोष देता। अपने नाम की जयजयकार सुनकर भला किसका मन प्रफल्लित नहीं होता? किंतु डॉक्टरजी 'अलोक सामान्य' पुरुष थे। उन्होंने कहा, संघ में कोई भी व्यक्ति गुरु नहीं रहेगा- परम पवित्र भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है। किन्तु उन्हें इस बात का भी ज्ञान था कि सामान्य जनों के समक्ष कोई न कोई आदर्श पुरुष का रहना आवश्यक है और वह भी सामान्य व्यक्तियों में, असामान्य कर्तृत्व क्षमतावाला गुण सम्पन्न व्यक्ति हो, ऐतिहासिक हो। अत: इस संबंध में काफी विचारपूर्वक, सबके साथ चर्चा करके डॉक्टरजी ने छत्रपति शिवाजी महाराज को ही संघ का आदर्श महापुरुष घोषित किया। फिर इस महापुरुष की स्मृति में कौनसा उत्सव मनाया जाए- जन्मदिवस या पुण्यतिथि का? इस पर चर्चा की गई और इस चर्चा में पुन: डॉक्टरजी की 'लोक-विलक्षणता' प्रकट हुई। उन्होंने शिवाजी के जीवन का गौरव-प्रसंग- 'शिवराज्याभिषेक' को ही इस उत्सव के निमित्ता चुना और इसे 'हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव' का नाम दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने असामान्य कर्तृत्व से यह दिन लाया, इसीलिए तो उनके जन्मदिन और पुण्यतिथ का महत्व है। अन्यथा, ऐसा कौन है, जो मरने के बाद जन्म नही लेता अथवा जन्म लेने के बाद मरता नहीं? हमारे सामने आदर्श विजय का होना चाहिए। इसलिए संघ में विजयदशमी की भांति शिवराज्याभिषेक का भी वही महत्व है। 
संघ की कार्यपध्दति की अनेक अन्यन्यसाधारण विशेषताएं हैं। दैनंदिन शाखा तो संघ का मानों प्राणभूत तत्व है। इन शाखाओं के कार्यक्रमों, में परिवर्तन होते गए, आदेशों की भाषा भी बदली किंतु मूल तत्व बना रहा। अनेक लोगों ने संघशाखा की नकल करने का प्रयास किया किन्तु वे असफल रहे, वह संभव भी नहीं है। जब तक डॉक्टर हेडगेवार जैसा संघ की शाखाओं के लिए अपने वैयक्तिक जीवन की आहुति चढ़ानेवाला, जब तक सारे प्रलोभनों, मोह आदि का यहां तक कि स्वयं की कीर्ति का लोभ भी- जैसा कि आंग्ल कवि मिल्टन ने महान व्यक्तियों की दुर्बलता के रूप में कीर्ति का बखान किया है (That last infirmity of noble mind)- छोड़कर स्वयं को शाखा के साथ एकरूप करनेवाला कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा। तब तक संघ जैसी शाखा निकालना किसी के लिए संभव नहीं। संघ की शाखा याने कोई स्पोर्टस क्लब या कवायत का वर्ग नहीं है।  
''सर्वारम्भा: तण्डुल प्रस्थमूला:''- अर्थात कोई भी कार्य करना हो तो थोड़ा बहुत धन आवश्यक है, ऐसी हमारे यहां की प्रथा है। इस मामले में भी संघ की स्थिति अलग रही है। कागज, पेस्लि, प्रस्ताव रजिस्टर आदि के बिना ही संघ का कार्य प्रारंभ हुआ। किन्तु किसी भी कार्य के लिए धन तो आवश्यक है। प्रारंभ में चंदा एकत्रित कर यह खर्च वहन किया जाता। किंतु आगे चलकर कार्यकर्ताओं ने ही स्वयं विचार किया कि ''यदि इसे अपना ही कार्य मानते हैं तो फिर संघ कार्य पर होनेवाले खर्च का भार हम स्वयं ही क्यों न वहन करें? अपने घर में यदि कोई कार्य हो, तो जैसा भी संभव हो, उसका खर्च स्वयं वहन करते हैं। कोई अपनी कन्या के विवाह हेतु चंदा एकत्र नहीं करता।'' (पृष्ठ 45-46) अत: सबने मिलतर तय किया कि हम सभी संघ के लिए पैसा देंगे। फिर, प्रश्न उठा कि हम जो पैसा देंगे उसके पीछे हमारी दृष्टि और मानसिकता क्या रहेगी? डाक्टरजी ने कहा, हमें कृतज्ञता और निरपेक्षबुध्दि से यह देना चाहिए। इस प्रकार संघ में गुरुदक्षिणा की पध्दति प्रारंभ हुई। पहले वर्ष नागपुर शाखा की गुरुदक्षिणा केवल 84 रु. हुई।  
जो बात धन के सम्बन्ध में है, वही कार्यकर्ताओं के सम्बन्ध में भी है। कार्य-विस्तार हेतु कार्यकर्ता तो चाहिए किन्तु वे कहां से मिलेंगे? हमीं में से तैयार करने होंगे। सारे भारत में कार्य खड़ा करना है, यह कौन करेगा? आखिर, स्वयंसेवकों को ही यह करना पड़ेगा। तब कुछ स्वयंसेवक शिक्षा ग्रहण करने के निमित्ता अन्य प्रांतों में गये। इसका खर्च वहन करने की क्षमता उनमें थी। इन स्वयंसेवकों ने वहां शिक्षा ग्रहण करने के साथ ही संघ की शाखाएं भी खोलीं- बड़े बड़े कार्यकर्ता भी तैयार किए। आगे चलकर यही विद्यार्थी वहां पूर्णकालिक संघ कार्यकर्ता के रूप में भी कार्य करने लगे। नागपुर से अन्य स्वयंसेवक भी संघ कार्य हेतु विभिन्न प्रांतों में गए। उनके पास ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में पड़ोस के किसी गांव में शाखा चलाने मा? का अनुभव था। केवल इसके बल पर ही वे अपरिचित भाषा वाले प्रांत में गये और वहां उन्होंने संघ की शाखाएं स्थापित कीं। इस तरह प्रचारक वर्ग तैयार हुआ। कार्य की सफलता के लिए कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस हुई और इस दृष्टि से संघ शिक्षा वर्ग की शृंखला चल पड़ी। 
संघ की कार्यपध्दति की अनेक विशेषताएं हैं- शीत कालीन शिविर हैं, नियमित रूप से आयोजित होने वाली बैठकें हैं, नियमित होने वाले बौध्दिक वर्ग हैं, संघ गीत हैं, वर्षभर में मनाए जाने वाले छह उत्सव हैं और इन उत्सवों के लिए अध्यक्षों का चयन है तथा उनकेनिवास की व्यवस्था है, कार्यक्रमों की योजना है, स्वदेशी का अभिमान है, समाचार पत्रों में प्रसिध्दी सम्बन्धी एक विशेष दृष्टिकोण है- यह सब कैसे विकसित होता गया, क्या छूटता गया और क्या नया जुड़ता रहा, इन सब बातों के बारे में पहले क्या स्थिति थी, उनके प्रति डॉक्टरजी का मूलग्रामी दृष्टिकोण क्या था- आदि जानकारी मा. बापूराव ने इस पुस्तक में दी है। 
इस पुस्तक के प्रथम छह अध्याय, डॉ. हेडगेवारजी के, संघ की स्थापना के पूर्व के सार्वजनक जीवन के अनुभवों से सम्बन्धित हैं। उन सार्वजनिक कार्यों की चर्चा भीर संक्षेप में प्रस्तुत की गई है। उसमें कुछ बातें विवादास्पद हो सकने के बावजूद, जन्मजात देशभक्त डॉ. हेडगेवारजी ने क्रांतिकारियों के साथ काम करते समय और बाद में राष्ट्रीय कांग्रेस में अपने आपको झोंक देने के बाद जो अनुभव प्राप्त किए, उनका लाभ, संघ की अभिनव कार्यपध्दति निर्धारित करने में अवश्य ही मिला होगा। अत: इस पृष्ठभूमि को समझने के लिए ये अध्याय भी महत्वपूर्ण हैं।  
इस प्रकार, सभी स्वयंसवकों को, पुरानी जानकारी के साथ ही योग्य मार्गदर्शन करनेवाला यह स्तुत्य उपक्रम है। इसके लिए मा. बापूराव वन्हाड़पांडे जैसा अनुभवी और उद्यमी कार्यकर्ता मिलना भी कठिन है। मा. बापूरावजी डॉक्टर हेडगेवारजी के काल से ही संघ के स्वयंसेवक हैं। पूजनीय श्री गुरुजी और पू. श्री बालासाहब देवरस के निकट सहवास का लाभ भी उन्हें प्राप्त है। सबसे महत्वपूर्ण विशेषता तो यह है कि एक सामान्य स्वयंसेवक से लेकर गटनायक, गण्शिक्षक, मुख्य शिक्षक, शाखा कार्यवाह, भाग कार्यवाह, नगर कार्यवाह, संघ चालक तक संघ की कार्यपध्दति में विविध श्रेणी के पदों पर कार्य करने का समृध्द अनुभव उनके पास है। उनके जैसे अनुभव सम्पन्न, निष्ठावान कार्यकर्ता की लेखनी से प्रस्तुत यह ग्रंथ है- यह ध्यान में आते ही उसकी गुणवत्ता के विषय में कुछ लिखने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।

-मा. गो. वैद्य  
(अ.भा. प्रचार प्रमुख, रा.स्व. संघ)

1. प्राक्कथन

लगभग सत्तार वर्षों पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य प्रारंभ हुआ। पहले पूजनीय डाक्टरजी ही एकमेव स्वयंसेवक थे। आज लक्षावधि स्वंयसेवक भारत तथा विदेशों में कार्यरत हैं। प्रारंभ में किशोर स्वयंसेवकों की एक छोटी सी संघ शाखा मोहिते संघस्थान पर प्रारंभ हुई। आज भारत में तीस हजार से अधिक प्रभावी संस्कार केन्द्र कार्यरत हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और द्वारका से परशुराम कुंड तक फैली अपनी पवित्र तथा विशाल मातृभूमि के प्राय: सभी प्रमुख स्थानों पर संघ शाखा अथवा संस्कार केन्द्र कार्यरत हैं। प्रारंभिक काल में संघ के विचारों से सहानुभूति रखने वाले लोगों की संख्या अत्यल्प थी, आज उनकी संख्या करोड़ों में गिनी जा सकती है। भारत की सर्वांगीण उन्नति के लिए हिन्दुओं का संगठन एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। अपने विचारों और संस्कारों के साथ हिन्दू यदि इस देश में बहुसंख्यक रहा, तभी भारत में लोकतंत्र, विचारों की उदार दृष्टि, समाजवाद और सर्व धर्म समभाव भी बना रहेगा। सम्पूर्ण विश्व को लुभाने वाला एकात्म राष्ट्रजीवन यहां विकसित हो सकेगा। जनमानस में इन विचारों की स्वीकृति के अनुभव हो रहे हैं। 1925 में पूजनीय डॉक्टरजी और उनके निकटवर्ती स्वयंसेवकों को ही संघ कार्य की जानकारी थी। आज भारत में सर्वत्र और विश्व के अनेक देशों में संघ कार्य को जानने वाले लोग मिलेंगे। भारत के बाहर लगभग 50 देशों में, किसी न किसी रूप में हिन्दू संगठन का कार्य चल रहा है।  
इतने विशाल पैमाने पर संघ कार्य का विस्तार कैसे हुआ? क्यों हुआ? क्या प्रारंभ में विदेशी अंग्रेजों और बाद में अपने ही शासनकर्ताओं की ओर से संघ कार्य में आधाएं डालने के प्रयास नहीं हुए? क्या संघ को समूल नष्ट करने के प्रयास किसी ने नहीं किए? यह प्रश्न सामान्य व्यक्ति के मन में भी जरूर उठते होंगे। 
1932-34 में तत्कालीन अंग्रेज शासकों में संघ पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया था। 1940 के अगस्त में, संघ स्थान पर होने वाले कार्यक्रमों तथा गणवेश में समता, संचलन आदि कार्यक्रमों पर शासकीय आदेशों से पाबंदी लगाई गई। 1948 की फरवरी के प्रथम सप्ताह में श्रध्देय महात्मा गांधी की हत्या की साजिश में शामिल होने के झूठे आरोपों के अन्तर्गत तत्कालीन स्वदेशी सत्ता और अहिंसा के सिध्दान्तों की बलि चढ़ाकर महात्माजी के ही ज्येष्ठ अनयायियों ने असत्य का प्रचार किया और लोगों को हिंसक घटनाओं के लिए प्रोत्साहित किया। संघ पर लगाए गए झूठे आरोपों को न्यायालय में सिध्द करो, अन्यथा प्रतिबंध हटाओ- इस न्यायपूर्ण मांग को लेकर भारत के सभी प्रांतों के प्रमुख स्थानों पर 80 हजार से अधिक संघ स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया और कारावास भोगा। संघ पर लगाए गए ये आरोप मूलतया मिथ्या होने से कांग्रेस को बदनामी से बचाने के लिए सरकार को अन्तत: झुकना पड़ा और सत्य को स्वीकार कर संघ पर से प्रतिबंध हटाया गया। 1975 में पुन: सत्ताधीषों ने आपातकाल (इमर्जेंसी) की घोषणा कर सत्ता के सारे अधिकार प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी ने अपने हाथें में ले लिए। संघ को अवैध घोषित किया और 50 हजार कार्यकर्ताओं को 'मीसा' के तहत बन्दी बनाया गया। किन्तु बाद में प्रधानमंत्री को अपनी भूल स्वीकारनी पड़ी और संघ पर से प्रतिबंध हटाना पड़ा। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या स्थित विवादास्पद ढांचा गिराए जाने पर संघ पर पुन: पाबंदी लगायी गयी। किन्तु प्रतिबंध के लिए सरकार की ओर से जिन आधारों को प्रस्तुत किया गया, उन आधारों को पंचाट (न्यायाधिकरण) द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने से प्रतिबंध पूर्णतया अप्रभावी साबित हुआ और छह माह की पाबंदी के बाद कार्य पुन: तेजी से बढ़ने लगा।  
इस प्रकार सन् 1933-34 में विदेशी अंग्रेस शासकों ने तथा सन् 1948, 1975 व 1992 में कांग्रेस सत्तारूढ़ों ने संघ कार्य को नष्ट करने का अपने पूर्ण शक्ति के साथ प्रयास किया। हर बाद प्रतिबंध लगाने की भूल को, शासन द्वारा अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने हेतु खुले आम भले ही स्वीकार नहीं किया गया हो, तथापि न्यायालयों द्वारा प्रतिबंध को अवैध घोषित कर निरस्त किए जाने से न केवल कांग्रेस की प्रतिष्ठा को बट्टा लगता है और इतना ही नहीं तो जनमत भी संघ के अनुकूल बनता है, यह बोध होते ही संघ कार्य की बैधता सरकार को भी स्वीकार करनी पड़ी। यह अनुभव में आया कि हर बार पावंदी के बाद संघ कार्य बढ़ता ही गया। समय-समय पर आने वाले संकटों से जूझते हुए संघ का कार्य बढ़ता ही गया। शासन और सत्तारूढ़ एकछत्री कांग्रेस की अवकृपा से संघर्ष करता हुआ संघ का निरंतर वृध्दिंगत होता गया। इसका एकमात्र कारण है, संघ की विलक्षण प्रभावी कार्य पध्दति। पूजनीय डॉक्टरजी ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से इस कार्यपध्दति को विकसित किया। भारत के कोने-कोने तक पहुंचकर वह प्रभावी सिध्द हो, इस तरह से कार्यान्वित किया। सभी स्वयंसेवकों के हृदय में जड़ जमाकर स्वाभाविकतया उनके आचरण में परिणित हो सके, ऐसी व्यवस्था की गयी। 
संघ की इसी लोक विलक्षण कार्यपध्दति की विशेषताओं संबंधी जन सामान्य में व्याप्त कौतूहल जिज्ञासा को तृप्त करने के उद्देश्य से ही यह लेखन प्रयास है। अत्यल्प साधन सामग्री के बल पर, किसी भी प्रकार का साहित्य तैयार कर उसे प्रकाशित करने के प्रयास में न पड़ते हुए, एक भी नये पैसे का दान अथवा अनुदान मांगे बिना, विकसित इस अभूतपूर्व कार्यपध्दति का विचार करते समय संस्कृत का यह श्लोक याद आता है-

विजेतव्या लंका चरणतरणीयो जलनिधि:।  
विपक्ष: पौलस्त्य रण भुवि सहायश्च कपय:॥  
तथापि श्रीरामं सकलमवधीत् राक्षस कुलम्।  
क्रिया सिध्दि: सत्वे भवति महतां नोपकरणे॥

-और पूज्य डॉक्टरजी की स्मृति में हम नतमस्तक होते हैं।

2. पूजनीय डॉक्टरजी के पूर्वानुभव

संघ की कार्यपध्दति के बारे में विचार करने से पूर्व पू. डॉक्टरजी ने, भारतीय राष्ट्रजीवन को उन्नत बनाने के लिए प्रयत्नशील अनेक संगठनों में कार्य कर उनकी कार्य पध्दतियों का गहराई से अध्ययन किया था। डॉक्टरजी बाल्याकाल से ही प्रखर देशभक्त थे। अपने सम्पर्क और सहवास में आये व्यक्तियों से आत्मीय करने की उनकी अनोखी शैली थी। जब वे माध्यमिक शाला के छात्र थे, तब उन्होंने अपने सहपाठियों से दृढ़ मैत्री प्रस्थापित की सबकी सहमति से, आंग्ल सत्ता के शिक्षणाधिकारी की उपस्थिति में, वंदेमातरम् का सामूहिक जय घोष करने की योजना सफलतापूर्वक क्रियान्वित की थी। इस घोषणा की योजना किसने बनाई? किसने इनका नेतृत्व किया? कौन इसका सूत्रधार था? शालाधिकारी द्वारा यह धमकी दी गई कि वन्देमातरम् का जयघोष करने वाले छात्र अपनी भूल कबूल कर लें अन्यथा उन्हें शाला से निष्कासित कर दिया जायेगा। किन्तु इस धमकी का डॉक्टरजी पर कोई इसर नहीं हुआ। उन्होंने यह कहकर कि मातृभूमि का वंदन करते हुए मुझे गर्व की अनुभूति होती है' शाला से अपना निष्कासन स्वीकृत किया। 
शालांत परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अगली पढ़ाई के लिए डॉक्टरजी ने कलकत्ता के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता जाना तो डॉक्टरजी के लिए एक निमित्ता मात्र था। उनका प्रमुख उद्देश्य वहां के क्रांतिकारी आंदोलन में सहभागी बनना था। मेडिकल कॉलेज में अध्ययन करते हुए उन्होंने वहां के क्रांतिकारियों से सम्पर्क साधा। उनसे मित्रता प्रस्थापित कर क्रांतिकारी आंदोलन में सहभागी बनने के लिए उनकी पूर्ण विश्वसनीयता अर्जित की। उन दिनों अनुशीलन समिति के सक्रिय कार्यकर्ता बने रहे। डॉक्टरजी व्यवहार कुशलता और चतुराई के कारण ही महाराष्ट्र, पंजाब और बंगाल के क्रांतिकारी नेताओं में परस्पर सम्पर्क का सूत्र सुरक्षित रहा। क्रांतिकारी योजना के लिए आवश्यक शस्त्र-सामग्री महाराष्ट्र और पंजाब में नियोजित स्थानों पर पहुंचाने का जोखिम भरा कार्य उन्होंने श्री अप्पाजी जोशी, श्री भाऊजी कावरे आदि विश्वासपात्र मित्रों के सहयोग से किया। सुविख्यात क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह के सहयोगी श्री राजगुरु की, कुछ दिनों के लिए नागपुर और पुणे में, वास्तव्य व्यवस्था भी डॉक्टरजी ने की। वर्धा के विख्यात कानून विद श्री मनोहरपंत देशपांडे के सहयोग से तत्कालीन क्रांतिकारी कुछ काल तक वर्धा में भी रहे। 
संघ कार्यकर्ताओं से वार्तालाप करते समय डॉक्टरजी ने कभी अपने क्रांतिकारी सहयोगियों अथवा कार्यान्वित योजनाओं का कोई उल्लेख नहीं किया। इस कारण उनके द्वारा किए गए अनुशीलन समिति के कार्यों की उपलब्ध जानकारी अत्यल्प है। उनके घनिष्ठ मित्र श्री आप्पाजी जोशी व श्री नानासाहब तेलंग से इस सम्बन्ध में इतनी ही जानकारी उपलबध हो पायी कि क्रांतिकारी योजनाओं के लिए पिस्तौल आदि शस्त्रों का संग्रह उन्हें पंजाब तथा महाराष्ट्र के कार्यकर्ताओं को वितरित करने का महत्वपूर्ण, जोखिम भरा दायित्व डॉक्टरजी ने सफलता पूर्वक निभाया। 
अनुशीलन समिति के प्रमुख कार्यकर्ताओं की विस्तृत जानकारी देने वाली एक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसमें पूजनीय डॉक्टरजी के नाम का गौरवपूर्ण शब्दों में उल्लेख किया गया हैं श्री त्र्यैलोक्यनाथ चक्रवर्ती भी इस अनुशीलन समिति के एक प्रमुख कार्यकर्ता थे। अनेक वर्ष कारावास भोगने के बाद उनकी रिहाई हुई। 1972-73 में दिल्ली में भारत सरकार की ओर से उनका स्वागत किया गया। उन्होंने अपने भाषण में पूजनीय डॉक्टरजी का उल्लेख इन शब्दों में किया- 'वे मेरे अभिन्न हृदय मित्र थे।' स्वाधीनता प्राप्ति के बाद श्री त्र्यौलोक्यनाथ चक्रवर्ती पूर्व बंगाल में बस गए। स्वागत हेतु भारत सरकार के अधिकारियों द्वारा आमंत्रित किए जाने के कारण ही वे दिल्ली आए थे। पूजनीय श्री गुरुजी उनसे मिलना चाहते थे। किन्तु इसी बीच उनके निधन का दु:खद समाचार मिला। अत: श्री गुरुजी ने उनके प्रति अपनी शोक संवेदना उनके घर तक पहुचाने की व्यवस्था की। श्री गुरुजी इस बात से बहुत व्यथित हुए कि पूज्य डॉक्टरजी के ज्येष्ठ सहयोगी श्री त्र्यैलोक्यनाथ चक्रवर्ती से भेंटकर उनके चरण छूने का अवसर उन्हें नहीं मिल पाया। अपने भाषण तथा कार्यकर्ताओं से वार्तालाप में श्री गुरुजी ने अपनी यह व्यथा प्रकट भी की। 
भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए, विदेशों में प्रयत्न करने के उद्देश्य से, विदेश जाने के पूर्व श्री सुभाषचन्द्र बोस का इरादा पूजनीय डॉक्टरजी से विचार-विनिमय करने का था। जर्मनी, जापान आदि देशों से मदद लेकर आजाद हिंद सेना का गठन कर पूर्व की ओर से भारत पर आक्रमण कर उसे स्वतंत्र करने की व्यापक योजना तैयार की गई थी। इस आक्रमण के समय ही भारत की क्रांतिकारी संगठितहोकर देश में अंग्रेज सत्ता के विरुध्द बगावत खड़ी कर सकेंगे- आवश्यक हुआ ता गृहयुध्द का सहारा भी लेंगे ताकि भारत को स्वाधीनता दिलाने का स्वप्न शीघ्र ही पूरा किया जा सके- इस दृष्टि से श्री सुभाषचन्द्र बोस ने अनेक क्रांतिकारियों से सम्पर्क साधा था- इसी सन्दर्भ में वे डॉक्टरजी से भी मिलना चाहते थे। 1938 के मई मास में उन्होंने भेंट करने का प्रयास भी किया किन्तु उन दिनों डॉक्टरजी अस्वस्थता के कारण देवळाली में थे, इसलिए वह भेंट नहीं कर हो पायी। बाद में 1940 के जून में जब श्री सुभाषचन्द्र बोस नागपुर आये, तब तो पू. डॉक्टरजी मरणासन्न स्थिति में थे, इसलिए श्री सुभाषचन्द्र दूर से ही डॉक्टरजी को प्रणाम कर लौट गए। नागपुर से कानपुर (या लखनऊ) गए, जहां उन्होंने एक गुप्त बैठक में भाग लिया। इस गुप्त बैठक में, उचित समय आने पर आंतरिक उठाव करने सम्बन्धी विचार-विनिमय होने की बात कानोंकान सुनी गई। किन्तु ऐसी गुप्त बैठक के पूर्व श्री सुभाषचन्द्र बोस को डॉक्टरजी से विचार-विनिमय करने की आवश्यकता महसूस हुई। इससे यह प्रतीत होता है कि श्री सुभाषचन्द्र बोस को इस बात का पूर्ण विश्सवास था कि क्रांतिकारियों ही गोपनीय योजनाओं का सफल क्रियान्वयन डॉक्टरजी के सहयोग से ही संभव है।  
संघ की स्थापना के पूर्व क्रांतिकारी क्षेत्र से डॉक्टरजी का सम्बन्ध था। अनुशीलन समति के वे अखिल भारतीय स्तर के महत्व के कार्यकर्ता थे। किन्तु संघ का कार्य प्रारंभ करने के बाद उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन से अपने आपको पूर्णतया अलिप्त रखा।  

3. क्रांतिकारी आंदोलन का विचार व कार्यपध्दति

क्रांतिकारी आंदोलन के एक ज्येष्ठ क्रियाशील कार्यकर्ता के नाते काम करते समय पू. डॉक्टरजी जी उसका वस्तुनिष्ठ विचार किया था। आत्मोसर्ग ही सिध्दान्तत: इस आंदोलन की प्रमुख प्रेरणा थी। हम पराधीन हैं। विदेशी अंग्रेजों ने कपट नीति अपनाकर हमारी स्वाधीनता छीन ली है। वह स्वतंत्रता हमें पुन: प्राप्त करनी है। इसके लिए अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय के रूप में मातृभूमि के लिए बलिदान या आत्मोसर्ग करना ही ये क्रांतिकारी सर्वथा उपयुक्त मानते थे। आत्मोसर्ग से भारतमाता का पूजन, मातृभूमि के पावन चरणों में आत्मसमर्पण- यही सैध्दान्तिक विचार उन्हें प्रेरित करता था। इस कर्तव्य पूर्ति के लिए- 'तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युध्दाय कृत निश्चय:' युध्द के लिए प्रवृत करने वाला भगवत् गीता का उक्त वच नही उन्होंने शिरोधार्य किया। इसीलिए फांसी के फंदे पर लटकने से पूर्व इंतिम इच्छा को पूर्ण करते समय ये क्रांतिकारी भगवत् गीता को हाथों में लेकर भारतमाता का जय घोष करते हुए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमते थे। अंग्रेज सत्ताधारी हमारा आर्थिक शोषण कर भारत को कंगाल बना रहे हैं। चाय बागानों में तथा शक्कर उत्पादन व्यवसाय में अंग्रेजों ने झूठे आश्वासन देकर तथा जोर जबर्दस्ती कर भारतीय श्रमिकों को अत्यल्प वेतन देकर गुलामों जैसी बेगार करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसलिए अंग्रेजों को भारत से खदेड़ बाहर करना होगा। आवश्यक हुआ तो उनकी हत्या कर, आतंक का सहारा लेकर उन्हें भारत छोड़ने के लिए बाध्य करना होगा। इस प्रकार के विचार सरदार भगतसिंह ओर उनके कुछ सहयोगी क्रांतिकारियों को प्रेरित करते थे।  
भारतमाता के चरणों में अपना सिर चढ़ाकर उसका पूजन करने अथवा शोषणकर्ता विदेशी अंग्रेजों को खदेड़ बाहर करने के प्रेरक विचारों में, अंग्रेज अपना शत्रु है, इसलिए वह वध्य (हत्या का पात्र) है- यही विचार सर्वोपरि रहा करता। इसीलिए 'अंग्रेजों का शत्रु वह हमारा मित्र' इस न्याय से अनेक क्रांतिकारी विदेशी शक्तियों का सहयोग प्राप्त करने जर्मनी, रूस तथा जापान आदि देशों में गए। इन देशों से शस्त्रास्त प्राप्त् करने के उद्देश्य से वे गुप्त रूप में भारत के बाहर गए। अंग्रेजों के प्रति शत्रुता की भावना ही इन युवकों को उत्तोजित करती थी और मातृभूमि की पूजा में सर्वस्य समर्पण की प्रेरणा देती थी। 
पू. डॉक्टरजी ने क्रांतिकारियों के इन प्रेरणादायी विचारों के चिंतन के साथ ही उनकी कार्यपध्दति का भी अध्ययन किया था। क्रांतिकारियों का यह आंदोलन कुछ इने-गिने, सतर्कता से चुने हुए युवकों का ही आंदोलन था। विचार विनिमय में भले की कुछ प्रौढ़ व्यक्ति सहभागी होते किन्तु प्रत्यक्ष कार्य करने वाले तो नवयुवक ही थे। इसे सर्वसामान्य जनता का आंदोलन नहीं माना जा सकता था। क्रांतिकारी आंदोलन के प्रणेता भी यह दावा नहीं करते थे कि यह आंदोलन जन-आंदोलन बने- सम्पूर्ण समाज इसे आचरित करे। उनकी कार्यपध्दति में, प्रत्यक्ष व्यक्तिगत निकट सम्पर्क से संवेदनशील साहसी युवकों को आत्म बलिदान के लिए तैयार किया जाता था। 1857 का स्वातंत्र्य समर, जोसेफ मॅझिनी का जीवन चरित्र, आयलैंड के स्वातंत्र्य आंदोलन का इतिहास आदि प्रेरक ग्रंथों के अध्ययन पर ही विशेष बल दिया जाता और उस अध्ययन से भावनाओं को प्रक्षोभित करने का प्रयास किया जाता। स्वतंत्रता संग्राम में यहां सच्चा पुरुषार्थ है- यह विचार पनपाया जाता। विस्फोटक समग्री जुटाना, बम तैयार करने की शिक्षा देना और अज्ञात एकांत स्थल पर पिस्तौल से निशाना साधने का अभ्यास किया जाता। कार्य और कार्यक्रमों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए कार्यकर्ताओं के बीच सांकेतिक शब्दों का उपयोग किया जातं। संघ कार्य प्रारंभ होने के कुछ वर्षों बाद एक पुराने क्रांतिकारी मित्र डॉक्टरजी से मिलने आए। पुराने सांकेतिक शब्दावलि का प्रयोग करते हुए उन्होंने डॉक्टरजी से पूछा- 'अफीम का सेवन करने वाले आपके कितने मित्र हैं?' इस पर डॉक्टरजी का जवाब था- ''मित्र तो अनेक हैं, किन्तु अब उन्‍हें अफीम का सेवन करने पर भी नशा नहीं चढ़ता।'' 
गोपनीयता और उसे बनाए रखने की सतर्कता बरतना क्रांतिकारी आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग था। सम्पूर्ण कार्य पध्दति में गुप्तता बरतने पर अत्यधिक बल दिया जाता। सरकारी जासूसों के जाल से बचना तथा उसके गुप्तचरों को गुमराह करना भी जरूरी था। सारी कार्यवाही गुप्त रूप में चलती थी। गुप्तता बनाये रखने के कुछ अपरिहार्य परिणाम भी होते थे। क्रांतिकारियों के कार्यों से सामान्य जनता को पूर्णतया अलिप्त रखा जाता। उन्हें सामान्य जनता से सुरक्षित दूरी बनाए रखना जरूरी होता। शस्त्रास्त्र प्राप्ति के लिए धन की आवश्यकता होती। समाज में, खुले मन से समरस होकर विचरण करना, विचार-विनिमय कर कार्य की महत्ता समझाकर धन एकत्रित करना असंभव था। तब लाचारी में धनी सम्पन्न लोगों के घर, उन्हें 'समाजहित विरोधी' मानकर डाका डाला जाता तथा सरकारी खजाना लूटा जाता। खजाना भले ही सरकारी हो, पर पैसा तो जनता का ही है, यह मानकर उसे हथियाने का प्रयास होता। भले ही डाका डालकर क्यों न हो, जनता से धन प्राप्त करने का प्रयास होने के कारण क्रांतिकारियों के विचारों के प्रति आदर भावना रखते हुए भी लोगों में उनके सम्बन्ध में भय और आतंक की भवना की अधिक प्रबल होती। सरकारी दमनचक्र का भय और आतंक भी स्वाभाविकतया जनता में बना रहता। 
गुप्त रूप में, प्ररेणादायी साहित्य का पठन भी कोई आसान नहीं था। प्रकट भाषण में भी ऐसे विषयों का प्रतिपादन करना असंभव था। अत: ऐसे साहित्य का पठन-पाठन और अध्ययन छोटे-छोटे दलों (Study circles) में हुआ करता। इन अनेक अध्ययन दलों का पारम्परिक सम्बन्ध भी काफी सीमित होता। सारी कार्यवाही गुप्त रूप से चलने के कारण सारे क्रांतिकारियों की शक्ति का आंकलन सभी को हो पाना असंभव था- कुछ सीमित नेताओं को ही उसकी जानकारी होती। गुप्त रूप में, केवल सम्बन्धित लोगों के सहभाग से, कुछ धार्मिक उत्सव आदि कार्यक्रमों का आयोजन होता। किसी अज्ञात स्थल पर प्रतिज्ञा-ग्रहण करने का कार्यक्रम अत्यंत सावधानी से आयोजित किया जाता। इस प्रकार क्रांतिकारियों का उपक्रम सीमित दायरे में गोपनीय कार्य के रूप में ही होता। 
चतुर अंग्रेजी सत्ता के जासूसों को इन क्रांतिकारियों की योजनाओं की जानकारी जनता के ही कुछ सूचकों (Informers) द्वारा ही प्राप्त होती थी। इन सूचकों (informers) को ये क्रांतिकारी अपना शत्रु मानते थे और जिन लोगों के द्वारा अपनी गुप्त वार्ताओं और योजनाओं को भंडाफोड़ होता उनकी हत्या की योजना भी इन क्रांतिकारियों द्वारा बनाई जाती। पुणे में, चाफेकर, बंधु, द्रविड़ आदि के साथ ऐसी ही घटनाएं हुईं। भारत में अंग्रेजों की सरकार चलाने में योगदान देने वाले अधिकांश भारतीय सुशिक्षित तो थे ही, अंग्रेज निष्ठ भी थे। ऐसे सरकारी नौकरशाहों के प्रति भी इन क्रांतिकारियों में तिरस्कार की भावना उनके बोलचाल और आचरण से प्रकट होती। क्रांतििकरयों के इस आचार-विचारों के कारण भारतीय शासनाधिकारियों के सम्बन्ध में उनकी शत्रुता और तुच्छता की भावना स्वाभाविकतया बल पकड़ती। 
कुछ इने-गिने अंग्रेज अधिकारियों की हत्या करने से अथवा विशेष प्रसंगों पर बम विस्फोट करने मात्र से अंग्रेज घबरा जाएंगे, ऐसी बचकाना कल्पना तो क्रांतिकाकी नेताओं ने भी नहीं की थी। अंग्रेज चतुर हैं, देशभक्त हैं। एकाध गौरवर्णीय अधिकारी मारा भी जाए तो उसकी जिम्मेदारी संभालने के लिए अनेक देशभक्त अंग्रेज आगे आ सकते हैं, इसका पूरा भरोसा क्रांतिकारियों को थे। किन्तु खून की एक बूंद चूसने वाला खटमल 15-20 मिनट की नींद तो खराब करता है। इसी प्रकार चार छह जिम्मेदार अंग्रेज अफसरों की हत्या करने से अस्थिरता का माहौल तो बन सकेगा। सामान्यतया क्रांतिकारी यह भावना व्यक्त करते थे कि अंग्रेजों के प्रति भारतीयों के मन में तुच्छता की भावना विद्यमान है। साथ ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए भारत के नवयुवक बलिदान हेतु तत्पर हैं, यह भावना ही अंग्रेज शासनकर्ताओं के मन में अस्थिरता और बेचैनी पैदा करेगी और भारत पर राज करना उनके लिए अधिक कष्टदायक और खतरनाक प्रतीत होगा। क्रांतिकारी आंदोलन से भारत में अंग्रेजों तथा गोरे सत्ताधारियों के विरुध्द भारत की जनता उठ खड़ी होगी और आंतरिक युध्द की स्थिति पैदा होकर अंग्रेजों को भारत से खदेड़ बाहर किया जायेगा, ऐसी कल्पना और योजना तो असंभव थी। केवल क्रांतिकारी आंदोलन के सहारे पूर्ण विजय होगी- इस आकांक्षा से यह आंदोलन कार्यान्वित करना संभव नहीं था। कुछ युवकों के आत्म बलिदान जनता के हृदय में स्वातंत्र्य संग्राम की ज्वाला भड़क उठेगा- इस प्रकार की भावना को व्यक्त करने वाले गीत और कविताएं भी उन दिनों सुनी जाती थी। मराठी भाषा में- ''आज आमुची सरणावरती पेटताचे प्रेते। उठतील त्या ज्वालेतून भावी क्रांतिचे नेते'' तथा ''गर्जा जय जयकार क्रांतिचा''- आदि काव्य पंक्तियां इसी भावना को व्यक्त करती हैं। आत्मोसर्ग से आत्म बलिदान जैसी सर्वश्रेष्ठ भावना और विचारों की जागृति होती थी- इसके साथ ही हम 'निश्चित रूप से विजयी' होंगे इस विचार की बजाय निराशा के भाव भी अंकुरित होते थे। विजय की आकांक्षा से हमने मात्भूमि की मुक्ति के लिए अपना कर्तव्य निभाया- आगे भगवान ही मालिक है- यह भावना भी जड़ पकड़ती थी। राजपूत महिलाओं का जौहर, राजस्थानी वीरों का साका आदि श्रेष्ठ आत्मोसर्ग के कीर्तिमान होने का गौरवपूर्ण उल्लेख करने पर भी यह एक तथ्य है कि निराशा की भावना ही उस आत्मबलिदान की प्रेरणा रही हैं अब आगे सम्मानपूर्वक जीना असंभव है- यही अनुभूति उन्हें बलिदान के लिए प्रेरित करती थी। 
भारत पराधीन था, इसलिए क्रांतिकारी आंदोलन के नेता आसानी से युवकों की भावना उत्तोजित कर पाते थे। किन्तु प्रक्षोभित नवयुवकों की अधीरता को नियंत्रण में लाना उनके लिए बड़ा कठिन था। भावनाशील युवकों का प्रक्षोप कभी कभी अचानक, अनुचित समय पर, अवांछित तरीके से भड़क उठता। ऐसी युवा भावना को नियंत्रित कर पाना कोई आसान काम नहीं था। 1857 के स्वातंत्र्य समर में, निर्धारित समय से पूर्व ही आंदोलन का भड़क उठना, युवकों की इसी अनियंत्रित भावनाशीलता का प्रतीक है। उत्तोजित युवा मन की भावनाओं को नियंत्रित कर पाना कठिन ही होता है। इस आत्मोसर्ग या बलिदान के मूल में बिजली की भांति, क्षणमात्र के लिए आंखों को चौंधिया देने वाले प्रकाश की अभिव्यक्ति की भावना होती। उसमें दीप की तरह स्वत: को तिल-तिल जलाते हुए समूचे जगदाकाश को प्रकाशित करने की भावना और विचार अपेक्षित नहीं था।  
चतुर अंग्रेजों की प्रभावी शासन पध्दति के कारण क्रांतिकारी आंदोलन देशभर में फैल पाना संभवन नहीं हो पाया। बंगाल में ही वह अपनी जड़ जमा पाया। आंध्र, पंजाब, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में भी कुछ मात्रा में प्रयास हुए। किंतु क्रमश: यह आंदोलन शांत होते गया। उग्र प्रवृत्ति के क्रांतिकारी स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए अन्य मार्गों को खोजने लगे। कुछ लोग रूस गए। योगी अरविंद जैसे क्रांतिकारी आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चले पड़े। कुछ क्रांतिकारी नव युवकों ने राम कृष्ण आश्रम में प्रवेश लेकर ब्रह्मचर्य और संन्यास की दीक्षा ग्रहण की। भारत के कुछ विचारशील नवयुवकों में रूसी क्रांति का आकर्षण बढ़ा- उन्होंने अपने जीवन में समाजवाद अथवा साम्यवाद की दिशा अपना ली।  
पू. डॉक्टरजी का इन सभी क्षेत्रों में कार्यरत नवयुवकों के साथ कम-अधिक मात्रा में सम्पर्क था। क्रांतिकारी आंदोलन में मन-पूर्वक तथा समर्पण वृत्ति से कार्य करते समय डाक्टरजी ने उनकी कार्यपध्दति का गहराई से अध्ययन किया था। जनता में खुले रूप में समरस होकर मुक्त विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। आवश्यक हुआ तो सार्वजनिक उद्बोधन करना भी संभव होना चाहिए। सम्पूर्ण राष्ट्र जीवन की उन्नति करने में, गुप्त कार्यपध्दति और गोपनीय व्यवहार वाला आंदोलन विशेष उपयोगी सिध्द नहीं हो पायेगा। केवल कुछ इने-गिने, आत्मोसर्ग के लिए सिध्द देशभक्त नवयुवकों (A set of determined dedicated youths) द्वारा देशव्यापी प्रभाव आंदोलन खड़ नहीं किया जा सकेगा। पू. डॉक्टरजी ने यह तीव्रता से महसूस किया कि भारत की सर्वांगीण उन्नति के लिए भारत को अपनी मात्भूमि मानने वाली सम्पूर्ण भारतीय जनता को जागृत कर, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निरपेक्ष राष्ट्रभक्ति की भावना उसके जीवन का स्थायी भाव बने, इस दृष्टि से सर्वंकष प्रयत्नों की आवश्यकता है। सभी भारतवासी देशभक्तों को उत्स्फूर्त कर सकने वाला उदात्ता ध्येय अगर सामने होगा, तभी कोई भावात्मक कार्य संभव है। केवल अंग्रेजों के प्रति बैर-भावना भारत की स्वतंत्रता- प्राप्ति के लिए किए जाने वाले विधायक कार्यों का आधार नहीं बन सकती- यह विचार भी पू. डॉक्टरजी के मन में दृढ़ होता गया। 
 

4. राष्ट्रीय सभा (1920 के पूर्व)

प्रारंभ में राष्ट्रीय सभा और बाद में इंडियन नेशनल कांग्रेस के नाम से हुआ आंदोलन भारत में सर्वपरिचित है। अपने जन्मकाल से ही यह आंदोलन देशव्यापी था। सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से स्वाधीनता प्राप्ति की घोषणाएं और जन जागृति की जाती थी। कलकत्ता से नागपुर लौटने के बाद पू. डाक्टरजी का, कांग्रेस आंदोलन में सहभाग क्रमश: बढ़ने लगा। जन्मजात देशभक्ति की स्वाभाविक प्रवृति के कारण डॉक्टरजी की सहजता से कांग्रेस में प्रवेश मिला। जिन दिनों डॉक्टरजी का कांग्रेस आंदोलन से सम्बन्ध जुड़ा उन दिनों तत्कालीन राष्ट्रीय सभा के कार्यक्रमों और विचारों में 'गरम' और 'नरम' प्रवृत्ति के दो गुट स्पष्टतया उभरने लगे थे। 'नरम दल' के प्रति नवयुवकों में स्वाभाविकतया विशेष आकर्षण नहीं था। सारे भारतवासी एक मुख से अंग्रेजों से प्रार्थना, विनती, अपील कर उसने स्वाधीनता की याचना करेंगे तो न्याय प्रिय अंग्रेज अपनी मांग पूर्ण करें- इस बात पर लोगों का विशवास समाप्त होने लगा था। केवल अखबारों में लेख प्रकाशित कर, सभा सम्मेलनों में भाषण देने मात्र से कुछ प्राप्त नहीं होगा। हां, प्रभावी भाषणों से कुछ जा जागृति अवश्य हो सकती है, फिर भी सर्वसामान्य जनता के अंत:करण में देशभक्ति की भावना सुप्त अवस्था में होने के कारण भाषणों और लेखों के माध्यम से होने वाली जनजागृति आवश्य हो सकती है, फिर भी सर्वसामान्य जनता के अंत:करण में देशभक्ति की भावना सुप्त अवस्था में होने के कारण भाषणों और लेखों के माध्यम से होने वाली जनजागृति अल्पकाल तक ही टिक पाती है। कुछ समय बीतने पर लोगों को उसका विस्मरण होने लगता है। यही सर्वसामान्य अनुभव है। लोकमान्य तिलकजी के भाषणों में यही विचार व्यक्त होते थे। 'केसरी' में लिख अग्रलेखों (संपादकीय) के कारण तिलकजी को सश्रम कारावास भोगना पड़ा। मंडाले जेल में जाने के लिए रवाना होने से पूर्व उन्होंने कहा था- ''शायद मेरे कारावास से, भारत में अधिक जन-जागृति हो सकेगी। यही ईश्वरीय संकेत है।'' कारावास में जाने के पूर्व उन्हें यह अनुभव में आया था। कि उनके भाषणों और अखबारों में प्रकाशित लेखों से कुछ मात्रा में जन जागृति हुई है। शायद इसीलिए उन्होंने यह अनुमान लगाया होगा कि उनके जेल जाने पर यह जन जागृति अधिक व्यापक और दृढ़ होगी। किन्तु प्रत्यक्ष में कुछ और ही हुआ। मंडाले जेले से मुक्ति पर जब वे वापस लौटे तो उन्हें यह अनुभव हुआ कि भारत का चित्र उनकी अपेक्षा के बिलकुल विपरीत है, पहले जनजागृति का जो दृश्य उन्होंने देखा और अनुभव किया था, वह समाप्त प्राय हो गया था। इसलिए उन्हें ''पुनश्च हरि: ओम'' कहकर जन जागृति का कार्यक्रम हाथों में लेना पड़ा। 
नरम दल के नेताओं द्वारा चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलन का आधार-भूत विचार यही था कि सत्ताधारी विदेशी अंग्रेजों के सामने स्वराज्य की याचना की जाए। उसके लिए अपील आवेदन कर राज्यकर्ताओं को मनाया जाए। भारत में सभा, सम्मेलनों का अयोजन कर भाषण दिए जाएं- प्रस्ताव पारित किए जाएं- सुविद्य भारतीयों के इन तर्कशुध्द विचारों से अंग्रेज सत्ताधारियों को अवगत कराया जाए। इस राष्ट्रीय देशव्यापी आंदोलन को लोकमान्य तिलक ने अत्यंत मौलिक वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किया। उन्होंने यह मौलिक विचार प्रतिपादित किया कि भगवत गीता के अनुसार स्वधर्म का पालन करने के लिए हमें स्वाधीनता चाहिए- इसके लिए उन्होंने घोषित किया कि 'स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकर है, वह मैं प्राप्त कर के रहूंगा।' लोकमान्य तिलकजी ने देशवासियों के समक्ष स्वधर्म-स्वदेशी-स्वराज्य, इस त्रयी पर आधारित कार्यक्रम प्रतिपादित किया। हिन्दू समाज में धार्मिक एकता का सूत्र अधिक कार्यक्षम बनाकर लोकमान्य तिलक के जाजागृति के जो कार्यक्रम प्रस्तुत किए, उनके कारण युवापीढ़ी राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति अधिक आकर्षित होने लगी। पूजनीय डॉक्टरजी ने इस आंदोलन में अपने सारे अनुभवों और कर्तृव्यों का परिचय देकर सक्रिय भाग लिया। लो. तिलक के प्रति डॉक्टरजी के मन में अपार श्रध्दा और आदरभाव था। इस आंदोलन को अधिक उग्र बनाने के लिए, साथ ही हिन्दू समाज की धार्मिक एकता के सूत्र को मजबूत बनाने के लिए जन जागृति के कार्यक्रमों में श्री गणेश और छत्रपति शिवाजी के उत्‍सवों का समावेश करने का आवाहन तिलकजी ने किया। जनता की ओर से भी इस आवाहन को भारी समर्थन मिला। इन कार्यक्रमों में राष्ट्रीय वृत्ति का जागरण तथा देशभक्ति यह सामान्य व्यक्ति का स्वभाव बने' इस वैचारिक जागृति पर बल दिया जाता। इसका जनमानस पर होने वाला स्थायी परिणाम भी धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। पंजाब के लाला लाजपतराय, महाराष्ट्र के बाल गंगाधर लितक और बंगाल के बिपिनचंद्र पाल ये नेता त्रय 'लाल बाल और पाल' के नाम से उन दिनों समस्त भारतीय जनता के, विशेषकर नवयुवकों के श्रध्दा-केन्द्र के रूप में उभर रहे थे। राष्ट्रीय आंदोलन में युवकों का सहभाग भी बढ़ने लगा था। किन्तु इस समय 1920 के अगस्त में दुर्भागय से लो. तिलक का स्वर्गवास हो गया। 
लोकमान्य तिलक के निधन से भारत की जनता और राष्ट्रीय आंदोलन पर गहरा आधात पहुंचा। भारतीय जनता की हार्दिक श्रध्दा के विषय स्वधर्म-स्वदेशी और स्वराज्य इस विचार त्रयी का आवाहन करने वाले एक प्रेरणादायी नेता को देश की जनता खो बैठी थी। उन दिनों भारतीय राजनीतिक पटल पर अन्य कोई नेता ऐसा नहीं था जो इस सैध्दान्तिक अधिष्ठान पर राष्ट्रीय आंदोलन की दृढ़ता से नेतृत्व करता। तिलकजी की भांति ही उग्र दल का मार्ग-दर्शन करने वाला कोई सुयोग्य नेता अ.भा. कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा तो वह राष्ट्रीय आंदोलन को प्रभावी ढंग से आगे बड़ा सकेगा। इस प्रकार की सोच रखने वाले युवा कार्यकर्ताओं में पू. डॉक्टरजी का प्रमख स्थान था। उनकी कार्यकुशलता और जनमानस को प्रभावित करने की क्षमता से तत्कालीन कांग्रेस के ज्येष्ठ नेतागण परिचित थे। इसीलिए कुछ प्रमुख नेताओं के साथ विचार-विनिमय के पश्चात कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में योगी अरविन्द के नाम पर सर्व सहमति पायी गयी। किन्तु योगी अरविन्द तो सक्रिय राजनीति से अलिप्त होकर पांडिचेरी में आध्यात्मिक साधना में लीन हो गए थे। अत: यह तय हुआ कि कुछ प्रमुख कार्यकर्ता वहां जाकर उनसे इस दायित्व को संभालने की प्रार्थना करें। उन्हें यह महसूस कराया जाए कि उनके सिवा अन्य कोई भी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभावी नेतृत्व नही कर सकेगा- अत: उनसे अध्यक्ष पद स्वीकार करने का आग्रह किया जाए। योगी अरविन्द से अज्ञातवास छोड़कर भारतीय राजनीति का नेतृत्व करने की प्रार्थना करने का दायित्व डॉ. मुंजे और पू0 डॉ. हेडगेवारजी को सौंपा गया। तदनुसार ये दोनों महानुभाव इस दायित्व को निभाने पांडिचेरी गए। वहां योगी अरविन्द के साथ प्रदीर्घ विचार विनिमय हुआ। किन्तु सक्रिय राजनीति में पुन: लौटने से योगी अरविन्द ने इंकार किया। आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभार सलाह मशविरे के लिए उन्होंने अपनी स्वीकृति दी पर कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार करने वे तैयार नहीं हुए। अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिए यदि योगी अरविन्द तैयार हो जाते तो कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन में उनका ही नाम सर्वानुमति से पारित कराने की योजना भी अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के सहयोग से पू. डॉक्टरजी ने तैयार कर ली थी। किन्तु योगी अरविन्द द्वारा नकार दिए जाने के कारण कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी को स्वीकार करना पड़ा। 
पू. डॉक्टरजी ने कांग्रेस आंदोलन के मूलभूत प्रेरक विचार तथा उसे सम्पूर्ण भारत में जन आंदोलन के रूप में विकसित करने की कांग्रेस की कार्यपध्दति का भी गहराई से अध्ययन और चिन्तन किया था। कांग्रेस की कार्यवाही का उन्होंने केवल चिन्तन मनन ही नहीं किया, तो उस आंदोलन में अपना सर्वस्य समर्पण कर निरपेक्ष भाव से आंदोलन के हर कार्यक्रम में भाग भी लिया। इसीलिए अपने अनुभवों से उन्हें कांग्रेस सम्बन्धी सर्वस्पर्शी जानकारी प्राप्त थी। सैध्दांतिक रूप में स्वधर्माचरण तथा आचार-विचार में स्वदेशी व्रत को स्वीकार करने के लिए भारतीय जनता को स्वराज्य चाहिए- स्वतंत्रता आंदोलन के तात्विक अधिष्ठान के नाते इस मूलभूत विचार को स्वीकार करना अपरिहार्य ही था। किन्तु तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के मन में यह विचार पैदा हुआ कि लोकमान्य तिलकजी द्वारा प्रतिपादित हिन्दू धर्ममूलक एकता के सूत्र में सभी भारतीयों को गूंथने में कठिनाईयां आ सकती हैं। सभी धर्मों के प्रति समान आदर भावना, ''एकं सत विप्रा बहुधा वदन्ति''- सबे लिए अनुकूल सिध्द होने वाले हिन्दू धर्म के इस मूलभूत सिध्दान्त का आधार लेने की बजाए उनके मन में हिन्दू समाज की कालबाह्य रूढ़ियों का और कुप्रथाओं का प्रभाव अधिक परिणामदायी सिध्द हुआ। धर्म के मूलतत्वों और तदनुसार व्यवहार की बजाए नया कांग्रेसी नेतृत्व इस आशेका से अधिक ग्रस्त प्रतीत हुआ कि अस्पृश्यता जैसी पूर्णतया कालविसंगत और त्याज्य कुप्रथाएं भारतीय समाज की एकता में विरीत परिणामदायी सिध्द होंगी। कांग्रेस नेतृत्व इस बात पर विश्वास करने के लिए भी तैयार नहीं था कि भारत के अधिकांश मुस्लिम मूलतया हिन्दू ही होने के कारण वे भी भारत माता के सपूत के नाते हिन्दू जीवन पध्दति से समरस हो सकेंगे। यहां हजारों वर्षों से चली आ रही, राम और कृष्ण को अपना आदर्श मानने वाली सांस्कृतिक परम्परा में वे भी भारत के सपूत के नाते यहां के जन जीवन में समरस हो सकेंगे। इंडोनेशिया की भांति धर्म से मुसलमान होने पर भी श्री राम को अपना राष्ट्रपुरुष स्वीकार करना भारतीय मुस्लिमों के लिए संभव हो सकेगा। किन्तु कांग्रेसी नेतृत्व को इसका भरोसा नहीं था। मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग कर उनमें फूट पैदा करने की साजिश अंग्रेजों ने ही रची थी। वे इस फूट को पनपाने के प्रयास में लगे थे। पूजनीय डॉक्टरजी का विचार था कि वस्तुत: हिन्दूधर्म ही सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में गूंथने वाली सच्ची संकल्पना है। यदि समाज निरपेक्ष राष्ट्रीय भावना से सुसंगठित हुआ तो इस सांस्कृतिक आधार पर समस्त भारतीयों में एकता की भावना जागृत करना अधिक व्यावहारिक और आसान हो सकेगा। इस दृष्टिकोण से ही स्थायी जनजागृति लायी जा सकेगी। डॉक्टरजी इसी दिशा में विचार कर रहे थे।  
डॉक्टरजी इस बात से व्यथित थे कि लो. तिलक के मंडाले कारावास में रवानगी के बाद उनके द्वारा प्रेरित स्वदेशी-स्वधर्म पर आधारित राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा है- उसे पुन: बल प्रदान कर प्रभावी बना सकने वाला नेतृत्व कांग्रेस में उभर नहीं पाया है। किन्तु लोगों की तिलकजी के प्रति निष्ठा बनी हुई है। इस कारण वे आश्वस्त थे। उनका विश्वास था कि कारावास भागकर जैसी ही श्री तिलकजी पून: लौटेंगे- इस आंदोलन को अधिक प्रभावी बनाकर विदेशी अंग्रेजों के विरुध्द तीव्र असंतोष पैदा करना संभव हो सकेगा। किन्तु भले ही कितना सदगुणी हो तथा नेतृत्व क्षमता कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हो, वह चिरंजीवी नहीं है। उसकी आयु सीमित ही होती है। अत: किसी भी आंदोलन अथवा समाज कार्य का आधार और संचालन श्रेष्ठतम होते हुए भी, किसी महान पुरुष के लिए वह स्थायी रूप में करते रहना संभव नहीं है। अनेक शतकों से आत्म विस्मृत तथा असंगठित हिन्दू समाज में शाश्वत देशभक्ति जागृत करने का कार्य तो अनेक वर्षों तक, सतत् प्रयत्नों द्वारा साध्य करने का श्रेष्ठ कार्य है। सम्पूर्ण राष्ट्र की वैचारिक उन्नति का यह व्यापक देश कार्य किसी एक गुणसम्पन्न व्यक्ति के आधार पर हो पाना संभव नहीं- इस कार्य में अनेकों व्यक्तियों को अपना जीवन खपाना होगा क्योंकि यह तो निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। ऐसे देशव्यापी महत्वकार्य कभी व्यक्ति निष्ठ नहीं होते- उसके लिए सबके हृदयों को उत्स्फूर्त करने वाली, समाजकार्य हेतु सर्वस्य समर्पित करने की प्रेरणा देने वाली, आजीवन यही कार्य करने की आकांक्षा उत्पन्न करने वाली कार्य निष्ठा का आधार चाहिए। यह विचार डॉक्टरजी के मन में घर करने लगा।

5. राष्ट्रीय सभा- 1920 के बाद

लो. तिलक के निधन के बाद कांग्रेस आंदोलन का नेतृत्व श्रध्देय महात्मा गांधी ने किया। महात्माजी ने इस आंदोलन को एक नया विचार दिया। सारे भारतीय एक होकर अंग्रेजों के विरुध्द खड़े हों तो एक वर्ष में स्वराज्य प्राप्त हो सकेगा। यह विचार उन्होंने प्रतिपादित किया और आम सभाओं में उनके भाषणों को भी जनता की ओर से अच्छा प्रतिसाद (समर्थन) मिला। भारत के सारे नागरिकों में एकता हो- एकता की यह भावना सबके हृदयों में दृढ़ हो सके- एतदर्थ यह राष्ट्र उन सबका है, जो इस भूमि पर निवास करते हों- यह प्रादेशिक राष्ट्रवाद उन्होंने जनता के बीच प्रतिपादित किया। इस देश में रहने वाले हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी की एकता के लिए गांधीजी ने प्रादेशिक राष्ट्रवाद की संकल्पना को अपरिहार्य माना और सार्वजनिक सभा- सम्मेलनों में वे उस विचार को प्रस्तुत करने लगे। स्वराज्य प्राप्ति के लिए हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई इन सभी की एकता अपरिहार्य है- यह विचार जोर पकड़ने लगा। सभा सम्मेलनों में 'Hindu-Muslim unity a pre-requisite for swaraj' इस प्रकार की घोषणाएं होने लगीं। कुटिल राजनीति के निपुण खिलाड़ी अंग्रेज यदि महात्माजी के इन विचारों का अनुचित लाभ नहीं उठाते तो आश्चर्य की बात होती। उन्होंने मुस्लिमों और सिखों में अपने अलग राजनीतिक स्वार्थ की प्रवृत्ति को पनपाने का प्रयास किया। किसी जमाने में आपने भारत पर राज किया है- अंग्रेजों की सत्ता होने के पूर्व यहां की राज्य व्यवस्था मुस्लिमों और सिखों के हाथों में ही थी- इस प्रकार अलग राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति की आकांक्षा जगाकर अग्रेजों ने मुस्लिमों और सिखों को उत्तोजित करने का प्रयास किया। दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े हिन्दू-मूस्लिम एकता साध्य करनी ही होगी, इस प्रकार के प्रयास आरंभ हुए। अंग्रेजी सत्ता के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मुसलमानों ने दंगे-उपद्रव मचाने शुरु किए। कांग्रेस को अपनी उपद्रव क्षमता का ज्ञान कराने में इन दंगों का उपयोग परिण्मदायी सिध्द होने लगा। इन दंगों और उपद्रव-क्षमता के सहारे अधिकाधिक सुविधाएं और राजनीतिक अधिकर प्राप्त करने के मुस्लिम नेताओं के इरादे पूरे होने लगे। 
महात्माजी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन में बहिष्कार, असहयोग, कानून-भंग, शांतिपूर्ण सत्याग्रह आदि कार्यक्रम किए जाने लगे। नमक-सत्याग्रह, दांडी-यात्रा, जंगल सत्याग्रह आदि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में महात्माजी द्वारा अहिंसा का पालन किए जाने पर विशेष बल दिया जाता। इस कारण सत्याग्रह कार्यक्रम कष्ट प्रद होते हुए भी जन-जागृति के एक प्रभावी माध्यम के रूप में लोग उसे अपनाने लगे। महात्माजी ने सत्य व अहिंसा को राष्ट्रीय आंदोलन के सैध्दान्तिक अधिष्ठान के रूप में स्वीकार किया और यह अपील की कि जनता भी इसे जीवन-पध्दति के रूप में स्वीकार करे। 
महात्मा गांधी अपनी व्यक्तिगत बोल चाल में यह अवश्य स्वीकार करते कि ''मैं एक सनातनी हिन्दू हूं'' उनकी जीवन दृष्टि और जीवन पध्दति भी सनातनी हिन्दू के अनुरूप थी। किन्तु राष्ट्रीय आंदोलन में मुसलमानों को हिंदुओं के साथ एकत्र रखने तथा एकता की भावना से कार्यशील बनाए रखने के लिए उनकी स्वार्थपूर्ति में, देशहित में आवश्यक विचार व्यवहार और समर्पण की कितनी महंगी कीमत चुकानी पड़ैगी, शायद इसका अनुमान गांधीजी नहीं लगा पाए। पू. डॉक्टरजी के विचार में हिन्दू-मुस्लिम एकता प्रस्थापित करने के महात्माजी के इस प्रयास से मुस्लिमों की उदण्डता अधिक बढ़ेगी, अंग्रेजों से प्राप्त प्रोत्साहन उन्हें दंगे कराने के लिए प्ररित करेगा- इससे उनकी स्वार्थ पूर्ण राजनीति भूख बढ़ी ही जाएगी तथा दूसरी ओर असंगठित हिन्दू समाज का मनोबल घटेगा। अत: डॉक्टरजी के मन में यह विचार बल पकड़ने लगा कि 90 प्रतिशत हिन्दू समाज का मनोबन, उन्हें सुदृढ़ सुसंगठित कर बढ़ाने की बजाए वह टूटने से, हिन्दू समाज का आत्मविश्वास घटने के कारण मुस्लिम अनुनय की गांधीजी प्रणीत प्रक्रिया आत्मघातक ही सिध्द होगी। 
प्रादेशिक राष्ट्रवाद को स्वीकार किए जाने से भारत के राष्ट्रजीवन पर होने वाले उसके भयावह दुष्परिणामों की कल्पना से पू. डाक्टरजी बेचैन हो उठे- उनके मन में अनेक प्रकार के विचारों का कोलाहल चमने लगा। 'भारत में एक नया राष्ट्र अदित हो रहा है'- कांग्रेस की इस विचारधारा से प्रेरित भारत के निकट भूतकाल संबंधी ऐतिहासिक लेखनों में व्यक्त हिन्दुओं के सांस्कृतिक व धार्मिक प्रतीकों के विध्वंस को, कहीं हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए गांधीजी द्वारा अपनाए गए अनुनय के मार्ग को अपनाने से भूलना तो नहीं पड़ेगा? राष्ट्रविरोधी तत्वों तथा उनके अनुयायियों को साथ हुए संघर्ष में छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, महाराणा प्रताप आदि महान राष्ट्रभक्तों को भूलना क्या अनिवार्य नहीं होगा? कांग्रेस के आंदोलन में मुसलमानों को सहभागी बनाने के लिए गांधीजी सबकुछ करने के लिए तैयार थे। पू. डॉक्टरजी के मन में विचार चक्र घूमने लगा। अपने प्राचीन उज्जवल इतिहास के अध्ययन से ही हम राष्ट्रीयता और स्वाधीनता प्राप्ति की आकांक्षा की प्रेरणा ग्रहण करते हैं। उसमें से ही आत्मविस्मृत समाज में आत्मविश्वास उत्पन्न होकर देश के लिए अपने सर्वस्य का त्याग करने की प्रवृत्ति दृढ़ होती है। प्रखर देशभक्ति को जनसामान्य का स्वभाव बनाने केलिए स्वराज्य प्राप्ति करने में सफल योध्दा छत्रपति शिवाजी जैसे श्रेष्ठ आदर्श को निरंतर सामने रखना पड़ता है। अपन प्राचीन इतिहास और प्रेरक राष्ट्रपुरुषों का विस्मरण तो आत्मघातक ही सिध्द होगा। वंदेमातरम् राष्ट्रगीत की सामूहिक गायन और भारतमाता का जाघोष तो स्वातंत्र्य स्फूर्ति की गंगोत्री है। उसका विरोध करने वाली मुस्लिम मानसिकता उन दिनों दिखलाई देने लगी थी। मुसलमानों को खुश करने केलिए यदि इस राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय घोषणा का, उनकी इच्छानुसार त्याग करने का, यदि कांग्रेस ने निर्णय लिया तो भारत की राष्ट्रीयता का आधार ही छह जाएगा। गांधीजी के साथ वैचारिक मतभेद के बावजूद पूजनीय डाक्टरजी ने गांधीजी के नेतृत्व में उन दिनों हुए सभी आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। अंग्रेज शासकों ने डॉक्टरजी पर यह आरोप लगाकर कि 'आप भड़कीले भाषण देकर भारत की आजादी के लिए लोगों को भड़काते हैं'- उनके विरुध्द न्यायालय में मुकदमा दायर किया। अपने विचारों और वृत्ति के समर्थन में न्यायाधीश के सामने अपना पक्ष र रखा जाए। मैंने कोई अपराध नहीं किया है' सिर्फ इतना विनम्रता से कहकर न्यायाधीश जो दंडा दें एसे स्वीकार करो- कांग्रेसी नेताओं की यह नीति डॉक्टरजी को पसंद नहीं आई। उन्होंने अपने वक्तव्य से समर्थन में मूल भाषण से भी अधिक प्रखर और प्रभावी शब्दों में अपना पक्ष प्रस्तुत किया। इस अभियोग में डॉक्टरजी को सश्रम कारावास भोगना पड़ा। किन्तु न्यायालय के समक्ष उन्होंने जो बयान दिया वह सर्वत्र प्रकाशित हुआ। इससे सामान्य जनता को उनके विचारों से परिचित होने का एक और अवसर मिला। गावंश भरतीय कृषि प्रधान अर्थनीति का आधार है, साथ ही गाय के प्रति सभी भारतीयों में अपार श्रध्दा भाव है इसलिए भारत में गोवध बंदी, गो-संवर्धन और गोरक्षण आदि विषय पू. डॉक्टरजी के आग्रह के कारण ही गांधीजी ने सैध्दान्तिक रूप में स्वीकार किये। गांधीजी ने अपने एक उद्बोधन में यह तो कहा कि 'गोवध बंदी मुझे स्वराज्य से भी अधिक प्रिय है, 'किन्तु इस आशय का प्रस्ताव कांग्रेस के अधिवेशन में पारित कराने की बात उन्होंने नहीं मानी। शायद उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि मुसलमान इसके लिए तैयार नहीं होंगे और प्रस्ताव आने पर मुसलमानों द्वारा खुले रूप में विरोध किए जाने पर कांग्रेस की प्रतिमा धूमिल होगी। 
भारत में विदेशी अंग्रेजों के विरुध्द असंतोष जागृत करने का कार्य लोकमान्य तिलक ने प्रारंभ किया था। इसीलिए उन्हें 'भारतीय असंतोष के जनक' (Father of Indian Unrest) भी कहा गया। अंग्रेज सरकार के विरुध्द यह आसंतोष गांधीजी क असहयोग आंदोलन और सत्यग्रह आदि कार्यक्रमों के कारण सारे भारत में फैल गया। गांधीजी की इच्छा और आदेशों को मानकर अनेक ज्येष्ठ कांग्रेस नेताओं ने अपना काम धंधा-व्यवसाय आदि छोड़कर स्वदेशी का व्रत अपनाया। खादी का उपयोग करने और भारत में स्वदेशी का प्रचार करने का निश्चय किया। इससे सारे भारतवासियों में अंगेजी शासन के प्रति, शत्रु-भावना तीव्र होकर जागृति आयी। यह जनजागृति सभा, सम्मेलनों, जुलूसों, घोषणाओं आदि के माध्यम से की जाती। किन्तु इन माध्यमों से आयी जागृति और उत्साह अल्पकाल ही टिक पाता। अंग्रेज-सत्ता दमननीति अपना रही थी, इसलिए आंदोलन या कार्यक्रम का उत्साह ठंडा पड़ने पर एक प्रकार की निराशा और उदासीनता ही नजर आती थी। 1920 में हुए सत्याग्रह और 'एक वर्ष में स्वराज्य' की घोषणा से काफी जन जागृति हुई। हिन्तु विदेशी अंग्रेज सत्ता की दमन नीति के कारण अनेक प्रमुख नेताओं को कारावास भोगना पड़ा। इस काल में जागृत जनचेतना कमजोर हो गई। 1920-21 के इस सत्याग्रह के बाद इसी प्रकार के प्रभावी सत्याग्रह का दुबारा आयोजन करने में 10 वर्ष की अवधि बीत गयी। 1930-31 में कानून-तोड़ने का आंदोलन शुरु कर पाना संभव हो पाया। डॉक्टरजी को यह तीव्रता से अनुभव हुआ कि इन सत्याग्रह कार्यक्रमों से जनमानस में देशभक्ति की भावना और स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए हृदय में राष्ट्रभक्ति की उमंग निरंतर सातत्य से बनी रहना संभव नहीं हो पाया- इसीलिए वे काफी चिन्तित हुए। 
कांग्रेस के इस आंदोलन में चिंता करने योग्य एक और बात थी। असहयोग-सत्याग्रह- कानून तोड़ो आदि सारे कार्यक्रमों से लोगों और कार्यकर्ताओं की निष्ठा गांधीजी में केन्द्रित होती थी। निरपेक्ष और राष्ट्रहित समर्पित विचार करने की डॉक्टरजी की पध्दति में, यह बात अनुचित होने से खटकने वाली थी, क्योंकि उनकी यह मान्यता थी कि कोई व्यक्ति कितना ही सद्गुण सम्पन्न, चारित्र्यवान और सबके अंत:करण में आदर भाव जागृत करने वाला महान क्यों न हो, मातृभूमि की मुक्ति केलिए आवश्यक राष्ट्रसेवा और देशसेवा तथा समाज जागरण के कार्य का केन्द्रभूत आधार तो वह व्यक्ति नही बन सकता- ऐसा होना उचित भी नहीं। यदि किसी कारण से ऐसा केन्द्र बिन्दु बना व्यक्ति सामने न आने पाए और ऐसा महान व्यक्ति कार्यकर्ताओं का नेतृत्व कर पाने में अक्षम सिध्द हुआ तो राष्ट्रकार्य हेतु सिध्द होन वाले समाज कार्य को अपरिमित क्षति उठानी पड़ेगी। किसी भी श्रेष्ठ कार्य का आधार अडिग, अविचल और अनन्य श्रध्दा होनी चाहिए और यह श्रध्दा किसी श्रेष्ठ ध्येय की प्राप्ति के लिए, सर्वसामान्य व्यक्ति के हृदय को पुलकित कर सदैव प्ररेणादायी किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किए जाने वाले कार्य के प्रति होनी चाहिए। ''यह तो ईश्वरीय कार्य है'', इस प्रकार लोगों को उदात्ता और उत्तुंग प्रतीत होने वाले तथा तन-मन-धन से उसे जीवन कार्य के रूप में स्वीकार करने की भावना पैदा करने वाले कार्य के प्रति ही ऐसी श्रध्दा होनी चाहिए। डॉक्टरजी के मन में तीव्रता से यह विचार उत्पन्न होने लगा कि समाज जीवन कार्य-निष्ठ बने, व्यक्ति निष्ठ नहीं। इस विचार से डॉक्टरजी का मन बेचैन हो उठा।

6. विधायक कार्यक्रम

कांग्रेस ने जो कार्यक्रम अपनाए थे, उनमें सेवा कार्यों के साथ ही अच्छे संस्कार देने वाले कार्यक्रमों का भी समावेश था। संस्कार प्रदान करने के लिए अनेक आश्रम खोले गये। ये आश्रम प्रमुखतया ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ता तैयार करने हेतु सादगी पूर्ण स्वावलम्बी समाजार्पित जीवन जीने की प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए ही खोले गये। आश्रमी जीवन अपनाकर संस्कार ग्रहण करने का यह कार्यक्रम सामान्यजनों के लिए नही था। कुछ चुने हुए, इने-गिने त्यागी प्रवृति के लोग ही उसमें सहयोगी बने। श्रध्देय विनोबाजी, ठक्कर बाप्पा, शंकरराव देव, किशोरी लाल मश्रूवाला, आचार्य काका कालेलकर जैसे महान व्यक्तियों ने आश्रमवास अपनाया। गांधीजी की योजना के अनुसार इन आश्रमों के जीवन में अनुशासन था। सात्विक वृत्तिक वृत्ति के संवर्धन की वहां व्यवस्था थी, सत्य अहिंसा आदि सद्गुणों का विकास कर उन्हें जीवन का स्थायी भाव बनाने की योजना थी। शुध्दजीवन जीने की प्रेरण वहां प्राप्त होती थी। ग्राम प्रधान समाज व्यवस्था के निर्माण हेतु अध्ययन तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर वहां के लोगों से चर्चा कर हां का जीवन अधिक सुखी-समाधानी बनाने का प्रयत्न होता। सर्वोदय का लक्ष्य सामने रखकर उसकी प्राप्ति हेतु अनुसंधान कर समाज जीवन को भारतीयता की ओर मोड़ने का वह उपक्रम था। किन्तु, इन सारे संस्कार-प्रशिक्षण केन्द्रों में कुछ इने-गिने-चुने व्यक्ति ही शामिल हो सकते थे- सर्व सामान्य जनता को इन कार्यक्रमों में सहभागी बनाना असंभव था। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों की भांति आश्रमी-जीवन से संस्कार ग्रहण करने की योजना प्रशंसनीय थी। किन्तु उस काल में विविध कार्यों के निमित्ता उन ऋषि मुनियों का सामान्य जनता से प्रत्यक्ष सम्पर्क बना रहता था और शासन व्यवस्था पर भी उनकी कड़ी नजर होती। समाज हित में आवश्यक कार्य, राजा के द्वारा करवाने की क्षमता थी। यदि किसी राजा के चाल-चलन में समाज हित की बजाय स्वार्थ बढ़ता हुआ दिखाई देता तो उस राजा को पदच्युत करने का सामार्थ्य उनमें था। पराधीनता के काल में आश्रम के प्रमुखों से यह अपेक्षा तो कतयी नहीं की जा सकती थी। किन्तु आश्रम के सुसंस्कारित कार्यकर्ताओं से यह अपेक्षा तो अवश्य की जा सकती थी कि सम्पूर्ण भारतीयों के जीवन को स्थायी रूप से स्वदेशी में ढालते, उनके जीवन में राष्ट्र के प्रति निष्ठा को यदा सर्वदा के लिए प्रखर बनाने के लिए भारत के सहस्त्रावधि आश्रमों से लक्षावधि कार्यकर्ता तैयार कर जन-जीवन में समरस होने के लिए उन्हें भेजा जाए। किन्तु इतने अधिक पैमाने पर आश्रमों की स्थापना करना कांग्रेस के नेताओं के लिए संभव नहीं हो पाया। 
आश्रम व्यवस्था का एक लाभ हो हुआ। उस व्रतस्थ जीवन में, कुछ कार्यकर्ताओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योगों के विकास, शिक्षानीति आदि विषयों पर मौलिक चिंतन किया और वह चिंतन संदर्भग्रंथों के रूप में प्रकाशित भी हुआ। किन्तु उसके व्यावहारिक आचरणीय पहलू को समाजव्यापी बनाने के लिए आवश्यक कार्यकर्ताओं के अभाव में, यह मौलिक चिंतन ग्रंथों में बंदी बनकर पड़ा रहा। उनका अध्ययन करने वाले कुछ थोड़े से जिज्ञासु व्यक्तियों को छोड़ दिया जाये तो समाज के सभी स्तरों और क्षेत्रों में उनका प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया। 
प्राचीन काल की ऋषि-मुनियों की आश्रम व्यवस्था में जन-सम्पर्क के अन्य माध्यम भी अस्तित्व में थे। यज्ञ-त्याग, ज्ञानसत्र आदि में व्यापक पैमाने पर विचार-विनिमय, समाज की रूढ़ियों, कुप्रथाओं से मुक्त करने का आयोजन, मठ-मंदिरों के उत्सवों तथा कुंभ मेलों जैसे विशाल सम्मेलनों के माध्यम से जनता का प्रबोधन किया जाता। ऐसे प्रसंगों पर उद्बोधन कार्यकर्ताओं का समाज के सभी स्तर के स्त्री पुरुषों के साथ परस्पर सम्पर्क होने के कारण सामाजिक समस्याओं की प्रत्चक्ष जानकारी मिलती थी और उनके समाधान का मार्ग भी ढूंढा जाता था। म. गांधी द्वारा प्रणीत आश्रम योजना में प्रशिक्षित सभी कार्यकर्ताओं को व्यापक प्रवास कर समाज प्रबोधन करने का अवसर नहीं मिल पाया। यह सच है कि आचार्य धर्माधिकारी, शंकरराव देव, आ. कालेलकर आदि कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का ही जनता से सम्पर्क बना रहा।  
म. गांधी की प्रेरणा से प्रस्थापित आश्रम के प्रति और क्रियाशील आश्रमवासियों के प्रति जनता के मन में आदर की भावना थी। आश्रम के वास्तव्य में, केश-वपन कर व्रतस्थ रहना, सादा-सात्विक आहार ग्रहण करना, सत्य अहिंसा सिध्दांतों के अनुसार प्रत्यक्ष व्यवहार और ऐसे नियम-बध्द व्यवहार के कारण उसके प्रति आदर भावना के बावजूद सामान्यजनों में उस प्रकार का जीवन जीने की भावना उत्पन्न नहीं हो पायी। हां, यह सही है कि गांधीजी, विनोबाजी, ठक्कर बाप्पा जैसे महान व्यक्तियों के सहवास में कुछ व्यक्तियों का हृदय परिवर्तन कुछ मात्रा में अवश्य हुआ। 
ग्रामसेवा, ग्राम सफाई आदि कांग्रेस के कार्यक्रमों में आश्रमवासियों के साथ ही विद्यार्थी, नवयुवक और कुछ उत्साहीजन सहभागी बनते। सप्ताह में एक दिन निकटवर्ती किसी देहा तें जाकर वहां सफाई का कार्यक्रम हाथों में लिया जाता। इसे जीवन व्रत के रूप में स्वीकार करने वाले आश्रमवासियों के लिए यह ग्रामसेवा, अपने जीवन में सेवाभावना को दृढ़ बनाने में उपयोगी रही। ग्रामीण क्षेत्रों से निकटता प्रस्थापित करने में भी इस कार्यक्रम का उपयोग होता। किंतु जिन ग्रामवासियों के लिए तथा उप पर संस्कार करने के उद्देश्य से यह ग्राम-सफाई का कार्यक्रम लिया जाता उन पर इन कार्यक्रमों का क्या परिणाम होता था, यह देखना भी बड़ा उदबोधक है। ''हम अपना ग्रामीण क्षेत्र स्वयं साफ-सफाई कर स्वच्छ रखेंगे। इन श्रेष्ठ आश्रमवासियों को हमारे गांव की गंदगी हटाने का काम हम नहीं करने देंगे- हम खुद अपने हाथों से वह गंदगी हटायंगे, क्योंकि वह तो हमारा दायित्व है- हमारा काम हम स्वयं करेंगे।'' यह भावना लोगों में जागृत नहीं हो पायी। ग्रामीण जनता द्वारा इधर-उधर फैंका गया कचरा और गंदगी निशुल्क साफ करने वाले ये खादीधारी कार्यकर्ता हैं- यही भावना इन कार्यकर्ताओं के प्रति जनता में पैदा हुई। ये विचार, पुणे के प्रा. माटे ने ग्राम सफाई के कार्य का अपना निवेदन प्रस्तुत करते हुए व्यक्त किए हैं। 
पू. डॉक्टरजी समाज जीवन से निकट सम्पर्क प्रस्थापित कर उसके सुख दु:खों से समसर होना चाहते थे। वे स्वयं आश्रमवासी तो नहीं बने किन्तु आचार्य धर्माधिकारी, जमनालाल बजाज आदि ज्येष्ठ विधायक कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता थी। इन कार्यकर्ताओं के साथ नित्य उनका विचार-विमर्श होता रहता। आर्थिक विकास, स्वयंपूर्ण ग्रामीण क्षेत्रव्यवस्था, समाज व्यवस्था, स्वदेशी का पुरस्कार करने वाली शिक्षा, सदाचार, सर्वोदय आदि सभी बातों के लिए प्रयत्न करना आवश्यक होते हुए भी समाज के सभी क्षत्रों में उसे पहुंचाने और तदनुसार प्रत्यक्ष कार्य करने के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता है, कार्यकर्ताओं को निर्माण करने की। समाज जीवन की सर्वांगीण उन्नति के लिए चिंतनशील व्यक्तियों को परस्पर विचारों का आदान-प्रदान, विचार-विमर्श, करना चाहिए- यह आवयश्यक भी है। किन्तु इस विचार विनिमय से निकले निष्कर्ष के अनुसार विशाल देशवासियों के जीवन में उचित परिवर्तन लाने के लिए भारत के हर क्षेत्र में भारी संख्या में सक्षम कार्यकर्ताओं को खड़ा करने की आवश्यकता की सर्वोपरि प्रधानता दी जानी चाहिए। डॉक्टरजी के विचार में, ऐसे असंख्या कार्यकर्ताओं के अभाव में स्थायी समाज जागृति और स्वाधीनता प्राप्ति के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाने की प्रवृत्ति समाज मे निर्माण करना संभव नहीं हो पायेगा।

7. निष्कर्ष

1925 में विजयदशमी के शुभमुहूर्त पर संघ की स्थापना करने से पूर्व उन दिनों चलने वाले स्वाधीनता आंदोलन में डॉक्टरजी ने सक्रिय भाग लिया था। प्रमुख क्रांतिकारियों के तथा बाद कांग्रेस ने गरमदल के नेताओं के मार्गदर्शन में निरपेक्ष भावना से तथा सर्वस्वार्पण की वृत्ति से अपनी सारी शक्ति लगाकर कार्य करने की उनकी शैली के कारण इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं के मन में डॉक्टरजी के प्रति आदर भाव था। उनका मित्र-परिवार सारे भारत में फैला हुआ था। देश कार्य करते समय उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन का क्षण भर भी विचार नहीं किया। अपना पूर्ण कर्तृव्य भारतमाता के चरणों में समर्पित किया था। इस पृष्ठभूमि में, विविध आंदोलनों के मूलभूत विचारों तथा कार्यपध्दतियों का, भारत की राजनीतिक परिस्थियों का तथा अपने राष्ट्रजीवन के वैचारिक अधिष्ठान का वस्तुनिष्ठ विचार करने के बाद डॉक्टरजी ने जो निष्कर्ष निकाला, वही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में सामने आया। 
संघ की विचारधारा इतनी सरल और स्पष्ट है कि सामान्य व्यक्ति को भी सहजता से उसका आंकलन करना संभव है। अपने देश में, हिन्दू जीवन दृष्टि तथा हिन्दू जीवन पध्दति के आधार पर विकसित राष्ट्रजीवन विगत हजारों वर्षों से विद्यमान है। इस कारण यह प्राचीनतम राष्ट्र है। भारत में नये राष्ट्र जीवन के निर्माण की कोई आवश्यकता नहीं है और यह सोचने का कोई कारण नहीं कि यहां 'A new Nation in the making'. हमारे इस प्राचीन राष्ट्र पर अनेक बार आक्रमण हुए। शत्रुओं के अनेक आघात भारत को सहने पड़े। किन्तु इन सारे आक्रमणों और आघातों से जूझते हुए आज भी राम और कृष्ण का आदर्श अपने सामने रखकर जीवन बिताने वाला हिन्दुसमाज भारत में 90 प्रतिशत है। वनवासी, गिरिजन क्षेत्रों में तथा ग्रामीण क्षेत्रों का अनपढ़ और निरक्षर व्यक्ति श्री राम और कृष्ण की कथाएं जानता है। भारत माता, गौ माता और भागीरथी गंगा के प्रति उनके हृदय में अगाध श्रध्दा और भक्ति भाव होने के कारण भारत वर्ष में यत्र-तत्र हजारों की संख्या में इनके मंदिर देखे जा सकते हैं। भारत में 18-20 भिन्न किंतु समृध्द भाषएं प्रचलित हैं। उनकी लिपि भी अलग है किंतु प्रत्येक भाषा के श्रेष्ठ साहित्य में उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत आदि पुरुषोत्ताम श्री राम की कथाएं इन सभी भाषाओं के साहित्य में आपको पढ़ने को मिलेंगे। चार धामों की यात्रा करने से मनुष्य का जीवन सार्थक बनता है- यही भावना सबके हृदय में है। इसीलिए सांस्कृतिक एकता से अनुप्राणित भारत का समाज जीवन वेद-उपनिषद काल से आज तक अबाध गति से चलता आया है। हमारा यह अनादि हिंदूराष्ट्र है। यहां हिन्दू-जीवन प्रवाह को ही प्रधानता दी जानी चाहिए क्योंकि वही अपने राष्ट्र की वैचारिक और व्यावहारिक दृष्टि से रीढ़ की हव्ी है। भारत की उन्नति अथवा अवनति हिन्दू समाज-जीवन के सुदृढ़ अथवा दुर्बल व आत्मविस्मृत होने के कारण संभव हो सकी। आज भी अपनी राष्ट्रजीवन की दुर्दशा हिन्दु समाज के असंगठित रहने तथा राष्ट्रीयता का बोध न होने के कारण ही हो रही है। हिन्दुसमाज यदि सुसंगठित, बलशाली बना और अपने राष्ट्रजीवन के बोध से अनुप्राणित हुआ तो भारत की सारी समस्याएं हल करना सहज संभव हो सकेगा। हम विघटित और बंटे हुए रहे हैं, इसीलिए इस देश पर परकीय मुसलमान और अंग्रेज अपनी सत्ता प्रस्थापित कर सके। वास्तव में अपना शत्रु और कोई न होकर हम ही अपने राष्ट्रजीवन के मित्र अथवा शत्रु हैं। अपनी पराधीनता के लिए तुर्क, मुगल अथवा अंग्रेजों को दोष देने का कोई कारण नहीं। हमने आज तक इस बात की चिन्ता नहीं की कि हमारा समाज सुदृढ़, शक्तिशाली, सुसंगठित, अनुशासित और राष्ट्रभावना से भरा हुआ हो- इसीलिए हम पर ये आपत्तियां और संकट आये। अत: यदि इसकी चिंता करके अपने हिन्दुसमाज को यदि हम बल सम्पन्न- सुसंगठित करें तो ये संकट सहजता से दूर किए जा सकेंगे। हम जानते हैं कि हिन्दूसमाज पर हुए धार्मिक आक्रमण के कारण अपने ही कुछ बांधव मुसलमान और ईसाई बनने के लिए मजबूर हुए। यदि हिन्दूराष्ट्रजीवन शक्तिशाली बना तो उनकी पुन: स्वधर्म में वापसी कोई कठिन बात नहीं। इसीलिए आज की सर्व प्रमुख आवश्यकता हिन्दुसमाज को सुसंगठित बलशाली बनाने की है। पू. डॉक्टरजी के चिंतन का यही निष्कर्ष था। 
हिन्दु समाज को अपना राष्ट्रजीवन पहिचानकर उसे अपनाना चाहिए। स्वर्ग से भी श्रेष्ठ और श्रध्देय अपनी बात भारत माता के हम सब पुत्र हैं। इसीलिए हम सारे सगे बंधु हैं। इस आत्मीयता और बंधु-प्रेम की अनुभूति समाज के प्रत्येक व्यक्ति में जागृत कर निरपेक्ष बंधुभाव के स्नेह से उन्हें परस्पर जोड़ना ही संघ कार्य का भावनात्मक मौलिक विचार है। हम आपस में झगड़ते थे, इसीलिए मुसलमान और अंग्रेज यहां अपना वर्चस्व प्रस्थापित कर सके। हमने ही अपने बनवासी, गिरिजन और हरिजन बंधुओं की उपेक्षा की। वे भी समान श्रध्दा के कारण अपने ही राष्ट्रजीवन के अभिन्न अंग हैं। वे निर्धन, निरक्षर भले ही हों, पर अपने ही राष्ट्रीय समाज के घटक हैं। हम उन्हें भूल गये। राष्ट्रीय एकात्मकता के सूत्र को उन तक पहुंचाने और उसे मजबूत बनाने की चिंता हमने आज तक नहीं की। यह हमारा अपना दोष है। इस दोष को निर्मूलन कर अपने ही प्रयत्नों ये हम यहां का राष्ट्रजीवन, एक राष्ट्रपुरुष के नाते विश्व में अजेय शक्ति के रूप में खड़ करेंगे। संघ कार्य के मूल में ही यही प्रेरक और विधायक विचार रहा है।  
पू. डाक्टरजी ने भारत माता के प्रति अनन्य श्रध्दा को ही संघ कार्य के अधिष्ठान के रूप में स्वीकार किया। अपने हिन्दूसमाज के प्रति आत्मीयता और स्नेहपूर्ण व्यवहार से हिन्दू समाज को सुसंगठित करने का कार्य हाथों में लिया। वैसे देखा जाये तो इन सारे विचारों से अपना समाज परिचित था। इस कारण भारतमाता की पूजा का विचार, भारत की सर्वांगीण उन्नति के सूत्र के रूप में अपने पास है। हम प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर अपने राष्ट्र को परम वैभव की स्थिति पर ले जायेंगे। इस विचार से समाज में स्फूर्ति पैदा हुई। भारत माता की आराधना का, संघ कार्य का आधारभूत विचार तो स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद तथा लोकमान्य तिलक जैसे महान नेताओं ने पहले ही प्रतिपादित किया था। अंतर केवल इतनी है कि संघ की अपनी कार्यपध्दति से डाक्टरजी ने उस विचार को समाज जीवन में चरितार्थ कर दिखाया। आसेतुहिमाचल विशाल भारत में फैले इस हिन्दुसमाज को सुसंगिठत करने की विशेष कार्यपध्दति डॉक्टरजी ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से विकसित की। जून 1940 में उनके देहावसान के पूर्व ही उन्होंने स्वयं संघ की विशेष कार्यपध्दति के सर्वांगीण विकास की रूपरेखा कार्यान्वित कर दिखाई थी। 
पू. डॉक्टरजी ने संघ की कार्यशैली किस तरह विकसित की इसका विचार हम अगले अध्यायों में विस्तार पूर्वक करेंगे।

8. किशोर-युवकों से संघ कार्य का प्रारंभ

1925 में जब संघ का कार्य प्रारंभ हुआ, तब डॉक्टरजी की आयु 35 वर्ष की थी। तब तक उन्होंने तत्कालीन स्वातंत्र्य प्राप्ति हेतु चल रहे सभी आंदोलनों और कार्यों में जिम्मेदारी की भावना से कार्य किया। संघ का कार्य प्रारंभ करने के लिए उन्होंने 12-14 वर्षों की आयु वाले कुछ किशोर स्वयंसेवकों को साथ में लेकर नागपुर के साळूबाई मोहिते के जर्जर बाड़े का मैदान साफर करके, कबड्डी जैसे भारतीय खेल खेलना प्रारंभ किया। ऊपरी तौर पर देखा जाये तो यह एक प्रकार का विरोधाभास ही प्रतीत होता है। उनके अनेक मित्रों ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा भी था- डॉक्टर हेडगेवार ने आसेतु हिमाचल फैले इस विशाल हिन्दुसमाज को राष्ट्रीयता के रंग में रंगकर सुसंगठित करने का प्रयास सफल सिध्द करके दिखाने के उदात्ता और भव्य कार्य का आरंभ माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शालेय छात्रों के साथ कबड्डी खेल कर किया। 
डॉक्टरजी का मित्र- परिवार काफी बड़ा था। फिर भी उन्होंने इन मित्रों को उकत्र कर कोई सभा-सम्मेलनों का आयोजन नहीं किया। सार्वजनिक अथवा किसी निजी स्थान पर अपने चहेतों की सभा लेकर, भाषण आदि देकर कोई प्रस्ताव आदि पारित करने के चक्कर में भी वे नहीं पड़े। अंग्रेजो के विरुध्द असंतोष भडकाने वाला भाषण देकर लोगों का उद्बोधन नहीं किया। 'भारत के उत्थान हेतु मैं एक नये कार्य का श्रीगणेश कर रहा हूं'- ऐसी कोई घोषणा भी नहीं की।समाचार पत्रों में लेख आदि लिखकर अथवा जाहिर भाषण में संघ कार्य के विचार शैली और कार्य-शैली की कोई संकल्पना (Blue Print) भी प्रकट नहीं की। ये सारी बातें तत्कालीन प्रचलित पध्दति के अनुसार न करते हुए केवल 20-5 किशोर स्वयंसेवकों को साथ लेकर कबड्डी जैसे देशी खेल खेलने का कार्यक्रम शुरु किया। प्रारंभिक दिनों में इन स्वयंसेवकों के समक्ष भी भाषण आदि देकर संघ विचारों का प्रतिपादन नहीं किया। खेल समाप्त होने के बाद संघ स्थान पर अथवा अन्य समय में अनौपचारिक रूप से इन किशोर स्वयंसेवकों के साथ वार्तालाप हुआ करता। 
कबड्डी जैसे खेलों से शाखा का कार्य प्रारंभ होने पर डॉक्टरजी के अनेक मित्रों ने पूछा कि आप सारे कामों से मुक्त होकर इन छोटे बच्चों के साथ कबड्डी खेलने में क्यों लगे हैं? डॉक्टरजी ने उनके साथ कभी वाद विवाद या बहस नहीं की। तर्क और बुध्दि का सहारा लेकर संघ कार्य का महत्तव समझाने का प्रयास भी नहीं किया। तब तक किए गए सारे सामाजिक कार्यों से मुक्त होकर वे मोहिते बाड़े में लगने वाली सांय शाखा में किशोर स्वयंसेवकों के साथ तन्मय होकर खेलकूद में शामिल होने लगे। शाखा के कार्यक्रमों का ठीक ढंग से आयोजन करने, सारे कार्यक्रम अच्छे ढंग से बिना किसी भूल के सम्पन्न हों, इसके लिए एकाग्र चित्ता से वे संघ कार्य में जुट गये। नये शुरु किये गये इस कार्य का नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है, यह बात भी प्रारंभिक दिनों में उन्होंने स्वयंसेवकों से नहीं कही। केवल तन्मयता से विविध खेलों के कार्यक्रमों में वे रंग जाते और अपने साथ किशोर स्वयंसेवकों को भी रमाने का प्रयास करते और इस प्रकार संघ की शाखा शुरु हुई। 
शाखा के साथ ही कार्यपध्दति का विकास भी प्रारंभ हुआ। स्वयंसेवकों के साथ परिचय होने के साथ ही अनौपचारिक वार्तालाप शुरु हो गया था। स्वयंसेवकों का नाम, शिक्षा, घर की स्थिति आदि के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेने के बाद, यदि कोई स्वयंसेवक किसी दिन शाखा में नहीं आया तो अन्य किशोर स्वयंसेवकों को साथ लेकर डॉक्टरजी उसके घर जाते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे स्वंयसेवकों के माता-पिता और परिवारजनों के साथ परिचय होने लगा। डॉक्टरजी जैसा ज्येष्ठ चरित्रवान कार्यकर्ता अपने बच्चे की पूछताछ करने, स्वास्थ संबंधी जानकारी प्राप्त करने बड़ी आस्था से अपने घर आता है, यह देखकर स्वयंसेवकों के घर के लोग भी प्रभावित होते। डॉक्टरजी के अपने घर आने से उन्हें बड़ी खुशी होती। कोई स्वयंसेवक यदि गंभीर रूप से बीमार होता तो डॉक्टरजी बड़े चिन्तित रहते- उस बीमार स्वयंसेवक के लिए अस्पताल से दवाई लाने, इलाज करने वाले डॉक्टरों से आस्था पूर्वक पूछताछ और विचार-विनिमय करने तथा आवश्यक हुआ तो बीमार स्वयंसेवक की सेवा सुश्रुषा के लिए रात भर जागरण करने के लिए स्वयंसेवकों को उसके पास भेजने की व्यवस्था की जाती। इस प्रकार के व्यवहार से स्वयंसेवकों में परस्पर मैत्री पूर्ण संबन्ध अधिक मजबूत होने लगे। साथ ही प्रत्येक स्वयंसेवक के विचारों और भावनाओं का भी डॉक्टरजी को परिचय होने लगा। स्वयंसेवकों के सुख-दु:ख में समरस होने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। स्वयंसेवकों में सगे भाई से भी आत्मीयता के परस्पर सम्बन्ध बनने लगे। परस्पर हृदयस्थ विचारों से परिचित होकर निरपेक्ष स्नेह से मित्रता कैसे प्रस्थापित की जाए, नये-नये विश्वास पात्र मित्र कैसे बनाये जाएं आदि बातों के सम्बन्ध में डॉक्टरजी ने अपने प्रत्यक्ष व्यवहार से स्वयंसेवकों को संस्कारित किया। स्वयंसेवकों के घनिष्ठ मित्रों का यह परिवार धीरे-धीरे बढ़ने लगा। एक दूसरे के साथ आत्मीयता से जुड़े स्वयंसेवकों का यह परिवार और उस परिवार के मुखिया के रूप में डॉक्टरजी, इस तरह संघ का स्वरूप धीरे-धीरे विकसित होने लगा। सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने का व्यापक अनुभव डॉक्टरजी को प्राप्त था। इसलिए डॉक्टरजी का स्वयंसेवकों के साथ हंसना-खेलना-बोलना आदि सभी बड़े अनौपचारिक ढंग से चलता। ये अनौपचारिक बैठकें उनके घर में ही होती। इन बैठकों में होने वाले वार्तालापों में डॉक्टरजी अनेक घटनाओं के सन्दर्भ में, बड़ी सहजता से अपने अनुभवों को सुनाते, ये अनुभव बड़े बोधप्रद होते। साथ में हंसी-मजाक और दिल्लगी का दौर भी चलता। इसलिए ये बैठकें कभी-कभी घंटों चलती रहती- सभी स्वयंसेवक उसमें इतने रम जाते कि समय का किसी को ध्यान नहीं रहता। 
संघ के कार्य में बैठक शब्द एक नये अर्थ में स्वयंसेवकों में प्रचलित हुआ। अनौपचारिक वार्तालाप और हास्य-विनोद से परस्पर मनों को जोड़ने वाली एक नयी कार्यशैली विकसित हुई। इन बैठकों में डॉक्टरजी अनेक घटाओं केसन्दर्भ मे अपने अनुभवों के साथ बड़े रोचक ढंग से जानकारी प्रस्तुत करते- इसमें विनोद के साथ ही अत्यंत सरल शब्दों में, राष्ट्रीय भावना के लिए पोषक मार्गदर्शन भी होता। तरह-तरह के मानवी स्वभावों, अंतर्मन की भावना को प्रकट करने वाले रोचक उद्गारों, शब्द प्रयोगों को लेकर प्रचलिक समाज की स्थिति को समझाने का प्रयास भी होता। यह सब हंसी-विनोद के साथ चलता और इसलिए इन बैठकों के प्रति स्वयंसेवकों का आकर्षण बढ़ने लगा। डॉक्टरजी के निवास स्थान पर भी नित्य अधिकाधिक संख्या में ये बैठकें रात्रि के 9 - 9॥ से 12 बजे तक चलती रहती।  
डॉक्टरजी ने इन बैठकों में स्वयंसवकों को खुले दिल से अपनी बातें कहने की आदत भी डाली। वार्तालाप का सूत्र टूटने न पाये, स्वंयसेवक अपना विचार व्यक्त करते समय भटकने न लगें- विचार प्रकटन मे सुसंगति बनी रहे- इसकी चिंता डॉक्टरजी बड़ी कुशलता से करते। इन बैठकों में स्वंयसेवकों के गुण- अवगुणों का निरीक्षण भ्ज्ञी होता। बैठक में कौन कौन उपस्थित थे- किसने कौनसी शंका व्यक्त की- उस पर कौन क्या बोले आदि सारे वार्तालाप की बारीकियों को ध्यान में रखा जाता- इसके हरेक के स्वभाव, बोलने की शैली, विषय प्रतिपादन करने की कुशलता, उसके कर्तृव्य और उसकी गुणसंपदा बढ़ाने के लिए क्या क्या आवश्यक है- आदि बातों का निदान भी होने लगा। 
स्वयंसेवकों और समाज के अन्य बांधवों के साथ प्रेम से, सीधे सरल शब्दों में किस तरह बातचीत की जाए, अपने कार्य के प्रति उसकी सहानुभूति और अनुकूलता अर्जित करने के लिए मित्रता कैसे सुदृढ़ की जाए, सामूहिक चिंतन और विचार-विनिमय में अपने विचार किस तरह व्यक्त किए जाएं- ऐसी अनेक छोटी-छोटी प्रतीत होने वाली किंतु संघ कार्य को मजबूती से खड़ा करने के लिए अत्यावश्यक बातों का डॉक्टरजी बड़ा ध्यान रखते थे। जहां आवश्यक हो, वहीं वे मार्गदर्शन करते। अपने मित्रों और सहयोगियों को परस्पर अनुकूल बनाने में उपयोगी सिध्द हो सके ऐसी पध्दति से बैठकों में अथवा परस्पर वार्तालाप में बोलने की आदत डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों में डाली। प्रत्येक स्वयंसेवक के मन में आस्थपूर्वक अपने राष्ट्र की उन्नति के लिए संघ कार्य करने की इच्छा होती है। हरेक बोल-चाल की शैली में भिन्नता स्वाभाविक है- यह जानते हुए प्रत्येक स्वयंसेवक के विचारों को सुनने के आद सम्पूर्ण समाज और देश के हित में वस्तुनिष्ठ विचारों का प्रतिपादन और अंत में निष्कर्ष के रूप में सर्वानुमति से सबके सामने उल्लेख करना और जो दोष दिखाई दें उनका उल्लेख सबके सामने न करते हुए सम्बन्धित व्यक्ति से अकेले में बातचीत कर उस दोष को दूर करने का प्रयास करना- धीरे-धीरे यह आदत सभी स्वयंसेवकों को हो गई। हरेक स्वयंसेवक का, स्वभाव वैचित्र्य के कारण अभिव्यक्ति का ढंग भी अलग होता है- यह होते हुए भी उन सभी में वैचारिक और व्यावहारिक सामंजस्य प्रस्थापित करने की पध्दति से डॉक्टरजी ने हरेक स्वयंसेवक के जीवन को एक नई दिशा दी। स्वयंसेवकों में भी सामंजस्य की यह आदत विकसित होती गयी। परिणाम स्परूप नये-नये मित्रों से पहचान, उनके साथ घनिष्ठता में वृध्दि, उनके साथ सम्पर्क से संघ के विचारों और कार्य के प्रति सहानुभूति और निकटता बढ़ाकर उन्हें संघ की शाखा में लाने का प्रयास होने लगा। प्रारंभ में, प्रत्येक स्वयंसेवक के साथ डॉक्टरजी का सम्पर्क बना रहा। किन्तु जैसे-जैसे कार्य बढ़ता गया वैसे केवल प्रमुख कार्यकर्ताओं से नित्य का संबंध और व्यक्तिगत बातचीत में मार्गदर्शन करना ही डॉक्टरजी के लिए संभव हो पायां 
संघ कार्य प्रारंभ होने पर, हरेक बैठक में डॉक्टरजी स्वयं सभी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर संघ कार्य से सम्बन्धित सभी विषयों का चिंतन और विचार विनिमय किया करते। उनके मन में संघ कार्य की पूर्ण रूपरेखा और कार्य विस्तार की पूर्ण संकल्पना स्पष्ट रूप में थी। किंतु सारे कार्यकर्ता स्वयंसेवक तो किशोर युवक थे। उनकी उम्र भी उस समय 12-14 वर्ष की रही होगी। फिर भी कार्य के सम्बन्ध में विचार-विनिमय व सामूहिक चिंतन से सर्वसम्मति निर्णय लेने की कार्य पध्दति इन कार्यकर्ताओं के बैठक में ही विकसित हुई। संबंधित सभी कार्यकर्ताओं के साथ वार्तालाप होने के बाद ही सर्वसम्मत निर्णय लेना यह संघ की कार्य पध्दति का अंग बन गया। आदेश देने वाला एक नेता और बाकी सारे अनुयायी अथवा विचार-चिंतन निर्णय करने वाला केवल एक नेता और बाकी सारे उसकी आज्ञा का पालन करने वाले- इस प्रकार की कार्य पध्दति डॉक्टरजी त्याज्य मानते थे। सबके साथ खुले वातावरण में मुक्त विचार विमर्श कर, सबके विचारों का यथोचित आदर करते हुए वस्तुनिष्ठ और कार्य को प्रमुखता देकर 'पंच परमेश्वर' की भावना से बैठक में लिये गये निर्णय को शिरोधार्य मानकर सभी ने मन:पूर्वक कार्य करने की पध्दति संघ में विकसित हुई। इसी में से, हरेक की थोड़ी बहुत वैचारिक मत-भिन्नता के बावजूद, सबके हृदयों को एक साथ जोड़ने- एक दिल से कार्य करने की तथा राष्ट्रीय की भावना से ओत-प्रोत संघ शक्ति निर्माण करने वाला राजमार्ग प्रशस्त होता गया।  

9. कागज, पेन्सिल और पैसे के बिना सम्पन्न कार्यारंभ

संघ कार्य का शुभारंभ कैसे हुआ? इसका आज जब हम विचार करते हैं तो कुछ अटपटा, आश्चर्यजनक और असंभव सा लगता है। सत्तार वर्षों बाद संघ का कार्य आज देश-विदेश में फैला, विशाल रूप में देखने को मिल रहा है। समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में संघ के विचारों से अनुप्राणित अनेक स्वायत्ता स्वतंत्र संस्थाएं कार्यरत हैं। सभी क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं में वैचारिक समन्वय प्रस्थापित करने की योजना भी साकार की गई है। किंतु इस संघ कार्य का प्रारंभ बड़े विलक्षण झंग से हुआ। पू. डॉक्टरजी के घर की आर्थिक स्थिति बड़ी दयनीय थी। उनके बड़े बंधु सीताराम पंत पौरोहित्य का कार्य करते थे। उसमें जो कुछ थोड़ी आय होती थी, उससे घर-परिवार का खर्चा कैसे पूरा होता होगा, आज इसकी कल्पना मात्र हमें बैचेन करती है। किन्तु संघ कार्य प्रारंभ करते समय एक नयी अखिल भारतीय भव्य संघटना का विचार कार्यान्वित करते समय पू. डॉक्टरजी ने कभी रुपये-पैसे की चंता नही की- उसी भांति कागज पेन्सिल, फाइलें आदि लेखन सामग्री का उपयोग कर इस संगठन का नाम लिखकर कार्य का श्री गणेश नहीं किया। इस संगठन का नाम क्या रहेगा, कौन इसके पदाधिकारी होंगे, हरेक को कौनसी जिम्मेदारी सौंपी है, उसका काम क्या रहेगा, उसे कौन से अधिकार प्राप्त हैं- आदि बातें कागज पर लिखने का कभी प्रयास नहीं किया। अपने किशोर युवा स्वयंसेवकों के साथ तन्मयता से लाठी-खेल आदि कार्यक्रम संघ स्थान पर करना और घर की बैठकों में तथा शाखा छूटने के बाद संघ स्थान पर ही सभी स्वयंसेवकों से पूर्णतया समरस होकर अनौपचारिक वार्तालाप चर्चा आदि के साथ ही इस संगठन का कार्य प्रारंभ हुआ। 
अपने संघ का नाम क्या हो, इस सम्बन्ध में, बैठकों में स्वयंसेवकों के साथ खुले मन से चर्चाएं प्रारंभ हुईं। हंसते खेलते चलनेवाली इन चर्चाओं में डॉक्टरजी ने किशोर युवा स्वयंसेवकों को मौलिक विचारों के चिंतन हेतु प्रवत्ता किया। वे स्वयं इन अनौपचारिक चर्चाओं का सूत्र संचालन करते और आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन भी करते। बैठक में उपस्थित सभी स्वयंसेवकों को अपने संगठन का नाम सुझाने और वह नाम क्यों उचित रहेगा- यह खुले दिल से बताने की छूट थी। एक स्वयंसेवक ने संगठन का नाम 'शिवाजी संघ' सुझाया और इस नाम के समर्थन में उसने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस काल में स्वराज्य की स्थापना की, उस समय जो परिस्थिति थी, वैसी ही परिस्थिति आज भी भारत में विद्यमान है। शिवाजी ने जिस प्रकार स्वराज्य स्थापना का उपक्रम हाथों मे लिया, अपने कार्य का स्वरूप भी वैसा ही है। भारत को स्वत्रंत करने के लिए हमें भी अथक परिश्रम करने पड़ेंगे- इस कार्य में शिवाजी महाराज हमारे आदर्श हैं। इसलिए यही नाम सर्वाधिक उचित रहेगा। 
एक अन्य स्वयंसेवक ने 'जरीपटका मंडल' नाम सुझाया। इस नाम के समर्थन में उस स्वयंवेक ने कहा कि यह सही है कि समर्थ रामदास स्वामी और छत्रपति शिवाजी ने जुल्म ढहाने वाली बर्बर यावनी सत्ता को नष्ट कर स्वराज्य की स्थापना की- यही कार्य हमें भी करना है। किंतु भारत के अन्य प्रांतों में भी परकीय सत्ता को नष्ट करने के प्रयास हुए। महाराष्ट्र में समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी ने जो कार्य किया- वही कार्य पंजाब में गुरु गोविंदसिंगजी ने किया। अपना कार्य देशव्यापी होने के कारण केवल एक महान नेता का ही उल्लेख संघ के नाम में करना उचित नहीं होगा। इसकी अपेक्षा उन्हें प्रेरणा देने वाले जिस जरीपटका-ध्वज के प्रभाव से परकीय सत्ता नष्ट हुई- वह नाम उपयुक्त रहेगा- इस दृष्टि से 'जरीपटका मंडल' अच्छा है।  
एक और स्वयंसेवक ने 'हिन्दू स्वयंसेवक संघ' -इस नाम को सर्वोत्ताम बताते हुए कहा कि हमारा यह हिन्दुओं का संगठन है। इसमें अन्य धर्मीय नहीं आयेंगे। इस कारण 'हिन्दू स्वंयसेवक संघ' नाम से ही युक्ति संगत होगा। इसके बाद श्री पा. कृ. सावळापुरकर बोले, जो उस समय युवा विद्यार्थी थे। उन्होंने संगठन का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' सुझाया और कहा कि हमारा कार्य राष्ट्रीय है। इस कार्य में, हमारा यह प्रयास है कि स्वयंप्रेरणा से, निरपेक्ष भावना से देश कार्य करने वाले कार्यकर्ता तैयार किए जाएं- इस कारण 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' ही सभी दृष्टि से युक्ति संगत और उचित होगा। 
इस बैठक में 26 स्वयंसेवक उपस्थित थे। अनेक स्वयंसेवकों ने इस विषय में अपने विचार व्यक्त किये। उनमें से कुछ प्रमुख नामों का ही ऊपर उल्लेख किया है। चर्चा के अंत में डॉक्टरजी बोले और उन्होंने कहा कि भारत में हिंदू ही राष्ट्रीय है। इस कारण हिन्दू और राष्ट्रीय- दोनों शब्दों से एक ही अर्थ बोध होता है- दोनों समानार्थी हैं। किंतु आज यह प्रचार हो रहा है कि भारत में रहने वाले सभी का यह राष्ट्र है।- एक प्रादेशिक राष्ट्रवाद की आत्मघाती कल्पना उभर रही है। इस प्रचार के कारण भारत को अपनी पाव मातृभूमि मानने वालों को और हमने यहां राज किया है, इसलिए भारत हमारा है- ऐसा मानने वाले स्वार्थी तत्वों को समान स्तर पर मानने की प्रवृत्ति उत्पन्न् होती है। इससे राष्ट्र के लिए पोषक और विरोधी दोनों को ही राष्ट्रीय मानने की गल्लत होगी। हमारा कार्य हिन्दू समाज को संगठित करने का है- हिन्दुत्व यही राष्ट्रीयत्व है- यह हमारा आधारभूत विचार है। इसलिए संघ का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' रखना सर्वथा उचित होगा और जहां तक विचारों के प्रतिपादन का प्रश्न है, हम यही कहेंगे कि संघ केवल हिन्दु समाज को सुसंगठित कर इतना बलशाली बनाना चाहता है कि भारत की ओर शत्रु की नजर से देखने की इच्छा जगत में किसी की न हो सके। भारत में रहने वाले अन्य धर्मीय दो-चार पीढ़ियों के पूर्व तो हिन्दू ही थे। उनके मन में राष्ट्रीयता की आधारभूमि मातृभूमि के प्रति भक्ति की भावना विद्यमान है। इस दृष्टिकोण को विकसित किये जाने की आवश्यकता है। इसके पूर्व, हिन्दू नाम से पहिचाने जाने वाले अपने हिन्दू समाज को सुसंगठित और बलशाली बनाना हमारी प्रथम आवश्यकता है। सभी लोगों के हृदय में विशुध्द राष्ट्र भाव प्रखरता से जागृत करते समय पहले यह कार्य हिन्दू समाज में करना आवश्यक है। अन्य धर्मावलम्बियों के हम विरोधी नहीं है। संघ कार्य का यह राष्ट्रीय स्वरूप तथा तदनुसार कार्यपध्दति 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' इस नाम से ही समाज मेकं सामने रहना सर्वथा उचित रहेगा। डॉक्टरजी ने बैठक केसमापन में उक्त आशय के विचार व्यक्त किये। 
इतनी सीधी सरल और स्पष्ट भाषा में संघ कार्य की रूपरेखा प्रस्तुत करने वाला डॉक्टरजी का उक्त भाषण सुनने के बाद सभी ने एकमत से संगठन का नाम 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' निश्चित किया। नाम निश्चित करते समय हुए विचार विनिमय मे मेरा भी सहभाग था इस भावना से स्वयंसेवकों में कार्य सम्बन्धी चिन्तन करने का आत्मविश्वास भी बढ़ा। उन सभी में जिम्मेदारी की भावना भी बढ़ी। वे डॉक्टरजी की विचार शैली को धीरे-धीरे आत्मसात करने लगे। 
इस प्रकार 1926 के अप्रैल माह में रामनवमी के पूर्व, एक अभिनव पध्दति से संघ का नामकरण हुआ और वह भी संघ शाखा शुरु होने के छह माह बाद! कार्य पहले शुरु हुआ और नामकरण बाद में हुआ एक तरह से यह सृष्टि के नियमानुसार ही हुआ। जन्म होने के बाद ही शिशु का नामकरण होता है- संघ के बारे में भी यही हुआ। 

10. ध्वज और प्रार्थना

मोहिते संघ स्थान पर शाखा के कार्यक्रम शुरु होने के बाद अपना ध्वज कौन सा रहे और कार्यक्रम के अंत में प्रार्थना कौनसी रहे, इस विषय में भी अनौपचारिक बातचीत शुरु हुई। इस सम्बन्ध में हरेक स्वयंसेवक से कहा गया कि वे खुल मन से अपने विचार व्यक्त करें। पहले ध्वज के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए जाएं- ऐसा डॉक्टरजी ने सूचित किया। एक स्वयंसेवक ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमारे देश के राष्ट्रीय जीवन में हिंदू धर्म व हिन्दु संस्कृति का आधार ही केन्द्र बिन्दु के रूप में प्रमुख विषय है। मठ-मंदिरों के कारण ही, भारत पर आज तक हुए अनेक आक्रमणों- आघातों से हम सुरक्षित रह सके हैं। उनमें समय-समय पर किये जाने वाले उद्बोधनों के कारण ही हिन्दू समाज की अस्मिता कायम रह सकी है। इसलिए मठ-मंदिरों पर फड़कने वाला लाल रंग का त्रिकोणी ध्वज हमारे लिए ठीक रहेगा। दूसरे स्वयंसेवक ने कहा- धर्म और संस्कृति के प्रति अभिमान के साथ ही हमने भारत को विश्व में अजेय बनने योग्य, बलशाली बनाने का भी बीड़ा उठाया है- इस कार्य में हम विजयी होंगे, ऐसी हमारी आकांक्षा भी है। विजय और यशस्विता का रंग धवल (शुभ्र) होने के कारण क्या शुभ्र-सफेद रंग का ध्वज हमारे लिए उपयुक्त नहीं रहेगा? इस पर तीसरे स्वयंसेवक ने कहा कि महाराणा प्रताप को केसरिया रंग का ध्वज प्रिय था। साका और आत्मसमर्पण की तैयारी केसरिया वस्त्र धारण कर ही होती थी। अपने कार्य में देशधर्म के लिए सर्वस्व अर्पण का विचार प्रमुखता से रख जाता है। इस कारण केसरी रंग का ध्वज ही सभी दृष्टि से उपयोगी रहेगा। एक अन्य स्वयंसेवक ने भी इसी आशय का विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिंदवी स्वराज्य की स्थापना के लिए किए गए प्रदीर्घ संघर्ष में सफलता प्राप्त करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज का स्फूर्तिध्वज जरीपटका था। उस समय ऊंचे लकड़ी के स्तम्भ पर बंधा हुआ लाल रंग का पटका तथा वैभव की आकांक्षा सूचित करने वाला जरीपटका इस प्रकार जरीपटका यह स्वराज्य और समृध्दि का प्रतीक माना जाता था- वही जरी पटका हमारे लिए भी ठीक रहेगा। उस समय हुई अनौपचारिक चर्चा में व्यक्त कुछ प्रमुख विचारों का ही उल्लेख यहां किया है। 
डॉक्टरजी ने सबके विचार सुनने के बाद, सारे विचारों का समन्वय करते हुए कहा कि भारत में आज तक, निरपेक्ष देशभक्ति, शुध्दशील चारित्र्य, त्याग सफलता व समर्पण भावना के प्रतीक के रूप में भगवा ध्वज ही रहा है। सूर्योदय के समय आकाश को दीप्तिमान करने वाला स्वर्ण-गैरिक रंग का यह भगवा ध्वज ही अपने राष्ट्र का विजय केतु रहा है। महाभारत के युध्द में अर्जुन के सारथी बने कृष्ण के रथ पर भी दो तिकानों वाला ध्वज ही था। हमें भी वही परम्परागत भगवा ध्वज ही अपनाना चाहिए। शुध्द स्नेह का प्रतीक लाल रंग, त्याग वृत्ति और शुध्दता का प्रतीक पीला रंग और यश-सफलता का सूचक शुभ्र धवल रंग- इन तीनों को एक साथ मिलाकर बना केसरिया अथवा भगवा ध्वज ही संघ कार्य के लिए सर्वथा योग्य रहेगा। वहां उपस्थित सभी स्वयंसेवकों ने डॉक्टरजी के इस विचार से अपनी सहमति व्यक्त की और तब से भगवा ध्वज लगाकर शाखा शुरु करने की पध्दति रूढ़ हुईं  
संघ कर प्रार्थना भी इसी तरह स्वयंसेवकों से अनौपचारिक वार्तालाप से सुनिश्चित हुई। प्रार्थना ऐसी होना चाहिए कि जिसमें अपने कार्य का वैचारिक अधिष्ठान, अपना भावना और आकांक्षा संक्षेप में किन्तु स्पष्ट शब्दों में प्रकट होनी चाहिए। प्रार्थना की भाषा सरल और सब लोग आसानी से समझ सकें, ऐसी होनी चाहिए। इसी प्रकार सारे स्वयंसेवक उसे सामूहिक रूप से गा सकें, ऐसी उसकी तर्ज और स्वर होने चाहिए। उन दिनों अनेक व्यायाम शालाओं में तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में मराठी की एक प्रार्थना प्रचलित थी, जिसे अपनाने का सुझाव एक स्वयंसेवक ने दिया। उस प्रार्थना की प्रारंभिक और अंतिम पंक्तियां इस प्रकार की थीं-

''रक्ष रक्ष ईश्वरा भारता प्राचीन जन पदा। 
भोगीयली बहु जये एकदा वैभव सुख संपदा॥'' 
और अंतिम दो पंक्तियां इस प्रकार की थीं-  
''आर्यपुत्र जरी अपात्र असले ध्यासीस या पदा। 
रक्ष भारता सहाय हीना ईशा सुख संपदा॥''

डॉक्टरजी ने इस प्रार्थना के सम्बन्ध में यह समझाने का प्रयास किया कि इसमें कहा गया है 'स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हम अपात्र हैं। भारत असहाय है। अब तू ही रक्षा कर।' इस प्रकार इसमें निराशा के भाव हैं। डॉक्टरजी ने कहा, यदि आज हम भले ही अपात्र हों किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हम योग्य और सत्पात्र हैं, यह विश्वास हरेक के मन में उत्पन्न करना होगा। यदि हम अयोग्य हैं तो फिर भला ईश्वर भी हमारी सहायता के लिए क्यों आयेगा? हम अगर सत्पात्र नहीं हैं तो वह पर कृपा क्यों करेगा? वैसे भी इस प्रार्थना में निराशा के भाव हैं। निराशा उत्पन्न करने वाली प्रार्थना से कार्य की प्रेरणा नहीं मिलेगी। सभी स्वयंसेवक डॉक्टरजी के मत से सहमत हुए। 
एक अन्य स्वयंसेवक ने कहा, हमारे कार्य में मातृभूमि की विशुध्द भक्ति अपेक्षित है अत: हमारी प्रार्थना में, भारत माता सम्बन्धी सारी श्रध्दा व अपनी निष्ठा हम मातृभूमि के चरणों में समर्पित करते हैं, ऐसा भाव होना चाहिए। इस दृष्टि से ''जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।'' को प्रार्थना में शामिल किया जाये। एक अन्य स्वयंसेवक ने कहा, 'भारत माता की जय' करने से भी यह भाव सरल किंतु प्रभावी ढंग से व्यक्त होता है। मातृभूमि की वंदना का एक मराठी श्लोक उन दिनों प्रचलित था- उसके भाव अच्छो होने से डॉक्टरजी सहित सभी ने उस पर अपनी स्वीकृति दर्शायी। वह श्लोक था-

नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी।  
नमोआर्य भूमि जिथे वाढलो मी॥  
नमो धर्म भूमि जियेच्यास कामी। 
पडो देह माझा सदा ती नमी मी॥

एक स्वयंसेवक ने यह भी सुझाया कि हम स्वयंसेवकों में जिन गुणों को विकसित करना चाहते हैं, उसका भी दर्शन प्रार्थना में होना चाहिए। अपने दुर्गुण नष्ट होने चाहिए- यह बात भी उसमें शामिल हो। इन गुणों की सूची तो बड़ी लंबी हो सकती इसलिए इन समस्त गुणों से युक्त हनुमानजी जैसे आदर्श व्यक्ति की तरह हमें बनना है- इस आशय का एक श्लोक, जो हिंदी भाषा में था, एक स्वयंसेवक ने सुझाया। वह श्लोक इस प्रकार का था-

''हे गुरों श्री रामदूता, शील हमको दीजिए। 
शीर्घ सारे दुर्गुणों से मुक्त हमकों कीजिए॥ 
लीजिए हमको शरण में राम पंथी हम बनें। 
ब्रह्मचारी धर्म रक्षक वीरव्रत धारी बनें॥

इस श्लोक के भाव सभी स्वयंसेवकों को भाये। वैसे भी यह श्लोक सरल हिंदी में होने के कारण मराठी भाषी भी इसे आसानी से समझ सकेंगे। अपना कार्य आज भले ही मराठी भाषी क्षेत्र में हो, हिंतु आगे चलकर वह सारे भारत में फैलेगा। इसलिए यह हिंदी भाषा श्लोक सभी स्वयंसेवकों को उचित प्रतीत हुआ। 
पू. डॉक्टरजी ने कहा यह कविता उत्ताम है किंतु इसमें एक दोष है, जो हमारे ध्यान में आना चाहिए। इसमें यह जो पंक्ति है 'हमें दुर्गुणों से मुक्त कीजिए'- इसमें दुर्गुणों से मुक्ति की अभावात्मकता भावना व्यक्त होती है और इसे दुहराते समय दुर्गुणों संबंधी विचार ही मन में बना रहता है। यदि हम इस पंक्ति के स्थान पर यह कहें- 'सद्गुणों से पूर्ण हिंदू कीजिए' तो यह शब्द योजना अपने कार्य और स्वयंसेवकों के लिए अधिक उपयोगी सिध्द होगी। हनुमानजी आदर्श स्वयंसेवक थे साथ ही हिंदू जीवन पध्दति के भी आदर्श होने के नाते यह आदर्श समाज के सामने रहना आश्यक है। इसलिए यह प्रार्थना ठीक रहेगी। डॉक्टरजी की बात सबको जंच गयी। 
संघ के कार्य का स्वरूप समर्थ रामदास स्वामी द्वारा उनके कालखंड में किए गए संगठन कार्य की भांति होन के कारण उनका नाम भी स्वयंसेवकों के सामने नित्य रहना चाहिए। निकट भूतकाल के राष्ट्रगुरु के रूप में सर्वत्र विशेषतया महाराष्ट्र की जनता में उनके आदर भाव हैं। 'दासबोध' में व्यक्त उनके विचार संघ कार्य में स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शक हैं। अत: प्रार्थना के बाद स्वयंसेवक समर्थ रामदास स्वामी को अभिवदन करें। एक स्वयंसेवक का यह सुझाव भी सबने स्वीकार किया। जब तक संघ का कार्य मराठी भाषी प्रांत में है, तब तक समर्थ रामदास स्वामी के विचार सभी के लिए प्रेरक सिध्द होंगे। जब संघ का कार्य महाराष्ट्र से बाहर अन्य प्रांतों में फैलेगा तब राष्ट्र गुरु के नाते योग्य ऐसे गुरु गोविंद सिंह जैसे नाम भी सामने आयेंगे- उनका विचार आगे चलकर किया जायेगा। फिलहाल राष्ट्र गुरु के नाते समर्थ रामदास का उल्लेख करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए- यह सोचकर उक्त सुझाव स्वीकार कर लिया गया। इस कारण संघ के प्रारंभिक काल में भारत माता व समर्थ रामदास स्वामी की जय-जयकार के साथ प्रार्थना के श्लोकों का निम्नलिखित क्रम निश्चित हुआ-

नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी।  
नमोआर्य भूमि जिथे वाढलो मी॥  
नमो धर्म भूमि जियेच्यास कामी। 
पडो देह माझा सदा ती नमी मी॥1॥ 
''हे गुरों श्री रामदूता, शील हमको दीजिए। 
शीर्घ सारे सद्गुणों से पूर्ण हिंदू कीजिए॥ 
लीजिए हमको शरण में रामपंथी हम बनें। 
ब्रह्मचारी धर्म रक्षक वीरव्रत धारी बनें॥2॥

।भारत माता की जय।  
॥'राष्ट्रगुरु' श्री समर्थ रामदास स्वामी महाराज की जय'॥

ध्वज तथा प्रार्थना संबंधी विचार करते समय आज मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि इन मूलभूत विषयों के संबंध में इस प्रकार स्वयंसेवकों के साथ अनौपचारिक वार्तालाप द्वारा निर्णय लिया जाना क्या आवश्यक था? संघ कार्य की मूल धारणा, बुनियादी विचार, आकांक्षा व घोषणा की पूर्ण कल्पना डॉक्टरजी को थी। इस संकल्पना को शामिल कर संस्कृत के किसी जानकार व्यक्ति के द्वारा संस्कृत में प्रार्थना तैयार करवाना सहज संभव था। वे यह भी जानते थे आगे चलकर जब संघ कार्य देशव्यापी होगा जब संस्कृत भाषा में प्रार्थना आवश्यक हो जायेगी। किंतु सारे स्वयंसेवकों के साथ विचार विमर्श कर, उनकी सहमति से निर्णय लेने की कार्यशैली संघ में विकसित करने की डॉक्टरजी की योजना थी। सामूहिक चिंतन से यथा संभव हरेक निर्णय लेने से, उस निर्णय में अपनी सहभागिता के कारण उसे क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी भावना भी विकसित होती है- यह भावना स्वयंसेवकों में उत्पन्न हो सके, ऐसी कार्यशैली डॉक्टरजी ने प्रारंभ से ही अपनायी और स्वयंसेवकों में भी उसकी आदत डाली।

11. श्री गुरुदक्षिणा

संघशाखा प्रारम्भ होने के बाद प्रारंभिक दो वर्षों तक तो धन की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। कार्यक्रम भी सामान्य और छोटे स्वरूप के होते थे, इसलिए खर्चा भी विशेष नहीं होता था। जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता उसकी पूर्ति डॉक्टरजी का मित्र-परिवार करता। उनके मित्रों को यह पूरा विश्वास था कि डॉक्टरजी निरपेक्ष देश सेवा का कार्य कर रहे हैं। इसलिए वर्ष भर में एक या दो बार वे बड़ी खुशी से संघ कार्य के लिए आर्थिक मदद देते थे। 1927 तक संघ के जिम्मेदार स्वयंसेवक डॉक्टरजी के इन विश्वासपात्र मित्रों के यहां जाकर धन ले आते थे। द्रुत गति से बढ़ने वाले संघ कार्य के लिए, कार्यक्रमों तथा प्रवास हेतु जब अधिक खर्च करना अपरिहार्य हो गया तब डॉक्टरजी ने इस संबंध में स्वयंसेवकों के साथ विचार-विमर्श प्रारंभ किया। आज तक तो धनराशि एकत्रित होती उसका पाई-पाई का हिसाब डॉक्टरजी स्वयं रखते थे और यही आदत उन्होंने स्वयंसेवकों में भी डाली। परिणम स्वरूप स्वयंसेवकों को अपने सारे कार्यक्रम सादगीपूर्ण ढंग से, कम खर्च में करने की आदत हो गई। शाखाएं तेजी से खुलने लगीं थी। नागपुर के पड़ोसी वर्धा और भंडारा जिलों में नयी शाखाएं खुलीं। इस कारण आवश्यक खर्च भी बढ़ने लगा। कुछ दिनों तक मित्रों से उधार लेने का क्रम चला। मित्र भी बड़ी आस्था से रकम उधार देते और वापसी की कोई जल्दबाजी नहीं की जाती, फिर भी उधार ली गई रकम आखिर कभी न कभी वापस करनी है- यह चिंता उन्हें अवश्य होती। फिर इस तरह उधार लेकर काम करने का क्रम आखिर कब तक चलेगा, यह चिंता स्वयंसेवकों के मन में भी उत्पन्न होने लगी और इसका कोई निदान ढूंढा जाने लगा। 
एक स्वयंसेवक ने कहा, संघ कार्य हिन्दूसमाज का कार्य है। इसलिए जो आर्थिक मदद दे सकते हैं, ऐसे संघ से सहानुभूति रखने वाले लोगों से धन एकत्रित किया जाए। अन्य स्वयंसेवक ने भी इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि समाज जीवन की उन्नति हेतु चलने वाले सभी प्रकार के कार्य आखिर लोगों द्वारा दिए गए दान, अनुदान और चंदे की रकम से ही चलते हैं- अत: हमें भी इसी तरीके से धन जुटाना चाहिए। एक और स्वयंसेवक ने इस पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि हमारा कार्य सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय कार्य है इसका लोगों का बोध कराना होगा किंतु इसके लिए उनसे आर्थिक मदद मांगना उचित नहीं होगा। इसी बात को आगग बढ़ाते हुए अन्य स्वयंसेवक ने कहा कि यदि हम इसे अपना ही कार्य कहते हैं तो संघ जैसे उदात्ता कार्य हेतु हम स्वयं ही अपना धन लगाकर खर्च की व्यवस्था क्यों न करें? डॉक्टरजी ने उसे अपना विचार अधिक स्पष्ट रूप से कहने का आग्रह किया। तब उस स्वयंसेवक ने कहा, अपने घर में कोई धार्मिक कार्य अथव विवाह आदि कार्य होते हैं। कोई अपनी लड़की के विवाह के लिए चंदा एकत्रित कर धन नहीं जुटाता। इसी प्रकार संघ कार्य पर होने वाला खर्च भी, जैसे भी संभव हो, हम सभी मिलकर वहन करें। 
स्वयंसेवक खुले मन से अपने विचार व्यक्त करने लगे। एक ने शंका आशंका उपस्थित काते हुए कहा, यह धन राशि संघ के कार्य हेतु एकत्र होगी- क्या इसे हम कार्य हेतु अपना आर्थिक सहयोग माने? दान, अनुदान, चंदा आर्थिक सहयोग आदि में पूर्णतया निरपेक्ष भाव से देने का भाव प्रकट नहीं होता। अपनी घर-गृहस्थी ठीक तरह स चलाते हुए, हमें जो संभव होता है, वही हम दान, अनुदान चंदा आदि के रूप में देते हैं। कंतु हमारा संघ कार्य तो जीवन में सर्वश्रेष्ठ वरण करने योग्य कार्य है। वह अपना ही कार्य है, इसलिए हमें अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती कर संघ कार्य हेतु जितना अधिक दे सकें, उतना हमें देना चाहिए- यह भावना स्वयंसेवकों में निर्माण होनी चाहिए। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी धन-सम्पत्ति की ओर देखने का योग्य दृष्टिकोण हमें स्वीकार करना चाहिए। मुक्त चिंतन के चलते स्वयंसेवक अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। डॉक्टरजी ने सबके विचारों को सुनने के बाद कहा, कृतज्ञता और निरपेक्षता की भावना से गुरुदक्षिणा समर्पण की पध्दति भारत में प्राचीनकाल में प्रचलित थी। संघ कार्य करते समय धन संबंधी हमें अपेक्षित भावना गुरुदक्षिणा की इस संकल्पना में प्रकट होती है- हमें भी वही पध्दति स्वीकार करनी चाहिए। डॉक्टरजी के इस कथन से सभी स्वयंसेवकों के विचार को एक नयी दिशा मिली और विशुध्द भावना से 'गुरुदक्षिणा' समर्पण का विचार सभी स्वयंसेवकों के हृदय में बस गया। 
दो दिन बाद ही व्यास पूर्णिमा थी। गुरुपूजन और गुरुदक्षिणा समर्पण हेतु परम्परा से चला आ रहा, यह पावन दिवस सर्व दृष्टि से उचित था। इसलिए डॉक्टरजी ने कहा कि इस दिन सुबह ही स्नान आदि विधि पूर्णकर हम सारे स्वयंसेवक एकत्रित आयेंगे और श्री गुरुपूर्णिमा व श्री गुरुदक्षिणा का उत्सव मनायेंगे। डॉक्टरजी की यह सूचना सुनते ही घर लौटते समय स्वयंसेवकों के मन में विचार-चक्र घूमने लगा। परसों हम गुरु के नाते किसकी पूजा करेंगे? स्वयंसेवकों का गुरु कौन होगा? स्वाभाविकतया सबके मन में यह विचार आया कि डॉक्टरजी के सिवा हमारा गुरु कौन हो सकता है? हम परसों मनाये जाने वाले गुरुपूजन उत्सव में उन्हीं का पूजन करेंगे। कुछ स्वयंसेवकों के विचार में, राष्ट्रगुरु तो समर्थ रामदास स्वामी हैं। प्रार्थना के बाद नित्य हम उनकी जय जयकार करते हैं। अत: समर्थ रामदासजी के छायाचित्र की पूजा करना उचित रहेगा। उन्हीं दिनों अण्णा सोहनी नामक एक कार्यकर्ता शाखा में उत्ताम शारीरिक शिक्षके रूप में प्रसिध्द थे- उनकी शिक्षा से हमारी शारीरिक क्षमता और विश्वास से वृध्दि होती है, अत: क्यों न उन्हें ही गुरु के रूप में पूजा जाए? अनेक प्रकार की विचार तरंगे स्वयंसेवकों के मन में उटने लगीं। 
व्याप पूर्णिमा के दिन प्रात:काल सभी स्वयंसेवक निर्धारित समय पर डॉक्टरजी के घर एकत्रित हुए। ध्वजारोहण, ध्वजप्रणाम के बाद स्वयंसेवक अपने अपने स्थान पर बैठ गए। व्यक्तिगत गीत हुआ और उसके बाद डॉक्टरजी भाषण देने के लिए उठ खड़े हुए। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि संघ किसी भी जीवित व्यक्ति को गुरु न मानते हुए अपने परम पवित्र भगवा ध्वज को ही अपना गुरु मानता है। व्यक्ति चाहे तिना ही श्रेष्ठ क्यो न हो, वह सदा अविचल-अडिग उसी स्थिति में रहेगा- इसकी कोई गारंटी नहीं। श्रेष्ठ व्यक्ति में भी कोई न कोई अपूर्णता या कमी रह सकती है। सिध्दांत ही नित्य अडिग बना रह सकता है। भगवा ध्वज ही संघ के सैध्दान्तिक विचारों का प्रतीक है- इस ध्वज की ओर देखते ही अपने राष्ट्र का उज्जवल इतिहास, अपनी श्रेष्ठ संस्कृति और दिव्य दर्शन हमारी आंखों के सामने खड़ हो जाता है। जिस ध्वज की ओर देखते ही अंत:करण में स्फूर्ति का संचार होने लगता है वही भगवा ध्वज अपने संघ कार्य के सिध्दांतों का प्रतीक है- इसलिए वह हमारा गुरु है। आज हम उसी का पूजन करें और उसे ही अपनी गुरुदक्षिणा समर्पित करें। 
कार्यक्रम बड़े उत्साह से सम्पन्न हुआ और इसके साथ ही भगवा ध्वज को अपना गुरु और आदर्श मानने की पध्दति शुरु हुई। इस प्रथम गुरुपेजा उत्सव में कुल 84 रु. श्रीगुरुदक्षिणा के रूप में एकत्रित हुए। उसका तथा आगे संघ कार्य पर होने वाले खर्चे का पूरा हिसाब रखने की व्यवस्था की गई। श्रीगुरुदक्षिणा का उपयोग केवल संघ कार्य हेतु ही हो, अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए उसमें से एक भी पैसा उपयोग में नहीं लाया जाए- इसकी चिंता स्वयं डॉक्टरजी किया करते। वही आदत स्वयंसेवकों में भी निर्माण हुई इस प्रकार आत्मनिर्भर होकर संघ कार्य करने की पध्दति संघ में प्रचलित हुई।

12. हमारा आदर्श    

भगवा ध्वज ही हमारा गुरु है और वही संघ के विचारों का प्रतीक होने से हमारा आदर्श भी है। यह विचार बुध्दि और भावना से ग्रहण के बाद भी स्वयंसेवकों को अपने व्यावहारिक जीवन में एक कठिनाई बची रहती। जिनकी ओर देखकर उनके जैसा अपना भी जीवन बने, ऐसे किसी महान पुरुष केजीवन का अध्ययन कर, अपने जीवन में मार्गदर्शन प्राप्त करना आसान होता है। ऐसे किसी आदर्श महान व्यक्ति के जीवन का अनुसरण करना उसके लिए आसान होता है। केवल सिध्दांतों का चिंतन कर अथवा उसके प्रकट स्वरूप भगवा ध्वज के बारे में विचार कर अपने जीवन का व्यवहार सुनिश्चित करना तो बड़ा कठिन कार्य है। अनेक स्वयंसेवकों के मन में उठते इस प्रश्न की जानकारी डॉक्टरजी को मिली। 
शाखा में भिन्न-भिन्न प्रकार के- दंड, खड्ग, शूल, खेल, योग जैसे साहस और आत्मविश्वास बढ़ाने वाले कार्यक्रम हुआ करते। अनुशासन का संस्कार दृढ़ करने के लिए गणवेश पहिनकर समता, संचलन आदि कार्यक्रम करने की पध्दति थी। जैसे-जैसे कार्य बढ़ने लगा- संघ शाखाओं की संख्या भी बढ़ने लगी। अनेक उपशाखाएं भी प्रारंभ हुई। व्यवस्था की दृष्टि से प्रत्येक उपशाखा में कार्यवाह व मुख्यशिक्षक की योजना की जाती। ऐसे कुछ कार्यकर्ता कर्तृत्ववान और अच्छे स्वयंसेवक ऐसे सद्गुणी कार्यकर्ता की ओर आसानी से आकर्षित होते थे। यही कार्यकर्ता अधिकारी हमारे लिए आदर्श हैं, ऐसी सुप्त भावना उनके मन में भी उत्पन्न होना अस्वाभाविक नहीं था, किंतु क्या यह उचित है? यह प्रश्न कुछ स्वयंसेवकों के मन में उठा। स्वयंसेवकों से नित्य निकट सम्पर्क होने के कारण डॉक्टरजी को भी इसकी भनक मिली। अनौपचारिक वार्तालाप में यह विचार प्रकट होने लगा। 
यह बात स्वीकार करते हुए भी कि अपना यह स्वर्णगैरिक भगवा ध्वज ही हमारा गुरु और आदर्श है, यदि कोई जीवित गुणसम्पन्न, कर्तृत्ववान व्यक्ति आदर्श के रूप में सामने होतो क्या किशोर व छात्र स्वयंसेवकों को उसके अनुसार अपना जीवन बनाना आसान नहीं होग फिर यह भी मान लिया तो ऐसा आदर्श कार्यकर्ता कैसे खोजा जाए? यह प्रश्न बाकी रह जाता है। पूर्णतया निर्दोष तो संभवतया कोई नहीं होगा। किसी उत्ताम स्वयंसेवक के केवल सद्गुणों के आधार पर ही उसे आदर्श मानना क्या ठीक रहेगा? यदि इस ढंग से सोचा गया तो शायद प्रत्येक स्वयंसेवक को अपना अलग आदर्श स्वीकार करना होगा। किसी स्वयंसेवक द्वारा स्वीकृत आदर्श दूसरे स्वयंसेवक द्वारा नकारे जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। बजरंल बली हनुमान आदर्श स्वयंसेवक हैं। शाखा में प्रार्थना करते समय अपने जीवन में शील आदि गुणों का विकास हो, इस हेतु हम हनुमानजी से ही विनती करतेहैं। इस प्रकार डॉक्टरजी के साथ अनौपचारिक वार्तालापों में स्वयंसेवक अपने मन में उठने वाले प्रश्न और विचार प्रकट करते थे। सभी स्वंयसेवकों के लिए एक ही व्यक्ति आदर्श रहे, यह मानते हुए भी ऐसा व्यक्ति कौन हो सकता है, इसका निर्णय नहीं हो पा रहा था। एक स्वयंसेवक ने कहा पू. डॉक्टर हेडगेवार ही हमारे आदर्श हैं। स्वयं के नाम का इस प्रकार भाव पूर्ण शब्दों में उल्लेख होते ही डॉक्टरजी ने कहा, बस, बहुत चर्चा हो चुकी- हमें इस सम्बन्ध में आगे और भी चिंतन करना होगा- उसे हम आराम से करेंगे- जल्दी किस बात ही है? 
दूसरे दिन पुन: इस विचार को गति देने के लिए डॉक्टरजी ने कहा कोई भी जीवित व्यक्ति आज कितना ही सद्गुण सम्पन्न और कर्तृत्ववान क्यों न हो, उसका जीवन अभी पूर्ण नहीं हुआ है। मानलो, यदि ऐसे व्यक्ति के जीवन में आगे चलकर कोई विकृति उत्पन्न हो जाए, उस व्यक्ति के बारे में आज तक अज्ञात किसी अवगुण या दोष का पता चले तो उसक कार्यकर्ता को आदर्श मानने वाले स्वयंसेवक की भावनाओं को कितना आघात पहुंचेगा और तब संघ पर से भी उसका विश्वास ढहने लगेगा। व्यक्ति को स्खलनशील माना गया है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को अपना आदर्श मानना उचित नहीं होगा। हनुमानजी, श्रीरामचंद्र, श्रीकृष्ण तो सदैव हमारे आदर्श हैं- वे भी इसलिए कि उन्होंने अपने जीवन में अद्भुत काय किये- वे तो साक्षात् ईश्वर के अवतार हैं- उनके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं था। मनुष्य के रूप में 'मानव-लीला' करने के लिए ही परमेश्वर ने उनके रूप में जन्म लिया था। वैसा जीवन बनाने की कल्पना भी नहीं की सकती, क्योंकि हम उन्हें परमेश्वर-स्वरूप ही मानते हैं। अपने जीवन में उनका आदर्श कैसे स्वीकार किया जाए यह विचार अपने मन में उठता है। इसलिए अपने निकट भूतकाल में हुए किसी श्रेष्ठ व्यक्ति का अदार्श के रूप में हमें विचार करना चाहिए। ऐसे महान व्यक्ति का पूर्ण विकसित जीवन-पुष्य अपने परिचय का होने के कारण वह जीवन हमारे सामने आदर्श के रूप में रह सकता है। ऐसे ऐतिहासिक श्रेष्ठ पुरुष का विचार करते समय हमें सहज ही छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मरण हो आता है। उनके जीवन का प्रत्येक व्यवहार हमारे लिए आदर्श है। इस कारण हरेक स्वयंसेवक को छत्रपति शिवाजी महाराज का आदर्श ही अपने सामने रखना चाहिए। समर्थ रामदास स्वामी ने संभाजी के नाम प्रेषित पत्र में उन्हें अपने पिता स्वरूप जीवन जीने का परामर्श दिया जिन शब्दों में समर्थ रामदास स्वामी ने छत्रपति शिवाजी के प्रति अपनी भावनाएं प्रकट कीं, उनसे हम सभी परिचित हैं। वे शब्द इस प्रकार के थे-

''शिवरायाचे कैसे बोलणे। 
शिवरायाचे कैसे चालणे।  
शिवरायाची सलगी देणे। कैसे असे॥  
शिवरायाचा कैसा प्रताप।  
शिवरायाचा कैसा साक्षेप।  
....शिवरायास आठवावे। 
जीवित तृणवत मानावे॥

डॉक्टरजी के उक्त कथन से स्वयंसेवकों का पूर्ण समाधान हुआ। इस सामूहिक चिंतन से हमारे मन में एक विचार उठता है। पू. डॉक्टरजी ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण संघ कार्य में लगाया। अन्य किसी बात का, अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में कभी कोई विचार नहीं किया। 1925 के पूर्व केवल समाज कार्य की ही विचार किया और 1925 के बाद केवल संघ कार्य की चिंता में ही वे मग्न रहे। स्वयंसेवकों की दृष्टि में तो प्रारंभ से ही मर्यादा पुरुषोत्ताम स्वयंसेवक तथा अपने आदर्श रहे हैं। किन्तु इसके बावजूद, ऐसा दिखाई देता है कि अपने जीतेजी इस बारे में निरंतर सतर्क रहते कि कोई स्वयंसेवक उन्हें आदर्श मानने का विचार कभी भी न करे। 
आज अनेक सार्वजनिक कार्य किसी व्यक्ति के नाम पर चलते हुए हम देखते हैं। ऐसे कार्य कुछ काल तक चलते हैं। ऐसे व्यक्ति- केन्द्रित कार्य, उस व्यक्ति के निधन होते ही बंदा हो जाते हैं, या प्रभावहीन हो जाते हैं। इसलिए प्रारंभ से ही डॉक्टरजी ने इस बात की चिंता की कि कोई भी जीवित व्यक्ति संघ कार्य का केन्द्र बिन्दु न बनने पाये, जिनका जीवन पूर्णतया विकसित हो चुका है, ऐसा ही व्यक्ति जिसके जीवन के सभी पहलुओं से हम परिचित हैं, ऐसा महान व्यक्ति ही हमारा सच्चा आदर्श है। जीवन की यह व्यवहार्य-दृष्टि स्वयंसेवकों के हृदय में स्थिर हो सके, इसका उन्होंने कितनी दूरदृष्टि से विचार किया था, यह जानकर आज भी हम सभी आश्चर्य चकित रह जाते हैं।

13. संघ कार्य का आधार

जब संघ का कार्य बढ़ने लगा तब एक दिन स्वयंसेवकों को विचार-प्रवण करने के लिए डाफक्टरजी ने उनके सामने अपने मन के भाव प्रकट करते हुए कहा, अपनी शाखा-उपशाखाओं की संख्या बढ़ रही है। अपने कार्यकर्ताओं के प्रयत्न से यथा सूय सारे भारत में अपनी शाखां हो जायेंगी। ऐसे भारतव्यापी संघ कार्य का मूल आधार भी काफी मजबूत होना चाहिए। यह आधार केन्द्रीभूत और अडिग होना चाहिए। अपने इस संघ कार्य का ऐसा केन्द्रीभूत आधार स्तम्भ क्या होगा? स्वयंसेवकों के लिए यह प्रश्न कुछ अनपेक्षित सा था। फिर भी डॉक्टरजी का आग्रह था कि इस सम्बन्ध में हर स्वयंसेवक अपने अपने विचार प्रकट करे। इस स्थिति में, हरेक स्वयंसेवक अपने तयीं विचार कर योग्य शब्दों में अपना मत प्रकट करने लगे। इस प्रकार डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों को अपने कार्य के सम्बन्ध में स्वयं विचार हेतु प्रेरित किया। 
एक स्वयंसेवक ने कहा, भारतमाता की श्रध्दा ही अपने कार्य का आधार है। इसलिए अपन नित्य की प्रार्थना हम मातृभूमि की वंदाना कर उसके चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करने का निश्चय  प्रकट करते हैं। स्वयंसेवकों के हृदय में अपनी जन्मभूमि के प्रति भक्ति को जागृत और प्रखर बनाना ही हमारा कार्य है। एक अन्य स्वयंसेवक ने कहा, अपनी उदात्ता हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए कटिबध्द रहना हमारा राष्ट्रीय कार्य है और इस कार्य के प्रतीक के रूप में, जिसे हमने अपने गुरुस्थान पर माना है, यह भगवा ध्वज ही हमारे कार्य का अडिग-अचल आधार है। तीसरे स्वयंसेवक ने कहा, भारतमाता की भक्ति के अलावा अन्य कोई मूलभूत शाश्वत विचार प्रकट करना वाला आधार होना चाहिए। भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता पर आक्रमण करने वाले हमारे शत्रु अन्य धर्मीय है- उस आक्रमण से भारत को मुक्त कर सच्चे अर्थों में स्वतंत्र बनाना ही हमारा वास्तविक कार्य है। इसलिए स्वतंत्रता-प्राप्ति ही हमारे कार्य का मूलभूत विचार है। भगवा ध्वज तो अनेक मठों-मंदिरों पर भी फड़कता है। रामकृष्ण मठ और मिशन के कार्य में भी संन्यास वृत्ति को प्रमुखता होने के कारण उनके अंत: करणों में भी भगवे रंग के प्रति श्रध्दा हैं इसलिए अपने संघ कार्य की विशेषता के रूप में हमें अपने संगठन का कोई अन्य केन्द्रीभूत आधार ढूंढना होगा। संघ कार्य का मूलभूत विचार और अपनी आकांक्षा को प्रकट करना वाली हमारी प्रार्थना है, अत: संघ की प्रार्थना ही कार्य का प्रमुख आधार केन्द्र होना चाहिए। हिन्दु राष्ट्र को परम् वैभव के शिखर पर ले जाने का हमारा दृढ़ निश्चय है- वही हमारा वैचारिक अधिष्ठान है। किसी ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा, ये सारे आधार तो प्रतीकात्मक हैं अथवा वैचारिक स्वरूप के हैं। प्रत्येक स्वयंसेवक जिसे आसानी से और अच्छे ढंग से अनुभव कर सके, ऐसा हमारा मूल आधार होना चाहिए। इससे स्वयंसेवकों के विचारों को एक नयी दिशा मिली। उस समय बैठक में उपस्थित एक ज्येष्ठ अधिकारी ने कहा कि डॉक्टर हेडगेवार ही हमारे अखिल भारतीय कार्य के केन्द्रीय व अचल आधार स्तम्भ हैं। जब इस प्रकार डॉक्टरजी का नाम का उल्लेख हुआ तो डॉक्टरजी ने वहीं बैठक को समाप्त करने के इरादे से शाखा संबंधी अन्य मामूली मुद्दों के बारे में पूछताछ कर बैठक समाप्ति की घोषणा की। 
दूसरे दिन, डॉक्टरजी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अपना यह कार्य श्रेष्ठ ईश्वरीय है। कोई भी व्यक्ति कार्य का आधार नहीं हो सकता। व्यक्ति कितना ही गुणी क्यों न हो, अपने हिंदू समाज का अडिग-अचल आधार नहीं हो सकता। प्रत्येक स्वयंसेवक को नित्य अनुभव में आने वाली हमारी शाखा है। दैदंदिन चलने वाली उत्ताम, कार्य प्रवण संघ शाखा ही हमारे कार्य का आधार है। पहले संघ की शाखा नागपुर में शुरु हुई इसलिए नागपुर की शाखा ही व्यापक संघ कार्य का आधार है। नागपुर की शाखा जितनी सुदृढ़, जितनी अधिक संस्कारक्षम व मजबूत रहेगी। उतना ही हमार अखिल भारतीय कार्य का आधार भी मजबूत रहेगा। हमें नागपुर की केन्द्रशाखा को उत्कृष्ठ बनाने के लिए अपनी सारी शक्ति लगाकर प्रयत्न करना चाहिए। समाज को नित्य दिखाई देने वाला संघ कार्य का यह प्रकट स्वरूप है। संघ शाखा को देखकर ही समाज संघ कार्य का मूल्यांकन करेगा। अत: शाखा के रूप में अपने दैनंदिन संघ स्थान पर होने वाले कार्यक्रम और कार्य ही अपने संघ का आधार हैं।  
अच्छे ढंग से चलने वाली शाखा कैसी हो, इस बारे में भी स्वयंसेवकों के साथ अनौपचारिक वार्तालापों में विषय स्पष्ट होता गया। नित्य समय पर लगने वाली, जिसमें स्वयंसेवकों के बीच परस्पर आत्मीयता के संबंध हों, एक दूसरे के सुख-दु:खों में समरस होने की भावना हो, हिन्दु समाज के सभी स्तर के लोगों से निकट सम्पर्क बनाकर उन्हें शाखा में लाने का उपक्रम हो, शाखा के कार्यक्रमों में, स्वयंसेवकों के जीवन में अनुशासन परिलक्षित हो- इत्यादि विशेषताएं उत्ताम शाखा के सन्दर्भ में प्रकट की गई। ऐसी उत्ताम शाखा खड़ी करने के दिशा में प्रयास भी आरंभ हुए।

14. दैनंदिन कार्य

संघ कार्य का प्रारंभ तो वैसे 1925 के विजयादशमी के मुहूर्त पर हुआ, किन्तु हम सब की परिचित संघ की शाखा उसके कुछ माह बाद ही प्रारंभ हुई। दैनंदिन शाखा शुरु होने के पूर्व स्वयंसेवक सांयकाल व्यायाम शाला में जाया करते थे। इस व्यायाम शाला के संचालक श्री अण्ण खेत, श्री दत्तोपंत मारुळकर, श्री अण्णा सोहनी भी होते। सायंकाल पू. डॉक्टरजी भी व्यायाम शाला में जाते और स्वयंसेवकों से सम्पर्क रखते। रात्रि में भोजन के बाद ये स्वयंसेवक डॉक्टरजी के घर एकत्र होते और देर रात्रि तक अनौपचारिक वार्तालाप, विनोद, उद्बोधन आदि होता रहता। स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ने लगी। इस कारण श्री दत्तोपंत मारुळकर व श्री अण्णा खोत को उन सभी के शारीरिक शिक्षण की वयवस्था करना कठिन होने लगा। इन दो शिक्षकों के बीच स्पर्धा और बेबनाव बढ़ने लगा। इसका स्वयंसेवकों पर होने वाला विपरीत परिणाम डॉक्टरजी की दृष्टि से छूटना असंभव ही था। इसलिए मोहिते के जर्जर बाड़े की जगह साफ कर वहां स्वयंसेवकों के लिए अलग से शारीरिक कार्यक्रम शुरु करने का विचार डॉक्टरजी ने किया और वहां शिक्षक के रूप में श्री अण्णा सोहनी के जिम्मे काम सौंपा। 
इसी समय संघ के कार्य संबंधी चिंतन का एक और पहलू डॉक्टरजी और स्वयंसेवकों के बीच अनौपचारिक वार्तालाप से विकसित हुआ। सायंकाल व्यायाम शाला में शारीरिक कार्यक्रम और रात्रि में डॉक्टरजी के घर एकत्रित होकर परस्पर वार्तालाप, हास्य-विनोद तथा छुट्टी के दिन दोपहर में भी विचार-विनिमय के कार्यक्रम चलते थे। उत्सव प्रसंग पर भाषण भी होते थे। किन्तु संघ स्वयंसेवकों का प्रमख कार्यक्रम याने पू. डॉक्टरजी के साथ विचार विनिमय ही होता। चर्चाओं में यह बात उठी कि जिसमें स्वयंसेवक सहभागी हो सकें, ऐसे संघ के और कौन से कार्यक्रम होने चाहिए। यह सभी महसूस करते थे कि केवल बौध्दिक कार्यक्रम और बैठकों में होने वाली चर्चा मात्र ही हमारा कार्य नहीं। सत्ताधारी अंग्रेज बड़े चतुर हैं। स्वयंसेवकों की इन बैठकों को 'गुप्त कार्य' घोषित कर वे उन पर रोक लगा सकते हैं। अत: अपने कार्य का स्वरूप खुली जगह में सबके सामने चलने वाला होना चाहिए। उन दिनों सार्वजनिक खुले कार्यक्रम के रूप में सबके परिचित वार्षिक सम्मेलन आदि ही हुआ करते। ऐसे सम्मेलन दो-चार दिन तक चलते। इनमें भाषण आदि हुआ करते। इसी प्रकार का कोई कार्यक्रम संघ को भी हाथों में लेना चाहिए। यह विचार व्यक्त किया गया। किंतु ऐसे सम्मेलन तो अधिक से अधिक 3-4 दिनों तक चलेंगे। फिर आगे वर्ष भर क्या करना? इस पर एक स्वयंसेवक ने सुझाया कि वर्ष में एक बार सभा-सम्मेलन का आयोजन करने की बजाय हर रविवार को खुले मैदान में स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण आयोजित किया जाए। यह कल्पना कुछ सुविधा की प्रतीत हुई। किंतु अपने संघ के कार्य के केवल शारीरिक-बौध्दिक कार्यक्रम ही पर्याप्त होंगे। हमें तो स्वयंसेवकों को संस्कारित करना है- उनके हृदय में विशुध्द देशभक्ति की भावना जागृत करनी है- समाज में सम्पर्क साधकर, हिंदू समाज संघ कार्य के लिए अनुकूल बने, ऐसा प्रयत्न करना है- स्वयंसेवक के जीवन में इसकी आदत डालने के लिए क्या सप्ताह में एक बार, छुट्टी के दिन सुविधाजनक प्रतीत होने वाला एकत्रीकरण का कार्यक्रम पर्याप्त रहेगा क्या? विचार-विनिमय के प्रवाह को डॉक्टरजी ने उचित दिशा में मोड़ा। 
स्वयंसेवकों में आयी जागृति उनका स्थायी भाव बने और उनके द्वारा समाज जीवन को भी वही दिशा मिले, इसके लिए स्वयंसेवकों की विश्वासार्हता बढ़नी चाहिए- अत: स्वयंसेवकों को प्रतिदिन एक निश्चित समय पर एकत्रित आकर संघ के कार्यक्रम करना आवश्यक है। किसी भी संस्कार को अंत:करण में सुदृढ़ बनाने के लिए नित्य, निश्चित समय पर उसका अभ्यास करना ही सर्वोत्ताम मार्ग है। जिस प्रकार शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए नित्य रूप से व्यायाम करना जरूरी होता है, ठीक उसी प्रकार मन पर शुध्द और ओजस्वी विचारों के संस्कार हेतु प्रतिदिन अध्ययन करना आवश्यक है। इसी प्रकार संघ के संस्कार हेतु नित्य, निश्चित समय पर एकत्रित आकर कुछ शारीरिक, कुछ बौध्दिक कार्यक्रम आग्रह पूर्वक करने होंगे। नित्य, निश्चित समय पर कार्यक्रम करने की आदत लगी तो अपने आप ही नित्य याद रखकर शाखा जाने की आदत भी बन जाती है। इस प्रकार दैनंदिन शाखा की आवश्यकता स्पष्ट होते ही मोहिते संघ पर नित्य सांय शाखा लगनी प्रारंभ हुई। 
उन दिनों प्रति दिन एकत्र आकर राष्ट्र भक्ति का संस्कार प्राप्त करने की प्रक्रिया किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में प्रचलित नहीं थी। इस कारण दैनंदिन संघ शाखा और स्वयंसेवकों द्वारा खुले मन में किय जाने वाले कार्यक्रमों को देखकर प्रारंभ में लोगों को बड़ा अनोखा लगता था। धीरे-धीरे स्वयंसेवकों को, आसपास के लोगों और अंग्रेज शासन कर्ताओं को यह लगने लगा कि यह तो रोज की ही बात है। इसके बारे में सरकार की जिज्ञासा भी धीरे-धीरे कम होने लगी। शाखा में, पौरुष व साहस निर्माण करने वाले तत्कालीन प्रचित दंड, खड्ग आदि के कार्यक्रम होने लगे। अनुशासन लाने की दृष्टि से श्री मार्तंड राव जोग के सहयोग से गणवेश में प्राथमिक समता का कार्यक्रम ही होता। इस बात पर भी बल दिया गया कि हर स्वयंसेवक अपना गणवेश स्वयं अपने खर्च से तैयार करे- स्वयंसेवकों का प्रारंभ से ही स्वावलम्बन की सीख दी गई। इस प्रकार सायंकाल का एक घंटा राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित है, इस भावना से स्वयंसेवक प्रतिदिन सायंकाल शाखा में आने लगे। 
डॉक्टरजी शुरु से ही इस बात का ध्यान रखते कि संघ का प्रत्येक कार्यक्रम समय पर हो। इस कारण एकत्रीकरण शाखा, बैठक और निश्चित किया जाने वाला हर कार्यक्रम समय पर शुरु होता। इससे जहां स्वयंसेवकों में अनुशासन की भावना जागी वहीं कार्यक्रम देखने वाले लोगों में भी स्वयंसेवकों के प्रति विश्वास वृध्दिगत होने लगा। बारिश में भी नित्य समय पर शाखा लगती और नित्य के कार्यक्रमों और प्रार्थना के पश्चात ही शाखा छूटती। मौसम की प्रतिकूलता के बावजूद खुले मैदान में शाखा के कार्यक्रम निश्चित रूप से, समय पर ही होने के कारण स्वयंसेवको में धीरे-धीरे हर संकट का मुकाबला करते हुए संघ कार्य अबाध गति से जारी रखने का आत्म विश्वास भी बढ़ऋते गया। 
समय के सन्दर्भ में, उन दिनों लोगों में बातचीत करते समय 'हिन्दुस्थानी (Indian Time) समय' ओर 'अंग्रेजी समय' (English Time)- ये दो शब्द प्रयोग प्रचलित थे। 'अंग्रेजी समय' का अर्थ होता ठीक निर्धारित समय पर कार्यक्रम को होना और 'हिन्दुस्तानी समय' निर्धारित समय से आगे या पीछे होने वाले कार्यक्रमों के सन्दर्भ में कहा जाता। अक्सर देरी से होने वाले कार्यक्रमों के सन्दर्भ में ही व्यंग से Indian Time कहकर उसका उल्लेख किया जाता। डॉक्टरजी कहा करते कि अनुशासित जीवन का, कोई भी कार्य निर्धारित समय पर ही करने का अंग्रेजो का गुण महत्वपूर्ण है- वह भी हमें ग्रहण करना चाहिए।  
संघ का कोई भी कार्यक्रम, चाहे वह नित्य का शाखा का हो या उत्सव आदि प्रसंग का सर्वाजनिक कार्यक्रम हो- निमंत्रण पत्र में उल्लेखित निश्चित समय पर ही शुरु होगा- यह विश्वास लोगों में निर्माण होने लगा। इस कारण समाज के निमंत्रित लोगों को भी संघ के कार्यक्रमों में समय पर आने की आदत लगी। इसी प्रकार संघ के जाहिर कार्यक्रम में, स्वयंसेवकों की भांति शांति से बैठकर अनुशासन का पालन करने की आदत भी लोगों में निर्माण होने लगी।

15. प्रत्येक कार्य की पूर्व योजना

संघ  कार्य में हरेक  बात का विचार करते समय, पू. डॉक्टरजी ने सम्बन्धित स्वयंसेवकों के साथ विचार-विनिमय कर सबके सहयोग से कार्य का स्वरूप और कार्यवाही सुनिश्चित करने की पध्दति प्रारंभ से ही प्रचलित की। किसी भी कार्यक्रम का आयोजन करने से पूर्व अनौपचारिक वार्तालाप से सर्वस्पर्शी, सर्वांगीण विचार हुआ करता। कार्य का ब्यौरा तय करते समय भिन्न-भिन्न काम का दायित्व भी अलग-अलग स्वयंसेवक के जिम्मे सौंपा जाता- सम्बन्धित स्वयंसेवक के गुणों के संवर्धन और विकास का पूरा अवसर दिया जाने पर ध्यान दिया जाता। उदाहरणार्थ, यदि शिविर का आयोजन करना हो तो उचित स्थान की खोज करना, वहां रहने-खाने-पीने आदि की व्यवस्था करना, प्रकाश, साफ-सफाई, सामान लाने व स्वयंसेवकों के आने-जाने के लिए यथोचित व्यवस्था, शिविर के कार्यक्रमों की निर्दोष रचना, शिविर काल में वहां चिकित्सा सुविधा, शारीरिक-बौध्दिक- मनोरंजन आदि कार्यक्रमों का नियोजन- ऐसे हर काम के लिए सुयोग्य स्वयंसेवक पर जिम्मेदारी सौंपना- आदि सारी बातें स्वयंवेसेवक अपना दायित्व समझकर मन:पूर्वक अच्छे ढंग से निभाने का प्रयत्न करता। इससे कोई भी कार्यक्रम, चाहे वह कितना भी भव्य क्यों न हो, सब मिलकर, परस्पर सहयोग और प्रयत्नों से अपने-अपने जिम्मे जो काम होता, उसे अच्छे ढंग से निभाने और कार्यक्रम को सफल बनाने का अनोखा समाधान हर स्वयंसेवक को होता। इस प्रकार संघ में हर कार्यक्रम के र्पू नियोजन हेतु सामूहिक चिंतन और सामूहिक प्रयास की पध्दति प्रारंभ हुई। 
इस प्रकार का कोई कार्यक्रम समाप्त होने पर, सब मिलकर इस बात का विचार करते कि कार्यक्रम नियोजित योजनानुसार सम्पन्न हुआ या कहीं कोई दोष, त्रुटि या कमी तो नहीं रह गई। जिस विभाग में काम करते समय कोई कठिनाई आयी होगी, उसका पता लगाकर अगली बार, पहले से ही उसका ध्यान रखा जाता। कार्यक्रम पर जो खर्च हुआ होगा- प्रत्येक पैसे का पाई-पाई हिसाब लिखकर रखने की आदत भी डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों में डाली। कहां अनपेक्षित ढंग से खर्च करना पड़ा, कहां कौनसी अकल्पित कठिनाई का सामना करना पड़ा- उसे किस तरह से दूर किया जा सकता था- आदि सब बातों का विचार किया जाता। इस पध्दति से हर कार्यक्रम उत्तारोत्तार निर्दोष और प्रभावी ढंग से होने लगे। 
पू. डॉक्टरजी द्वारा उन दिनों प्रचलित की गई पध्दतियों का आज जब हम विचार करते हैं, तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि हर काम में, चाहे वह कितना ही छोटा या बड़ा हो, चाहे व अत्यन्त मामूली क्यों न हो, डॉक्टरजी द्वारा स्वयं ध्यान देने तथा सभी सम्बन्धित स्वयंसेवकों के साथ् सामूहिक चर्चा करने की क्या वास्तव में आवश्यकता थी? किन्तु प्रारंभिक काल में ही हर कार्यक्रम सबके सहयोग से सफल बनाने की यह पध्दति कितनी महत्वपूर्ण हैं, इसका अनुभव आज भी हमें होता है। हाल के वर्षों में, अपने ज्येष्ठ स्वयंसेवकों ने एकात्मता रथ यात्रा का आयोजन किया था। मानसरोवर और गंगोत्री जैसे उद्गम स्‍थलों से सिन्धु और गंगा का जल एकत्र कर- दक्षिणी छोर पर रामेश्वर और कन्याकुमारी में स्थित मंदिरों में उस जल से अभिषेक और इधर पूर्व में परशुराम कुंड के जल से पश्चिमी तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर में अभिषेक करने का संकल्प लेकर दो विशाल रथ-यात्राओं का अभूतपूर्व आयोजन किया गया। ये दोनों रथ यात्राएं सम्पूर्ण भारत में सर्वत्र चर्चा और कौतुहल का विषय बनीं थी। उत्तार-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम जाने वाली इन दोनों राि यात्राओं का, निर्धारित दिन, निश्चित समय पर नागपुर में संगम हुआ। हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इन रथ यात्राओं में, स्थान-स्थान पर स्वागत, भाषणों आदि के सारे कार्यक्रम पूर्व निर्धारित समय और स्थान पर सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए- इसमें संघ मे स्वयंसेवकों को स्थानीय जनता का भी अभूतपूर्व सहयोग प्राप्त हुआ। यह कार्यक्रम विश्व हिंदू परिषद ने आयोजित किया था। इस पर सरकार क प्रतिक्रिया बहुत अर्थ रखती है- उस समय के अखिल भारतीय ख्याति के एक अंग्रेजी दैनिक में इन रथ यात्राओं के बारे में प्रकाशित हुआ- ''the progrmme was excuted with Military precision.'' संघ के शिविर अथवा शाखा के अन्य कार्यक्रमों को, पूर्व नियोजन और सबके सहयोग से सफल बनाने की डॉक्टरजी द्वारा प्रचलित कार्य पध्दति केद्वारा ही यह संभव हो सका। 
इस पध्दति के सुपरिणाम भी आज हमें दिखाई देते हैं। प्रत्येक कार्यक्रम के सभी अंगों का बारीकी से ध्यान रखकर, अपनी-अपनी क्षमता और विशेष गुणों का पूर्ण उपयोग करते हुए परस्पर-पूरक 'टीम-वर्क' की भावना से, उसक सफल बनाने की आदत स्वयंसेवकों में निर्माण हुई। इससे बड़े से बड़े कार्यक्रम भी आसानी से और अच्छे ढंग से सम्पन्न होते। सबने मिलकर कार्य के हित हो ध्यान में रखते हुए वस्तुनिष्ठ विचार कर योजना तैयार की- इसलिए कार्यक्रम की सफलता का श्रेय भी सभी स्वयंसेवकों को मिलता- अगर कहीं कोई त्रुटि रह गई हो तो अगली बार न रहने पाये, इसका भी सब मिलकर विचार करते। किसी की भूल को सब मिलकर खुशी से स्वीकार करते और दुबारा वह भूल न होने पाये, इसका निश्चय करते। गुण-दोषों से युक्त स्वयंसेवकों के सामूहिक चिंतन और मिलकर कार्य करने की इस पध्दति से दोष-रहित कार्य खड़ा करने की परम्परा चल पड़ी। इससे स्वयंसेवकों के गुणों में निरंतर वृध्दि और दोष क्रमश: दूर होने लगे। स्वयंसवकों का दृष्टिकोण व्यापक बनने लगा। एक-हृदय से काम करने वाले स्वयंसेवकों की टीम देखकर लोगों का उनके प्रति और संघ के प्रति विश्वास दृढ़ होने लगा। व्यक्तिश: स्वयंसेवकों को प्रति भी समाज में विश्वासार्हता बढ़ने लगी।

16. प्रचारक

प्रारंभिक कुछ वर्षों तक संघ में यह 'प्रचारक' शब्द परिचित नहीं था। केवल संघ कार्य का ही अहोरत्रचिंतन रिने वाले डॉक्टरजी ही एकमात्र स्वयंसेवक थे। अधिकांश शालेय छात्र किशोर स्वयंसेवक अपने घरों में रहते और कार्यक्रम अथवा बैठक के समय एकत्र आते थे। आयु में कुछ बड़े स्वयंसेवकों में, बाबासाहब आपटे नागपुर की एक बीमा कम्पनी के कार्यालय में टंकलेखक थे। श्री दादाराव परमार्थ ने शालांत परीक्षा उत्ताीर्ण करने के अनेक प्रयास किये किन्तु गणित जैसे 'भयानक' विषय के कारण असफल होकर, उसके पीछे लगे रहने की बजाय वे अधिकाधिक समय देकर संघ कार्य करनेलगे। उनकी ओजपूर्ण भाषण शैली तथा अंग्रेजी भाषा पर प्रभुत्व के कारण, संघ कार्य करते समय उन्हें कभी भी विद्यालयीन अथवा महाविद्यालयीन उपाधियों की कमी महसूस नहीं हुई। इस समय संघ का कार्य नागपुर के बाहर भी पहुंच चुका था- विदर्भ के वर्धा-भंडारा आदि जिलों में संघ की शाखाएं खुल गई थी। वहां की शाखाओं का संचालन स्थानीय कार्यकर्ता ही किया करते थें 
भिन्न भिन्न गांवों में संघ की शाखाएं खुलने के दौर में उन सभी शाखाओं के कार्य में एकसूत्रता लाने की दृष्टि से प्रवास करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। हर स्थान पर, चार-छह दिन रहकर, वहां के स्वयंसेवकों के साथ विचार-विनिमय कर उन्हें संघ कार्य से, दृढ़ता से जोड़ने तथा अपने दैनंदिन जीवन में संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने हेतु कार्य-प्रवण करने की आवश्यकता भी महसूस होने लगी। शुरु-शुरु में डॉक्टरजी अकेले ही प्रवास किया करते। उत्सव प्रसंगों पर अन्य कार्यकर्ता भी जाते थे। ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं को अपने उद्योग व्यवसाय से अवकाश लेकर कुछ दिनों का प्रवास करना ही संभव होता। जिन गांवों में पू. डॉक्टरजी के परिचित अथवा मित्र आदि रहते थे, वहां कार्य प्रारंभ करना आसान होता। किंतु जहां एकाध व्यक्ति ही परिचित होता वहां शाखा प्रारंभ कर संघकार्य स्थायी रूप से संचालित होने तक, बाहर के ही किसी कार्यकर्ता को प्रत्यक्ष वहां रहकर काम करना आवश्यक होता। 
शालेय छात्र स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं को, वार्षिक परीक्षा के पश्चात ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में, 4-6 सप्ताह तक विदर्भ और महाकोशल क्षेत्र में जाकर संघ की नयी शाखाएं खोलने की आवश्यकता डॉक्टरजी द्वारा व्यक्त किये जाने पर उस दिशा में विचार प्रारंभ हुआ। कुछ कार्यकर्ताओं ने इस दृष्टि से आपनी तैयारी भी दर्शायी। बाहर जाकर कार्य करने वाले ऐसे स्वयंसेवकों को 'विस्तारक' कहा जाता। प्रतिवर्ष ऐसे 'विस्तारक' कार्यकर्ता ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में अन्यतत्र जाकर संघ कार्य का विस्तार करने लगे- नयी शाखाओं की संख्या बढ़ने लगी। डॉक्टरजी के साथ वार्तालाप में विस्तारकों तथा पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता स्वयंसेवकों को भी अनुभव होने लगी। बाहर गांव से डॉक्टरजी के नाम आये, उनके मित्रों के पत्रों को स्वयंसेवकों की बैठकों में पढ़ा जाता। इन पत्रों में लिखा होता- ''हमारे गांव में संघ की शाखा शुरु की जा सकती है। कृपया किसी योग्य कार्यकर्ता को भेजिए। उसके निवास और भोजन आदि की व्यवस्था यहां की जायेगी।'' श्री दादाराव परमार्थ, श्री बाबासाहेब आपटे, श्री रामभाऊ जामगड़े व श्री गोपाळराव येरकुंटवार आदि ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं ने, अपने व्यक्तिगत जीवन की आशा- आकांक्षाओं को एक ओर रखकर, संघ कार्य के लिए प्रवास पर जाने की सिध्दता दर्शायी। 1932 के उत्तारार्ध में, डॉक्टरजी ने इन कार्यकर्ताओं को पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में अन्यत्र भेजने की योजना बनाई। संघ कार्य के इस प्रकार होने वाले विस्तार में, डॉक्टरजी को, कभी किसी स्वयंसेवक को इस प्रकार का आदेश देते किसी ने नहीं सुना कि 'तुम अपने व्यक्तिगत जीवन की चिंता छोड़कर पूर्ण कालिक कार्यकर्ता बनकर संघ कार्यार्थ निकलो।' डॉक्टरजी का स्वयं का जीवन संघ से एकरूप हो गया था। उनके सहवास और वार्तालाप से संघ कार्य के असाधारण महत्व तथा उसके लिए अपना जीवन समर्पित करने की प्रेरणा ग्रहण कर स्वयंसेवक जब स्वयं अपनी सिध्दता डॉक्टरजी के सामने व्यक्त करते तभी डॉक्टरजी उस कार्यकर्ता की उस प्रकार की योजना करते। इस प्रकार श्री दादाराव परमार्थ को पुणे, श्री गोपाळराव येरकुंटवार को सांगली (महाराष्ट्र) ओर श्री रामभाऊ जामगडे को यवतमाल (विदर्भ) में पूर्णकालिक संघ कार्यकर्ता के रूप में भेजने की योजना बनी। इन सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को सभी स्वयंसेवकों की उपस्थिति में पू. डॉक्टाजी ने भावपूर्ण शब्दों में विदाई दी। इस प्रकार के कार्यकर्ताओ को 'प्रचारक' के नाम से अन्यत्र भेजने की पध्दति संघ में शुरु हुई। 
संघ कार्य में वृध्दि की गति बढ़ने लगी। 1937 के आरंभ में विदर्भ व महाराष्ट्र के प्रमुख स्थानों पर, महाकोशल के 4-6 स्थानों पर तथा उत्तार प्रदेश के बनारस में संघ की शाखाएं शुरु हो चुकी थी। किंतु पंजाब, दिल्ली उत्तार प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों में संघ का कार्य शुरु करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस कारण, नागपुर के स्वयंसेवकों में से जिन्हें इन प्रांतों के प्रमुख स्थानों पर जाना संभव हो, उन्हें उच्च शिक्षा के लिए वहां के महाविद्यालयों में प्रवेश लेना चाहिए और वहां शिक्षा ग्रहण कर साथ-साथ संघ की शाखाएं खोलने का प्रयास करना चाहिए। वार्तालाप में डॉक्टरजी द्वारा यह विचार व्यक्त किये जाने पर, योजनापूर्वक 1937 के जुलाई माह में श्री भाऊराव देवरस को B.Com o Law करने के लिए लखनऊ, श्री कृष्णा जोशी को महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण करने सियालकोट (पंजाब), श्री दिगम्बर पातुरकर को लाहौर (पं. पंजाब), श्री मारेश्वर मुंज को उच्च शिक्षा प्राप्त करने रावलपिंडी में शिक्षा ग्रहण के साथ साथ संघ कार्य हेतु भेजा गया। इसी प्रकार अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा नागपुर में समाप्त करने के बाद श्री वसंतराव ओक को दिल्ली, श्री बापूराव दिवाकर, श्री नरहरि पारखी और मुकुंदराव मुंजे को बिहार के पटना, दानापुर और मुंगेर में प्रचारक के रूप में डॉक्टरजी ने भेजा। श्री नारायण तटें को प्रचारक के रूप में ग्वालियर भेजा गया। 1938 में श्री एकनाथ रानडे M.A. होने के बाद प्रचारक के रूप में महाकोशल के जबलपुर में गयो- उनके साथ प्रल्हादराव आम्बेकर भी गये। 1939 में श्री विठ्ठलराव पत्की को प्रचारक के रूप में, कलकत्ता भेजा गया। श्री जनार्दन चिंचाळकर की नियुक्ति मद्रास में की गयी। इन सभी पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को प्रचारक नाम से संबंधित किया जाने लगा। इस प्रकार संघ के कार्य में 'प्रचारक' शब्द रूढ़ हुआ। 
किसी प्रकार का आदेश नहीं, बल्कि स्वयं अपनी इच्छा से, अपने व्यक्तिगत जीवन की चिंता न करते हुए संघ कार्य हेतु प्रचारक निकलने की पध्दति स्वयंसेवकों में अपने आप विकसित होने लगी- यह बात आज आश्यचर्यजनक प्रतीत होती है, क्योंकि प्रचारक बनकर जाने का आदेश कभी डॉक्टरजी ने किसी को नहीं दिया। इसके विपरीत जब कोई स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में कार्य करने की सिध्दता प्रकट करता तो डॉक्टरजी पहले उसके घर की परिस्थिति और कार्य सम्बन्धी उसके दृढ़ निश्चय के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करने के बाद ही उसके बारे में निर्णय लेते। डॉक्टरजी के सहवास और वार्तालाप में विभिन्न स्थानों से 'कार्य शुरु करने हेतु प्रचारक भेजिये'- इस आशय के आने वाले पत्रों के वाचन के बाद होने वाली चर्चा से स्वयंसवकों में संघ कार्यार्थ सर्वस्य अर्पण करने की तीव्र भावना अपने आप उत्पन्न होती और स्वयंसेवकों के मन में संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने की प्रेरणा जागती। अपने जीवन में करने योग्य सर्वश्रेष्ठ कार्य केवल संघ कार्य ही है, यह अनुभूति स्वयंसेवकों को होने लगी। अपना जीवन पुष्प केवल संघ कार्य करते हुए अपनी मातृभूमि के चरणों में समर्पित करने में ही जीवन की सार्थकता है- यह भावना स्वयंसेवक के हृदय में प्रबल होते ही, वह स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में निकलने की सिध्दता स्वयं डॉक्टरजी के समक्ष व्यक्त करता। 
संघ की कार्य पध्दति की यह अनोखी विशेषता है, जिसे डॉक्टरजी ने बड़ी कुशलता से विकसित किया।

17. उत्सव प्रसंगों पर अध्यक्षों की योजना

संघ की कार्यपध्दति को विकसित करने में 'अध्यक्षों' का क्या संबंध है, यह विचार कौतूहल का विषय भले ही बने किन्तु वास्तव में यह संघ की कार्यशैली की एक विशेषता है। भारत के सुदुर प्रांतों में भी संघ कार्य का प्रवेश हो, उन क्षेत्रों में आवश्यकतानुसार 'प्रचारक' की व्यस्था की जाये, उसी तरह प्रांत-प्रांत में कार्य शुरु करते समय स्थानीय किसी ज्येष्ठ नागरिक का आधार मिले- इस दृष्टि से संघ के उत्सव प्रसंगों पर 'अध्यक्ष' की योजना की जाने लगी। 
विजयादशमी, रक्षाबंधन जैसे उत्सवों के लिए अध्यक्ष के रूप में किसे आमंत्रित किया जाये, इसका विचार स्वयंसेवकों के अनौपचारिक वार्तालापों मेंहोता। डॉक्टरजी स्वयं यह प्रश्न पूछते कि इस वर्ष के उत्सव में किसे अध्यक्ष बनाया जाये। विद्वान, विचारशील नेताओं के नाम, जो समाचार पत्रों अथवा सभा सम्मेलनों के द्वारा परिचित थे, अध्यक्ष के रूप में स्वयंसेवकों द्वारा सुझाये जाते। सभी संस्थाओं में ऐसे विशेष प्रसंगों पर अध्यक्षों का चयन ख्याति प्राप्त नेताओं में से किये जाने की सर्व सामान्य पध्दति उन दिनों प्रचलित थी। स्वाभाविकतया, स्वयंसेवक भी यही विचार करते। डॉक्टरजी का विचार होता कि हम ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में आदरपूर्वक निमंत्रित करें जो संघ कार्य के महात्व को समझकर अपने क्षेत्र में संघ कार्य शुरु करने में, हमें अपना सहयोग दे सके। देश में अच्छा भाषण देने वाले विद्वान वक्ता तो काफी हैं। सार्वजनिक कार्यों में उपदेश देने वाले भी अनेक मिलेंगे। उनका भाषण सुनने का आनंद तो अल्पकाल ही टिकेगा- इस क्षणिक आनंद का लाभ लेने की अपेक्षा, जो संघ के उत्सव में अध्यक्ष का स्थान ग्रहण करने पर संघ के प्रति आत्मीयता के भाव से उत्प्रेरित होकर संघ के निकट आ सके और संघ कार्य की वृध्दि में सहायक हो सके, ऐसे किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनाना क्या उचित नहीं रहेगा? 
डॉक्टरजी के उक्त विचारों से स्वयंसेवकों को नयी दिशा मिली। संघ के कारणअध्यक्ष महोदय प्रभावित हो सकें इस दृष्टि से क्या करना होगा? स्वयंसेवकों की संख्या यदि अधिक रही, उनके प्रात्यक्षिक उत्कृष्ट करे, गणवेश में समता-संचलन आदि कार्यक्रम निर्दोष और प्रभावी हों- क्या इतने मात्र से अध्यक्ष के मन में संघ के प्रति आस्था उत्पन्न हो सकेगी? शरीरिक व सैनिकी कार्यक्रमों का उन पर कितना और कैसा परिणाम होगा- इस सम्बन्ध में स्वयंसेवकों का अनुभव उत्यल्प ही था। इसे समझाकर बताने की जल्दबाजी डॉक्टरजी ने कभी नहीं की। उन दिनों व्यायाम शाला और स्काऊट के कार्यक्रमों में इस प्रकार के प्रात्यक्षिक होते थे। डॉक्टरजी कहा करते, व्यायामशाला और सरकारी प्रेरणा से होने वाले स्काऊट के कार्यक्रमों और प्रखर देशभक्ति की भावना से प्रेरित निष्ठावान संघ कार्यकर्ताओं के कार्यक्रमों में बड़ा अन्तर है। ध्येयवादी और एक दिल से कार्य करने वाले स्वयंसेवकों द्वारा प्रस्तुत दंड, खड्ग समता आदि सामान्य दिखाई देने वाले कार्यक्रमों में विलक्षण जीवन्तता होती है। प्रेक्षकों को प्रभावित करने की असीम क्षमता होती है। उन्हें देखने वाला प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। अत: उत्सव प्रसंगों पर आने वाले अध्यक्षों द्वारा बाद में अपने अपने क्षेत्र में संघ कार्य बढ़ाने में दिये गये सहयोग के कारण स्वयंसेवक को भी सामान्य किंतु अच्छे ढंग से प्रस्तुत किये कार्यक्रमों की प्रभाव-क्षमता का अनुभव मिला। 
अध्यक्ष पद के लिए जिनका नाम तय होता, उन्हें राजी करने के लिए उनके साथ पत्र-व्यवहार अथवा वार्तालाप आदि आवश्यक काम स्वयं डॉक्टरजी करते थे। अध्यक्ष को संघ कार्य के विचारों और कार्यशैली के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने की जल्दबाजी डॉक्टरजी कभी नहीं करते थे। वे चाहते थे कि स्वयं, नियोजित अध्यक्ष के मन में संघ विषयक कौतूहल-जिज्ञासा उत्पन्न हो और वे अध्यक्षता स्वीकार करने के लिए तैयार हों- इसी दृष्टि से अध्यक्ष के साथ उनका प्राथमिक स्वरूप का वार्तालाप होता था। पंजाब में संघ का कार्य बढ़े इस उद्देश्य से लाहौर के सुप्रसिध्द हिन्दुत्वनिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता सर गोकुलचंद नारंग को, 1938 में, नागपुर संघ शाखा के विजयादशमी महोत्सव की अध्यक्षता करने हेतु डॉक्टरजी ने आमंत्रित किया। उनका स्वीकृति पत्र भी आ गया। जैसे ही नागपुर के हिन्दूसभाई कार्यकर्ताओं को यह जानकारी मिली कि सर गोकुलचंद नारंग नागपुर आ रहे हैं तो उन्होंने डॉक्टरजी से भेंटकर, नारंगजी का एक कार्यक्रम उनकी संस्था द्वारा आयोजित करने की अनुमति देने का आग्रह किया। पू. डॉक्टरजी ने बड़ी कुशलता से एतदर्थ अनुमति देने से इंकार करते हुए कहा कि 'आप अपनी संस्था की ओर से किसी अलग समय में स्वतंत्र कार्यक्रम सुनिश्चित कर उन्हें आमंत्रित करें। आपके कार्यक्रम के लिए भी वे अवश्य आएं, ऐसा आपकी ओर से मैं भी उनसे अनुरोध करूंगा। वे इस समय विशेष रूप से संघ के कार्यक्रम में भाग लेने हेतु ही यहां आ रहे हैं। ऐसे समय में केवल अवसर का लाभ उठाने की दृष्टि से आपने भी उन्हें आमंत्रित किया तो आपकी संस्था के प्रति उनके मन में, आपकी अपेक्षानुसार आदर भावना उत्पन्न नहीं हो सकेगीं। हिन्दूसभा जैसे अखिल भारतीय राजनीतिक दल के बारे में उनकी धारणा विकृत हो, यह आपके हित में भी उचित नहीं होगा।' डॉक्टरजी के उक्त कथन पर हिन्दूसभाई नेताओं को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने अपना अलग कार्यक्रम आगे कभी आयोजित करने का निर्णय लिया। 
संघ के कार्यक्रम में जो भी अध्यक्ष अथवा प्रमुख अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता उन्हें नागपुर के दो-तीन दिनों के वास्तव्य में, संघ के ही वातावरण में रखा जाए उनका अधिकाधिक समय संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं से वार्तालाप में ही व्यतीत हो, इसकी चिंता स्वयं डॉक्टरजी किया करते। अध्यक्ष को नागपुर प्रांत के संघचालक के यहां ठहराया जाता क्योंकि वहां डॉक्टरजी व अन्य कार्यकर्ताओं को अध्यक्ष के नित्य संपर्क मे रहना अधिक सुविधाजनक होता और आसपास का वातावरण संघ के विचारों के अनुकूल रखने में सुविधा होती। कार्यकर्ताओं के आत्मीयता पूर्ण व्यवहार और राष्ट्र समर्पित जीवन का निकट परिचय के साथ ही अनुशासनयुक्त तथा ध्येयवादी स्वयंसेवकों द्वारा पूर्ण तन्मय होकर प्रस्तुत कार्यक्रम से अध्यक्ष निश्चित रूप से प्रभावित होंगे- इसका पूर्ण विश्वास डॉक्टरजी को था। सर गोकुलचंद नारंग भी नागपुर के विजयादशमी कार्यक्रम से प्रभावित हुए। उत्सव में, अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा- आपके कार्यक्रम का निमंत्रण स्वीकार करते समय मुझे लगा कि यह भी कोई स्काऊट जैसा किंतु भव्य स्वरूप का कार्यक्रम होगा। आज तक ऐसे अनेक उत्सवों में मैं सहभागी हुआ हूं, वैसे ही यहां भी आया। किंतु यहां आपके कार्यक्रम में शामिल होत समय मुझे हर बार यही अनुभूति होती, जैसे मैं शिवाजी के राज्य में स्वतंत्र भारत में हूं- ऐसी विलक्षण जीवन्नता, आत्मीयता व विशुध्द राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत वातावरण तथा दृश्य, मुझे नागपुर में आपके बीच आकर देखने और अनुभव करने को मिला- यह मैं अपना महत् भाग्य ही मानता हूं।  
सर गोकुलचंद नारंग के सहयोग से पंजाब प्रांत में संघ का कार्य तेजी से बढ़ा। सभी प्रमुख शहरों में संघ की प्रभावी शाखाएं खुलीं। बंगाल, आंध्र, तमिलनाडु, महाराष्ट्र आदि प्रांतों के बार में भी यही अनुभव हुआ। कलकत्ता के श्री प्रेमनाथ बनर्जी व बॅरिस्टर विजयचन्द्र चटर्जी, हैदराबाद के श्री विनायकराव कोरटकर, मद्रास के डा. वादराजलु नायडू व संजीवन कामत, पनवेल (महाराष्ट्र) के श्री नानासाहब पालळकर आदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों को नागपुर उत्सव के अध्यक्ष के रूप में डॉक्टरजी ने आमंत्रित किया था। नागपुर के कार्यक्रम से प्रभावित होकर जब ये अध्यक्ष अपने-अपने प्रांत में लौटते तो वहां भी संघ कार्य की वृध्दिमें अपना सहयोग देते।  
विचार विनिमय और चर्चा आद के द्वारा अपने देश में संघ कार्य की अपरिहार्य आवश्यकता महसूस कराने की बजाय निष्ठावान कार्यकर्ताओं के स्नेहपूर्ण तथा निरपेक्ष देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत व्यवहार का अनुभव लेकर, उस वातावरण में अनुशासन बध्द कार्यक्रम का प्रत्यक्ष अवलोकर करने से संघ कार्य की महत्ता अधिक आसानी से और जल्दी समझ में आती है। डॉक्टरजी अक्सर यही कहा करते थे। भारत के विभिन्न प्रांतो में संघ कार्य का विस्तार होते समय यही अनुभव आया।

18. संघ के उत्सव

हर परिवार में सम्पन्न किय जाने वाले उत्सव, उस परिवार की अपनी विशेषता होती है। उन उत्सवों के माध्यमों से वह विशेषता प्रकट होती है। कहीं नवरात्रि का पर्व तो कहीं खंडोवा अथवा गणपति के उत्सव होते हैं। परिवार के कुलदेवता के अनुसार उत्सव आदि कार्यक्रम होते हैं। संघ की यह विशेषता भी प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले उत्सवों से प्रकट होती है। मनुष्य स्वभावत: उत्सव प्रिय होता है। रोज-रोज के वही कार्यक्रमों में उत्सव के रूप में होने वाला यह परिवर्तन स्वयंसेवकों का उत्साह बढ़ाता है। संघ की दैनिक शाखाओं के कार्यक्रमों के बारे में भी यह अस्वाभाविक नहीं। शाखा के घंटाभर चलने वाले नित्य के कार्यक्रम तथा बचे हुए 23 घंटों में कुछ समय निकालकर समाज के सभी स्तरों से सम्पर्क साधकर नये-नये मित्र बनाकर उन्हें संघ की शाखा में लाना- यही स्वयंसेवकों का नित्य का क्रम होता है। किंतु, डॉक्टरजी के विचार में, उत्सवों के निमित्ता समाज के प्रमुख व्यक्तियों को आमंत्रित कर, अधिक संख्या में स्वयंसेवकों द्वारा प्रस्तुत अनुशायन बध्द कार्यक्रमों का प्रात्यक्षिक देखकर वे सहजता से संघ कार्य को समझ सकेंगे और समाज पर भी इसका अनूकूल प्रभाव पड़ेगा। अत: संघ में भी उत्सवों जैसे कुछ नैमित्तिक कार्यक्रम किये जाने की चर्चा शुरु हुई। कौन-कौन से उत्सव मनाना संघ कार्य के लिए उपयोगी सिध्द हो सकेंगे- इस पर विचार किया जाने लगा। 
आषाढ़ शु. 15 को व्यास पौर्णिमा के दिन श्री गुरु पौर्णिमा का उत्सव तो संघ में शुरु हो चुका था। इस दिन प. पू. भगवाध्वज को अपना गुरु मानकर, उसके पूजन और श्री गुरुदक्षिणा समर्पण का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। सामान्यतया, शाला-महाविद्यालयों की ग्रीष्मकालीन छुट्टियां समाप्त होने पर किया जाने वाला गुरुपौर्णिमा का उत्सव विद्यार्थियों के लिए सुविधानजक होता। 
विजयादशमी के पवित्र दिन संघ का शुभारंभ हुआ। इसलिए सभी ने यह सुझाव दिया कि वह उत्सव भी दशहरे के दिन आयोजित किया जाये। किंतु क्या इस उत्सव को संघ स्थापना-दिन के रूप में मनाना उचित होगा? कहीं इससे संघ का संस्थाभिमान तो नहीं बढ़ेगा? हमें तो सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना है, अत: उस कार्य में यह संस्थाभिमान रखना कहां तक उचित रहेगा? डॉक्टरजी के इन प्रश्नों ने स्वंयसेवकों के विचारों को नयी दिशा दी। दशहरके के दिन दुर्गामाता ने असुरों का वध किया। अज्ञातवास के बाद इसी दिन पांडवों ने शस्त्रधारण कर युध्द शुरु किया। ऐतिहासिक काल में, शत्रु पर विजय प्राप्त करने, हिन्दू राजा इसी दिन शस्त्र धारण कर सीमोल्लंघन करते थे। दशहरे के संबंध में, स्वयंसेवकों ने उक्त विचार प्रकट किये। सबके विचार सुनने के बाद डॉक्टरजी ने कहा, विजय प्राप्त करने के लिए दशहरा, सर्वोत्तात मुहूर्त के रूप में माना जाता है। विजयादशमी यह विजय का पर्व है। विजय की आकांक्षा हृदय में लेकर किये जाने वाले हर कार्य में, विजयदशमी का यह विजय पर्व है। विजय की आकांक्षा हृदय में लेकर किये जाने वाले हर कार्य में, विजयादशमी का उतसव मनाना उचित है। आसुरी शक्ति पर प्रभु रामचंद्र की जवय, पाशवीशक्तियों को मात कर दुर्गादेवी द्वारा प्राप्त विजय की स्मृति में सीमोल्लंघन भी स्वयंसेवकों और समाज को प्रेरणा दे सकेगा। अत: इस दिन गणवेश में स्वयंसेवकों द्वारा अनुशासबध्द होकर संचलन करते हुए सीमोल्लंघन कार्यक्रम करना उचित रहेगा। 
और, कौन सा उतसव मनाना उचित रहेगा? बेठकों में यह विषय निकलने पर स्वयंसेवक अपने-अपनेसुघव प्रस्तुत करने लगे। किसी ने कहा, शिवाजी महाराज हम सबके आदर्श ऐतिहासिक महान पुरुष हैं- उनका उतसव मनाया जाना चाहिए। किंतु यह उत्सव किस तिथि को लेना चाहिए? जन्मदिन पर या मृत्युदिन पर? आगरा में, औरंगजेब की कारा से मुक्ति का दि नही प्रेरणादायी रहेगा। रोहिडेश्वर के मंदिर में, जिस दिन शिवाजी महाराज ने अपने साथियों के साथ स्वराज्य स्थापना का संकल्प (प्रतिज्ञा) लिया- वह दिन तो महत्वपूर्ण है ही किन्तु जिस दिन यह संकल्प पूरा हुआ वह दिन अधिक स्फूर्तिपद रहेगा। एक स्वयंसेवक के इस सुझाव पर कि जेष्ठ शु. 13 को हमें 'शिव साम्राज्य दिनोत्सव' मनाना चाहिए, डॉक्टरजी ने कहा- हां, हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना का दिवस, हमें 'हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव' के रूप में मनाना अधिक उचित होगा। अपना कार्य आरंभ करते समय, स्वराजय स्थापना का जो लक्ष्य सामने रखा, उसकी प्राप्ति का आदंन व्यक्त करने वाला यह दिन संघ के उतसव हेतु सर्वोत्ताम है- सभी इस विचार से सहमत हुए। 
अन्य उत्सवों के बारे में भी, इसी तरह सभी स्वयंसेवकों के साथ मिलकर विचार किया गया। संघ कार्य की विशेषता अभिव्यक्त हो सके, ऐसे और कौनसे उत्सव हो सकते हैं? कार्यवृध्दि की दृष्टि से अपने हिन्दू समाज को स्वाभिमानी व शक्तिशाली बनाने के लिए पाषक सिध्द होने वाले विशेष प्रसंग क्या हो सकते हैं? ये प्रश्न उठने पर एक स्वयंसेवक ने कहा कि हिन्दू समाज में उत्सवों की कमी नहीं है। किसी भी उत्सव के निमित्ता समाज को संघ विचारों से उद्बोधित किया जा सकता है। उस स्वयंसेवक की आवेशपूर्ण भाषा से चर्चा के इस अनौपचारिक वातावरण में थोड़ी गंभीरता आ गई। इसी बीच एक स्वयंसेवक के इस कथन पर कि अगर ऐसा है तो पंचम जार्ज बादशाह का जन्म दिवस मनाते हुए अंग्रेजों के अनुशासित व देशभक्तिपूर्ण जीवन का बखान कर, इस अंग्रेजी राज्य में भी अपने स्वयंसेवकों और समाज को आसानी से उत्स्फूर्त किया जा सकता है- अत: वह उत्सव भी हम मना सकते हैं। बैठक में हंसी का फव्वारा फूट पड़ा- गंभीर वातावरण में पुन: खुलापन आ गया। आवेश और तनाव का वातावरण समाप्त हो गया। 
अपनी हिन्दू संस्कृति की विशेषता दर्शाने वाले उत्सव कौन से हो सकते हैं? जिन उत्सवों को मनाने से हिन्दू जीवन पध्दति के लिए आवश्यक गुणों का विकास हो सके- ऐसे उत्सव कौन से हैं? विचार-प्रकटन का क्रम पुन: प्रारंभ हुआ। कोई स्त्री यदि किसी को अपना भाई मानकर राखी बांधे तो भाई-बहिन के उस रिश्ते को प्राण-पण से निभाना, यह हिन्दू जीवन की विशेषता है। मानस भगिनी की, किसी भी संकट से रक्षा करने का दायित्व निभाने का संकल्प, हमारे हिन्दूजीवन की विशेषता हैं इसलिए हमें रक्षा बंधन का पर्व मनाना चाहिए। साथ ही, इस प्रसंग पर सार्वजनिक उतसव में भाषण करते समय ऐसे विचार करने चाहिए जो समाज में यही भगवा जगा सके। हम स्वयं मनसा-वाचा-कर्मणा हिन्दूजीवन जायें और समाज को भी उद्बोधित करें। स्वयंसेवकों के मन में यह विषय पैठ कर गया। 
हर व्यक्ति समाज का ऋणी हैं निरपेक्ष भावना से समाज हित का कार्य कर वह ऋण चुकाने का दायित्व समाज के हर व्यक्ति को अपना प्रथम कर्तव्य मानकर निभाना चाहिए। यही हिन्दू जीवन दृष्टि हैं आत्म विस्मृति के कारण अंधकार में रहने वाले अपने समाज को स्व-सामर्थ्य, आत्मशक्ति और राष्ट्रीयता का बोध कराना अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओरले जाना ही संघ का कार्य हैं अत: हमें 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का संदेश देने वाला मकर संक्रमण का उत्सव भी मनाना चाहिए। यह सुझाव सभी स्वयंसेवकों ने उचित समझा। इस प्रकार अपनी हिन्दू संस्कृति की विशेषताओं की रक्षा करने की स्फूर्ति देने वाला 'मकर संक्रमणोत्सव' सार्वजनिक रूप से मनाने का निर्णय लिया गया। 
मनुष्य की जैसी श्रध्दा होगी और तदनुसार वह जीवन में अथक प्रयत्न करेगा तो वेसा ही वह बनेगा। ''यो य: श्रध्द: सएवस:'' एक स्वयंसेवक को यह संस्कृत का वचन याद हो आया, जिसे उसे उधृत किया। इस पर अन्य स्वयंसेवक ने कहा, 'नर करनी करे तो नर का नारायण हो जाए'। हम अमृतत्व के पुत्र हैं- हमने अपने हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने का संकल्प लिया है- यह संकल्प करने का सर्वोत्ताम मुहूर्त वर्ष प्रतिपदा का है- 'गुढ़ी-पाडवा' को इस दृष्टि से उत्कृष्ट मुहूर्त माना जाता है। शालिवाहन शक कका आरंभ भी इसी शुभ दिन से होता है- इसलिए वर्ष प्रतिपदा- नव वर्ष के आरंभ का शुभ स्मरण कराने वाले दिन के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। वर्ष प्रतिपदा- यह डॉक्टरजी का जन्म दिवस भी है, इसकी जानकारी डॉक्टरजी के निधन के बाद ही स्वयंसेवकों को मिल पायी। 
इस प्रकार वर्ष भर में नैमित्तिक कार्यक्रम के रूप में गुरु पौर्णिमा, विजयादशमी, मकर-संक्रमण, वर्ष प्रतिपदा और हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव- ये छह उत्सव मनाने का विचार संघ में स्थायी बना।  
 

19. संघ शिक्षा वर्ग

संघ शाखाओं की नित्य बढ़ती संख्या को देखते हुए, शाखाओं के संचालन के लिए अधिकाधिक कार्यकर्ताओं के निर्माण का महत्वपूर्ण विषय भी चर्चा में आने लगा। पू. डॉकटरजी के साथ किये गये सामूहिक चिंतन से यह निष्कर्ष निकला कि वर्ष भर चलने वाले दैनंदिन शाखा कार्यक्रमों के अतिरिक्त, छुट्टियों की सुविधा देखकर माह-सवा माह तक कुछ चुने हुए स्वयंसेवकों के लिए शारीरिक बौध्दिक आदि कार्यक्रमों की कोई सूत्र-बध्द योजना बनाई गई तो अधिक संख्या में कार्यकर्ता उपलब्ध हो सकेंगे। यह भी विचार किया गया के ऐसे वर्ग में शामिल होने वाले स्वयंसेवकों के मन, बुध्दि और हृदय संस्कारित होने से संघकार्य करने की उनकी क्षमता बढ़ेगी। 
छात्रों को दो माह का ग्रीष्मकालीन अवकाश मिलता है। इस कालखंड का उपयोग, कार्यकर्ताओं के निर्माण हेतु वर्ग के आयोजन के लिए करना ठीक रहेगा। सभी स्वयंसेवक इस विचार से सहमत हुए। इस काल में छुट्टियां होने से शालाएं बंद रहतीहैं। अत: परिचित शिक्षा संचालकों से शाला की इमारत प्रशिक्षार्थी स्वयंसेवकों के आवास की व्यसव्था हेतु मांगने का विचार किया गया। तदनुसार नागपुर की कायदे शाला, धनवटे नगर विद्यालय (सिटी स्कूल-तत्कालीन नाम) तथा न्यू इंग्लिश स्कूल के भवन संघ शिक्षा वर्ग के लिए निशुल्क उपलब्ध होने लगे। वर्ग के लिए 1 मई से 10 जून तक 40 दिनों का समय सुविधाजनक होने से निश्चित किया गया। चालीस दिनों तक एकत्र रहते समय भोजन, वैधकीय व्यवस्‍था, प्रकाश, जलपूर्ति आदि का विचार भी किया गया तथा इस परहोने वाले खर्च की पूर्ति के लिए वर्ग में सहभागी होने वाले प्रशिक्षार्थी स्वयंसेवकों के लिए शुल्क निर्धारित किया गया। 1929 में संघ का प्रथम शिक्षा वर्ग नागपुर में प्रारंभ हुआ। इन वर्गों का संघ शिक्षा वर्ग यह नाम तो 1950 के बाद प्रचलित हुआ। प्रारंभ में उन्हें 'ग्रीष्मकालीन वर्ग' ही कहा जातां 
'ग्रीष्मकालीन वर्ग' कहने से कार्यकर्ताओं के निर्माण की विशेषता स्पष्ट नहीं हो पाती, अत: इसके लिए कोई अन्य संबोधन खोजना होगा। यह विचार भी स्वयंसेवकों की चर्चा में आने लगा। उन दिनों इस वर्ग में शारीरिक शिक्षा के लिए आवश्यक दंड, खडग, योगचाप, शूल आदि कार्यक्रमों की अपेक्षा अनुशासन निर्माण हेतु गणवेश में समता-संचालन जैसे सैनिकी कार्यक्रम पर विशेष बल दिया जाता। गणवेश में किये जाने वाले इन सैनिकी कार्यक्रमों में, अंग्रेजी भाषा में आज्ञायें, ही उन दिनों प्रचलित थीं। प्रारंभ में उनका ही उपयोग किया गया। उत्सव प्रसंगों पर किये जाने वाले प्रात्यक्षिकों में इस प्रकार के सैनिकी कार्यक्रमों का समाज पर गहरा असर होता। उन दिनों कॉलेज के छात्रों को (University Training Corps½ U.T.C. द्वारा सैनिक शिक्षा दी जाती थी। U.T.C. में भाग लेने वाले स्वयंसेवकों के माध्यम यह कार्य आसानी से किया गया। स्वयंसेवक शाखा में दण्ड लेकर आते थे। इस दण्ड को डी.पी. (for Drill Purpose) बंदूक समझकर शाखा में समता का यह प्राथमिक प्रशिक्षण कार्य चलता। इनमें, उन दिनों अंग्रेजी आज्ञाओं का ही उपयोग होता। 
अपने ग्रीष्मकालीन वर्ग को किस नाम ये सम्बोधित किया जाए? एक बैठक में यह विचार चर्चा हेतु प्रस्तुत हुआ। एक ने सुझाया- Training Class, इस पर अन्य स्वयंसेवक ने कहा कि इस नाम में, यह संघ की शाखाओं के लिए है, यह जोड़ना आवश्यक है अत: इसे Sangh Training Class कहा जाये। डॉक्टरजी ने कहा कि वर्ग में दिया जाने वाला प्रशिक्षण एक विशेष प्रकार का है। संघ का कार्य करने के लिए अधिक योग्यता प्राप्त कार्यकर्ता तैयार करने के लिए ही हम काफी मेहनत से यह वर्ग चलाते हैं। इसमें ये ध्येयनिष्ठ, खुली दृष्टि रखकर समाज में समरस होकर संघ कार्य करने वाला, संघ की जीवन-दृष्टि को आत्मसात कर, संघ कार्य के लिए अधिकाधिक समय देने वाले कार्यकर्ताओं के निर्माण होने का लक्ष्य ही, इस वर्ग का प्रयोजन है। संघ के अधिकारी (Officers) प्रशिक्षित करने के लिए यह वर्ग है। अत: Officers Training Camp (OTC) यह नाम उन दिनों प्रचलित हुआ। तत्कालीन स्वयंसेवकों के वार्तालाप में आज भी अनवधान से इस विशेष वर्गों के लिए ओ.टी.सी. यह नामोल्लेख सुनने को मिलता है।  
1939-40 के बाद अंग्रेजी-आज्ञाओं के स्थान पर संस्कृत हिन्दी के शब्द प्रयोग होने लगे। उन दिनों किसी जानकार ने ओ.टी.सी. का हिंदी अनुवाद 'अधिकारी शिक्षा वर्ग' किया। किंतु इस नाम के आद्याक्षरों को मिलकार जो संक्षिप्त नाम होता है वह 'अशिव' शब्द है। अपने मंगल कार्य में किसी भी कार्यक्रम का 'अशिव' शब्द से उल्लेख किया जाना उचित नहीं होगा। इसलिए पूजनीय श्री गुरुजी क मार्गदर्शन में इस वर्ग का नाम 'संघ शिक्षा वर्ग' के रूप में प्रचलित हुआ। 
जो स्वयंसेवक शाखा में नियमित रूप से आते थे, उनमें से ही, बड़ी सावधानीपूर्वक, चुने गये स्वयंसेवक ही इस संघ शिक्षावर्ग में सहभागी होते थे। प्रांरभ में कुछ वर्षों तक यही क्रम चला। बाद में, शाखाओं की संख्या बढ़ाने के लिए, ग्रीष्म कालीन छुट्टियों में 4-65 सप्ताह तक विभिन्न गांवों में विस्तारक भेजने की योजना बनी। उन दिनों मार्च में परीक्षाएं समाप्त होते ही महाविद्यालय ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के बंद हो जाते। इस कारण अप्रैल माह में विस्तारक भेजे जाने लगे। अधिकांश विस्तारक विदर्भ और महाकोशल प्रांत में भेजे जाते। जिन गांवों में ये विस्तारक जाते, वहां माह भर के अपने वास्तत्वय में संघ की शाखा खोलते और शाखा के संचालन हेतु, जिन स्वयंसेवकों में दायित्व स्वीकार कर शाखा के कार्यक्रम लेने की क्षमता दिखाई दे, ऐसे स्वयंसेवकों को चुनकर उन्हें संघ शिक्षा वर्ग में लाने का प्रयास किया जाए- यह विस्तारकों से अपेक्षा की जाती। इस प्रकार ऐसे नवपरिचित स्वयंसेवकों में से सक्षम कार्यकर्ता तैयार करने की योजना संघशिक्षा वर्ग में कार्यान्वित की जाने लगी। संभव हुआ तो लगातार, अन्यथा अपनी सुविधानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष शिक्षित कार्यकर्ता वर्ग में शिक्षक के रूप में काम करने लगे। इसके साथ ही एक विश्वसनीय संघ कार्यकर्ता के रूप में उसकी क्षमता को स्वीकार किया जाने लगा। 
संघ शिक्षा वर्ग में अपने वास्तत्वय कला में शिक्षार्थी स्वयंसेवक पूर्णतया संघ-विचार और व्यवहार के चिंतन में मग्न रहे- इस दृष्टि से वर्ग का वेला-पत्रक सुनिश्चित किया गया। प्रात: काल 3.45 बजे उठने के बाद से रात्रि 10 बजे तक होने वाले विविध कार्यक्रमों में उसका सहभाग आवश्यक माना गया। सुबह 5 से 8 बजे तक संघ स्थान पर शरीरिक कार्यक्रम, 8 से 9 घोष प्रशिक्षण के वर्ग, बाद में स्नान, 11 से 12 के बीच भोजन और फिर  1 बजे तक विश्रांति। दोपहर 1  बजे से 2 के बीच स्वयंसेवक शरीरिक शिक्षण क्रम व समता सम्बन्धी लेखन कार्य करते। दोपहर 2 से 3 चर्चा, विचार विनिमय, 3॥ से 5 तक बौध्दिक वर्ग में प्रमुख चिंतक का भाषण, सायं 6 से 7॥ गणवेश में संघ स्थान पर कार्यक्रम होते। फिर रात्रि में 8॥ से 9॥ के बीच भोजन, 9॥ से 10 अनौपचारिक वार्तालाप तथा रात्रि 10 बजे नींद हेतु स्वयंसेवक निवृत होते। 
वर्ग में, डॉक्टरजी एवं अन्य अधिकारी पूर्ण समय तक रहते। इस कारण कार्यक्रमों के ईच समय में, चर्चा बैठक और रात्रि के अनौपचारिक वार्तालाप में वे भी सहभागी होते। 
1937 के संघशिक्षा वर्ग तक, इन वर्गों में प्रति शनिवार रात्रि में मनोरंजन के कार्यक्रम भी होते और रविवार को संघ स्स्थान पर होने वाले कार्यक्रम नहीं होते- इस एक दिवसीय अवकाश में, वर्ग में सहभागी स्वयंसेवक नागपुर के स्थानीय स्वयंसेवकों से भेंट वार्तालाप करते। 1938 के बाद, रविवार के इस अवकाश से शारीरिक- बौध्दिक कार्यक्रम में रुकावट पैदा हाती है, इसलिए यह अवकाश देने की प्रथा बंद कर दी गई और उसके स्थान पर नितय की भांति कार्यक्रम होने लगे। आगे चलकर, इन वर्गों का काल मर्यादा 40 दिनों की बजाए 30 दिन निश्चित हुई। 
1934 तक संघ शिक्षा वर्ग केवल नागपुर में ही हुआ करत। 1935 से पुणे में प्रथम व द्वितीय वर्ष के वर्ग प्रारंभ हुए। ग्रीष्मकालीन छुट्टियों की सुविधा के अनुसार पुणे का वर्ग 22 अप्रैल से 2 जून तक और नागपुर का वर्ग 1 मई से 10 जून तक हुआ करता। पू. डॉक्टरजी वर्ग प्रारंभ होने पर 15 मई तक पुणे में और उसके बाद नागपुर के वर्ग में वास्तव्य करते। 1938 में लाहौर (पंजाब) में भी इसी प्रकार प्रथम व द्वितीय वर्ष के वर्गों का आयोजन हुआ। लाहौर का वर्ग वहां की ग्रीष्म कालीन छुट्टियों की सुविधा के अनुसार जुलाई में होता। इसके बाद, जैसे-जैसे कार्य बढ़ता गया, अन्य प्रांतों में भी प्रथम और द्वितीय वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग आयोजित होने लगे। केवल तृतीय वर्ष की शिक्षा के लिए सभी शिक्षार्थियों को नागपुर में ही आना अनिवार्य माना गया। अन्य प्रांतों क हर वर्ग में, मुख्यशिक्षक और अन्य शिक्षक नागपुर से ही भेजे जाते। 
इसके पश्चात हुए परिवर्तन की जानकारी स्वयंसेवकों को है, इसलिए उनका विशेष उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। संघ की कार्यपध्दति में संघ शिक्षा वर्ग का विशेष महत्व होने से यहां उनके विकास की यह संक्षिप्त चर्चा ही पर्याप्त होगी।

20. बौध्दिक कार्यक्रम

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बौध्दिक वर्ग और बौध्दिक कार्यक्रम, ये शब्द-प्रयोग संघ की कार्यपध्दति के कारण ही समाज में अन्यत्र उपयोग में आने लगे। संघ प्रारंभ होने के पूर्व व्याख्यान, भाषण आदि शब्द समाज में प्रचलित थे। कोई विद्वान, महापुरुष अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता अथवा नेता किसी सभी को घंटा-सवा घंटा संबोधित करे, तो उसे व्याख्यान कहा जाता था। शरीर को सुदृढ़ व कार्यक्षम बनाये रखने के लिए तथा मनुष्य में साहस और आत्मविश्वास जगाने के लिए संघ में शारीरिक कार्यक्रमों की योजना हुई। ये कार्यक्रम उन दिनों और आज भी अन्य व्यायामशालाओं में होते हैं, किंतु शारीरिक क्षमता के साथ ही व्यक्ति का मन और बुध्दि को भी संस्कारित करना आवश्यक है। पवित्र, शांत व एकाग्र मन तथा कुशाग्र बुध्दि के अभाव में, उसी प्रकार सामज जीवन का दायित्व भी हम पर है, इसका बोधनित्य निरंतर जागृत रहे बिना, स्वयंसेवक का जीवन सद्गुण सम्पन्न, शील-चारित्र्य से युक्त और ध्येय-निष्ठ नहीं बन सकेगा। नित्य की बैठकों में डॉक्टरजी के साथ सामूहिक चिंतन में यह विचार प्रकट हुआ। प्रारंभिक काल में आवश्यकतानुसार पू. डॉक्टरजी की कार्यक्रमों में बोला करते थे। किंतु आगे चलकर जिस प्रकार शरीर संस्कारित करने के लिए नित्य शरीरिक कार्यक्रम करना आवश्यक है, उसी प्रकार मन और बुध्दि को संस्कारित करने के लिए सप्ताह में एक दिन बौध्दिक कार्यक्रम की योजना भी सभी के साथ विचार-विनिमय के बाद निश्चित हुई और बौध्दिक कार्यक्रम भी संघ में शुरु हो गये। 
संघ यह बौध्दिक- कार्यक्रम केवल विद्वान व अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ताओं के भाषण आयोजित कराने तक ही सीमित नहीं था। संघ का कार्यकर्ता भी अध्ययन कर संघ संबंधित किसी विषय पर बोले- यह पध्दति भी बौध्दिक वर्ग में प्रारंभ की गई। प्रारंभ में, स्वयंसेव कइस प्रकार बौध्दिक वर्ग में बोलने में सकुचाते थे। नियोजित विषय का अध्ययन करने के बाद भी जब स्वयंसेवकों के सामने खड़े होकर बोलने का अवसर आता, तो कुछ कार्यकर्ता गड़बड़ा जाते और बोल नहीं पाते। ऐसे कार्यकर्ताओं से अनौपचारिक वार्तालाप में डॉक्टरजी कहते- 'संघकार्य हमें ही करना है। अत: संघ का विचार व सिध्दांत लोगों को समझाकर बताने का काम भी हमें ही करना होगा। नये-नये स्वयंसेवकों को उनके कर्तव्यों का बोध कराना तथा तदनुसार अपने जीवन को आवश्यकतानुसार मोड़ देना आवश्यक है- इसके लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता उचित शब्दों में उनके ध्यान में लाने का काम भी हमें ही करना होगा। इसलिए हमें अपने विचारों को अध्ययन के द्वारा परिष्कृत कर उन्हें स्वयंसेवकों तथा समाजबांधवों के समक्ष व्यक्त करने की कला अवगत करनी होगी। संघ कार्य के प्रसारार्थ अपन विचार-आचार संबंधी प्रतिपादन प्रभावी शब्दों में करने की कला-अवगत कराने के लिए ही संघ में इन बौध्दिक वर्गों को योजना की गई है। इस विचार से, स्वयंसेवकों को विचार करने की नयी दिशा मिली। 
इन बौध्दिक वर्गों में, स्वयंसेवकों को अनुशासन बध्द ढंग से बैठने के बाद, भाषण शुरु होने के पूर्व दो विशेष कार्यक्रमों की योजना की गई। एक कार्यक्रम होता व्यक्तिगत गीत का- यह गीत भी भाषण क विषयानुकूल विचारों व भावनाओं से भरा होता, जिसे कोई स्वयंसेवक अपनी सुरीली आवाज में गाकर सुनाता। इस भावपूर्ण गीत को सुनते समय स्वयंसेवक तल्लीन होकर नियोजित भाषण सुनने की मन:स्थिति में आ जाते। इसीलिए गीत और गीत-गायक का उचित चयन बौध्दिक कार्यक्रम की योजना का एक आवश्यक अंग बन गया। गीत की स्वर-संगति, तर्ज और लय का चयन अगर ठीक ढंग से किया गया तोउस गीत की भावनाएं स्वयंसेवकों और सुनने वाले अन्य समाज बांधवों के हृदय को छू जाती। अक्सर यह भी अनुभव में आता कि कार्यक्रम समाप्ति के बाद उस गीत के स्वर और शब्द श्रोताओं के मन में बने रहते। घर लौटते समय अनेक श्रोताओं के मुंह से उस गीत को गुनगुनाते हुए भी अक्सी सुना जाता। इसीलिए भाषण क पूर्व ऐसे प्रभावी गीत का चयन बौध्दिक-वर्ग का एक आवश्यक अंग बन गया। 
व्यक्तिगत गीत चयन के बाद, यथोचित शब्दों में भाषण देने वाले वक्ता का परिचय कराया जाता। डॉक्टरजी इस बात का बड़ा ध्यान रखते कि परिचय अच्छे ढंग से कराया जाये। सामाजिक मानसिकता के विशेषज्ञों की राय में पुस्तक पढ़ने के पूर्व लेखक का परिचय और भाषण देने के पूर्व वक्ता का परिचय पठकों अथवा श्रोताओं को होना आवश्यक है। भाषणकर्ता ने संबंधित विषय का गहराई से अध्ययन किया है, और इसलिए वे इस विषय के प्रतिपादन के 'अधिकारी हैं आदि यथोचित शब्दों में वक्ता का परिचय किया जाता। प्रारंभिक काल में भाषण देते समय अनेक प्रकार के मजेदार अनुभव आते थे। ऐसे ही एक प्रसंग का यहा संस्मरण हो आता है। डॉक्टरजी ने, वक्ता का यथोचित शब्दों में परिचय कराया और कहा कि आज के बौध्दिक वर्ग में श्री ........................ अंग्रेजी मे अपना भाषण देंगे। यह कहते ही वक्ता श्री ................................... भाषण देने के लिए खड़े हुए। लगभग 1 घंटे तक भाषण देने की तैयारी करआये वक्ता महोदय केवल इतना ही ही बोल पाये ''Revert Dectorji and dear swayamsevak brothern,''- और बाकी का सारा भाषण भूल गये। जो विचार व्यक्त करने का, मन में संजोकर वे आये थे, उसकी शृंखला टूट गयी और उन्हें कुछ याद न रहा। आधे मिनट तक वे वैसे ही खड़े रहे और बोलना असंभव प्रतीत होने से नीचे अपनी जगह पर जाकर बैठ गये। डॉक्टरजी ने खड़े होकर, उस दिन का बौध्दिक वर्ग स्वयं लिया। वे बोले, भाषण करना संभव नहीं हो पाने के अनुभवन प्रारंभ में अच्छे-अच्छे वक्ताओं को भी आते हैं। आगे चलकर, अच्छे ख्याति प्राप्त वक्ताओं को भी भाषण देने लोगों के सामने खड़े होते ही दिमाग में संयोजे विचार मानों लुप्त हो गये- ऐसे अनुभव आये हैं। अत: हमें इस पर भी मात करनी चाहिए। ऐसे कुछ मजेदार प्रसंगों को सुनाकर उन्होंने उस वक्ता और स्वयंसेवकों का उत्साह बढ़ाया। 
डॉक्टरजी इस ओर भी विशेष ध्यान देते के बौध्दिक वर्ग में भाषण किसी का भी हो, अपने किसी सहयोगी स्वयंसेवक से उस भाषण का सारांश बताने को कहते। उसके कथन में कोई भूल रह गयी, कोई मुद्दा अस्पष्ट रहा अथवा वह बताना भूल गया तो बैठक में उपस्थित अन्य स्वयंसेवक अथवा स्वयं डॉक्टरजी उसे स्पष्ट कर समझाने का प्रयास करते। इस तरह स्वयंसेवकों में ध्यान पूर्वक भाषण सुनने और उसका चिंतन मनन करने की आदत डाली गई। बौध्दिक वर्ग में, भाषण समाप्ति के बाद श्रोताओं को तालियों नहीं पीटनी चाहिए। अपने परिवार में पिताजी अथवा आप्त हितैषी व्यक्ति यदि अपने हित में कोई कहते हैं तब तो हम तालियां नहीं पीटते। इसी प्रकार समाज के वरिष्ट जनों की बातें सुनकर, आत्मीयता से उसका विचार करना चाहिए और तदनुसार आचरण करने का प्रयास करना चाहिए। इस बात पर डॉक्टरजी विशेष बल दिया करते। 
किसी जाहिर कार्यक्रम में प्रमख अतिथि अथवा अध्यक्ष का भाषण होने के बाद श्रोताओं ने अगर तालियां नहीं पीटी तो शुरु-शुरु में नवपरिचित लोगों को संघ के इस अनुशासन बध्द कार्यक्रम में उनका ठंडा स्वागत हुआ, प्रतीत होता था। कुछ लोग ऐसी भावनाएं भी व्यक्त करते। किन्तु संघ के कार्यक्रम में यही सीख दी जाती है कि आदरणीय व्यक्ति का भाषण का ध्यानपूर्वक सुना जाए और उसके उपदेशों को आचरण में लाने का प्रयास किया जाए। इसीलिए संघ के कार्यक्रम में तालियां पीटने की पध्दति नहीं है। धीरे-धीरे यह बात समाज के अन्य लोगों की समझ में आने लगी।  
 

21. शिशिर शिविर

संघ के विविध कार्यक्रमों में शीतकालीन शिविर का भी अपना विशेष महत्व है। संघ का कार्य प्रारंभ होने पर, दो-तीन वर्षों में ही यह शिविर का कार्यक्रम शुरु हुआ जो आज तक प्रतिवर्ष होता आया है। डॉक्टरजी ने प्रारंभ से ही इस बात का ध्यान रखा के केवल संघस्थान पर ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में अनुशासन का पालन किया जाना चाहिए और इसलिए अनुशासन यह स्वयंसेवक स्वभाव बने। शाखाओं में तथा उतसव प्रसंगों पर गणवेश में समता व पथसंचलन आदि के कार्यक्रम होते थे। जीवन में अनुशासन की आदत डालने के लिए स्काऊट में अथवा कॉलेज छात्रों को उपलब्ध U.T.C. (University Training Corps) में Winter Camps हुआ करते थे। उन शिविरों के माध्यम से अनुशासन के संस्कारों को जीवन में गहराई से उतारना संभव है, यह बात ध्यान में आयी। संघ में भी अनुशासन के साथ ही देशभक्ति के संस्कार सुदृढ़ करने की दृष्टि से इस प्रकार के शीतकालीन शिविरों का आयोजन उपयोगी रहेगा। इस विचार पर सभी कार्यकर्ता सहमत हुए। घरेलु वातावरण से दूर, केवल स्वयंसेवकों का, तीन-चार दिनों का अनुशासन युक्त सहजीवन, जहां संघ कार्य के लिए उपयोगी सिध्द होगा, वहीं स्वयंसेवकों के निर्माण के लिए भी आवश्यक है। यह विचार पक्का होने पर शिविर का आयोजन सुनिश्चित हुआ। 
शिविर को सफल बनाने के सम्बन्ध में सभी प्रमुख स्वयंसेवकों के साथ विचार-विनिमय किया गया। 1928, में नागपुर में सोनेगांव हवाई अड्डे का निकटवर्ती स्थान शिविर के लिए सुविधाजनक माना गया। पड़ोस में स्थित तालाब, मंदिर पेयजल के लिए बड़ा कुंआ तथा खुला मैदान- शिविर के लिए सभी दृष्टि से सुविधाजनक था। वहीं नागपुर संघ शाखा का प्रथम शिविर सम्पन्न हुआ। पूर्णतया संघमय वातावरण में, अनुशासित सहजीवन और सहचिंतन का अनुभव स्वयंसेवकों के लिए विलक्षण प्रेरणादायी रहा। 
दूसरे वर्ष, शिविर में निवास हेतु तंबुओं की व्यवस्था करने की बात सोची गई। उन दिनों संघ के पास तंबू नहीं थे। नागपुर के संघ-प्रेमी परिचितों के यहां से छोटे-बड़े तम्बू शिविर हेतु एकत्रित करने के निमित्ता नये-नये प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क साधा गया। उन दिनों 25 दिसम्बर से 1 जनवरी तक सभी स्कूलों-कॉलेजों को क्रिसमस की छुट्टियां होती थी। यही दिन सुविधाजनक होने से दि. 24 दिसम्बर से 28 दिसम्बर तक तरुण स्वयंसेवकों का गणवेश में शिविर लेने का क्रम शुरु हुआ। 
तरुणों के शिविर में चार दिवसीय चलने वाले कार्यक्रम, बाल स्वयंसेवकों केलिए अधिक कष्टप्रद और खर्चीले होने क कारण, 1932 केदिसंबर में, तरुणों के शिविर के एक सप्ताह पूर्व, शनिवार सायंकाल से सोमवार सुबह तक उसी स्थान पर बाल स्वयंसेवकों का शिविर लिया गया। उमरेड रोड पर स्थित दिघोरी नामक गांव में श्री राजाबाल साहेअ चिटणवीस के बंगले के अहाते में बाल स्वयंसेवकों का गणवेश में प्रथम शिविर सम्पन्न हुआ। पूर्व परिचय होने के कारण बंगेले के कुछ कमरे निवास व्यवस्था हेतु भी उपलब्ध हुए- जिनमें डॉक्टरजी तथा उनके बंधु आदरणीय आबाजी हेडगेवार आदि वरिष्ठ व्यक्तियों का शिविर के पूर्व काल तक वास्तव्य रहा। कुछ बाल स्वयंसेवकों क आवास की व्यवस्था बंगले के एक बड़े दालान में की गई। 
संघ कार्य की दृष्टि से शिविर की उपयोगिता ध्यान में आने क कारण एक गांव अथवा शहर के स्वयंसेवकों के शिविर की भांति ही अधिक व्यापक क्षेत्र के तहसील, जिला और प्रांत स्तर पर भी इस प्रकार के, सब स्वयंसेवकों की सुविधा से, शिविर आयोजित करने की पध्दति शुरु हुई। इसी का परिवर्धित स्वरूप 1981 में कर्नाटक प्रांत का शिविर जिसमें 22,000 स्वयंसेवक शामिल हुए और पुणे के निकट तळासरी में 1988 के संक्रांति पर्व पर महाराष्ट्र प्रांत के शिविर, जिसमें 35 हजार स्वयंसेवकों ने भाग लिया- सामने आया। 
हजारों स्वयंसेवकों में अनुशासित जीवन की आदत डालने वाला यह शिविर अनेक दृष्टि से संघकार्य के लिए पोषक और उपयोगी सिध्द हुआ। सुसंगठित समाज जीवन का प्रतीक और सुदृढ़ राष्ट्रजीवन का सहजता से अनुभव कराने वाला यह लघुरूप देखकर लोगों में यह विश्वास बढ़ने लगा कि अपने हिन्दू समाज को बलशाली और राष्ट्रभक्त बनाने का, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य ही एकमेव सच्च और सही मार्ग है। इसके साथ ही संघ कार्य का आकर्षण भी बढ़ा। इस प्रकार के कार्यक्रमों के कारण जहां राष्ट्रनिष्ठ लोगों के मन में संघ और स्वयंसेवकों के प्रति अपनत्व की भावना निर्माण हुई, वहां स्वार्थी और राष्ट्रद्रोही प्रवृत्ति के जनमानस में जलन और धाक (दबदबा) पैदा होने लगा। शिविर को सफल बनाने हेतु व्यापक सम्पर्क तथा संघ क प्रति सहानुभूति का क्षेत्र भी विशाल होने लगा। 
संघ कार्य की व्याप्ति बढ़ने (विस्तार होने) के बाद डॉक्टरजी के लिए सभी स्वयंसेवकों के साथ विचार-विनिमय करना असंभव सा हो गया। कुछ इने-गिने कार्यकर्ताओं क साथ नित्य ही चर्चा संभव हो पाती। शाखाओं की संख्या बढ़ने के कारण हर शाखा में जाना भी डॉक्टरजी के लिए असंभव था- किंतु शिविर में तीन-चार दिन एकत्र रहकर स्वयंसेवकों को डॉक्टरजी का मार्गदर्शन प्राप्त होता।

22. संस्कृत प्रार्थना

विदर्भ-महाराष्ट्र तथा महाकोशल में रायपुर जैसी शाखाओं को छोड़कर अन्य प्रांतों में 1937 तक केवल बनारस में ही शाखा स्थापित हो चुकी थी। भाई परमानंदजी की प्रेरणा से लाहौर से एक-दो स्वयंसेवक सन् 1934-35-36 के नागपुर संघ शिक्षा वर्ग में भाग लेने आये थे, किंतु वहां शाखाएं शुरु नहीं हो पायीं थी। 1937 के बाद ही अन्य प्रांतों में स्वयंसेवक शिक्षार्थी और प्रचारक बनकर गये, तभी उनके प्रयासें से पंजाब, दिल्ली, उत्तार प्रदेश, बिहार, मद्रास व बंगाल में संघ की शाखाएं खुलने लगीं। उन दिनों इन सभी प्रांतों की एक शाखाओं में, एक मराठी श्लोक व एक हिन्दी श्लोक से मिलकर बनी प्रारंभिक पार्थना ही होती थी। प्रार्थना का अर्थ बौध्दिक वर्गों में स्वयंसेवकों को समझाकर बताया जाता। किंतु, जब अखिल भारतीय स्तर पर संघ के कार्य का विस्तार होने लगा तो संस्कृत भाषा में, सरल किंतु अर्थपूर्ण शब्नों से नयी प्रार्थना की आवश्यकता अनुभव में आने लगी। इसी प्रकार समता के कार्यक्रमों व अन्य शरीरिक कार्यक्रमों की मराठी व अंग्रेजी भाषा में दी जाने वाली आज्ञाओं का संस्कृत अनुवाद करना भी आवश्यक प्रतीत हुआ। इस पर विचार करने के लिए 1939 के फरवरी माह में, नागपुर से 50 कि.मी. दूरी पर स्थित सिंदी (जि. वर्धा) में एक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक की सारी व्यवस्था वहां के संघचालक श्री नाना साहब टालाटुले के बाड़े में की गई। इस विचार-विनिमय में, डॉक्टरजी, पू. श्री गुरुजी, श्री बाळासाहब देवरस, मा. अप्पाजी जोशी, श्री विट्ठलराव पत्की, श्री नानासाहब टालाटुले, श्री तात्याराव तेलंग, श्री बाबाजी सालोडकर तथा श्री कृष्णराव मोहरील ने भाग लिया। बैठक की उचित व्यवस्था का दायित्व श्री बबनराव पंडित पर सौंपा गया। इस बैठक में, 1925 से 1939 तक क्रमश: विकसित कार्यपध्दति सुनिश्चित की गई। सभी आज्ञाएं संस्कृत में देने का निश्चय हुआ। संस्कृत में प्रार्थना तैयार करने के सम्बन्ध में भी विचार-विनिमय हुआ। 
संघ की प्रार्थना में जिन विचारों को सुस्पष्ट शब्दों में प्रकट करना है, उनका क्रम भी इसी बैठकमें निश्चित किया गया। आज जो संस्कृत भाषा की प्रार्थना है, उसी का मराठी-गद्य स्वरूप पहले तय हुआ जिसे बाद में संस्कृत में लिपिबध्द करने की दृष्टि से मराठी-गद्य की पंक्तियां निकालकर डॉक्टरजी ने महाराष्ट्र प्रांत संघचालक श्री का. भा लिमये (सांगली) तथा विनायकराव आपटे (पूणे) के पास इसकी सूचना भिजवाई कि वे किसी जानकार संस्कृत पंडित के द्वारा उनका संस्कृत अनुवाद कर यथा शीघ्र नागपुर भिजवाएं। मराठी-गद्य की एक प्रति नागपुर के संस्कृत विद्वान व मोहिते शाखा के कार्यवाह श्री नरहर नारायण भिड़े के पास भी भिजवाई तथा उनके गुरु महामहोपाध्याय डॉ. केशव गोपाळ ताम्हन से विचार-विनिमय कर, संस्कृत अनुवाद तैयार करने का आग्रह किया। श्री भिड़े द्वारा किया गया संस्कृत-अनुवाद सर्वोत्कृष्ट प्रतीत होने से सभी ने उसे स्वीकार किया। श्री भिड़े को संस्कृत का गहरा अध्ययन था, इसलिए केवल एक शब्द में थोड़ा परिवर्तन उन्होंने सूचित किया। वह परिवर्तन इस प्रकार था- 'अभ्युदय व नि:श्रेयस'- इन दोनों की प्राप्ति के श्रेष्ठ साधन के रूप मे वीरव्रत''- इसमें अभ्युदय शब्द का उपयोग करते समय श्लोक की पंक्ति में एक मात्रा कम होने से जो कमी रह जाती है, उसकी पूर्ति हेतु उसकी बजाय 'समुत्कर्ष' शब्द रखा गया- जिसे सभी ने सहर्ष स्वीकार किया। 1940 के प्रारंभ में, यह संस्कृत प्रार्थना तैयार हुई जो पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में डॉक्टरजी की उपस्थिति में और नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग में पू. गुरुजी की उपस्थिति में कही गयी। पू. श्रीगुरुजी उस समय नागपुर संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी थे। संघ शिक्षा वर्गों के बाद सम्पूर्ण भारत की शाखाओं में संस्कृत प्रार्थना का प्रारंभ हुआ। 
हमें, यह जानकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है कि संघ कार्य में प्रार्थना जैसा महत्वपूर्ण विषय संघ प्रारंभ होने के 15 वर्षों बाद सुनिश्चित हुआ। इसका प्रमुख कारण यही था कि संघ कार्य के लिए पूर्णतया अनुकूल कार्यपध्दति, स्वाभाविकतया, सभी स्वयंसेवकों के विचार-विनिमय के बाद ही, हर बार सुनिश्चित की गई। प्रत्यक्ष कार्य करते समय, जो-जो आवश्यक प्रतीत हुआ, उस सम्बन्ध में सामूहिक चिंतन के निष्कर्ष से ही संघ की कार्यपध्दति विकसित होती गई। पू. डॉक्टरजी के कार्यकर्ताओं के साथ अनौपचारिक वार्तालापों से ही हुआ संघ की कार्यपध्दति का यह विकास संघ कार्य की एक विशेषता के रूप मे आज हम सबके सामने है। 
शरीरिक शिक्षाक्रम में पहले पराठी की आज्ञाएं होती थीं। आज हम- 'क्रमिका एक कुरु' यह जो आज्ञा देते हैं, पहले मराठी भाषा में वह इस प्रकार दी जाती थी- 'रामरामी एक सुरु'। 'षद्पदी ऊर्ध्वभ्रमण चतुष्क' की बजाय उन दिनों 'चौरंगी उडव मार चौक' यह आज्ञा दी जाती। इस प्रकार शरीरिक शिक्षाक्रम का सारी आज्ञाएं श्री बाबाजी सालोडकर और श्री नरहर नारायण भिडे के सहयोग से संस्कृत में की गईं और इन आज्ञाओं की शुध्द संस्कृत शब्द रचना संघ शिक्षा वर्गों के माध्यम से सर्वत्र प्रचलित हुई। 
समता के लिए उपयोग में लायी जाने वाली अंग्रेजी-आज्ञाओं का भी श्री न.ना. भिडे ने संस्कृत में सुंदर भाषान्तर किया। यथा Formation- के लिए व्यूह, March Past- प्रदक्षिण संचलन, Advance in Review order के लिए प्रत्युत, Line formation- ततिव्यूह, Halt स्तभ, form fours- चतर्व्यूह आदि संस्कृत के शब्द प्रयोगों की हम सभी को आदत हो गई। Band के लिए घोष, Bugle के लिए शंख, Flute के लिए वंशी, Side drum के लिए आनक आदि संस्कृत नाम आज सर्वपरिचित हो चुके हैं।  
इस प्रकार आज्ञाओं में यथा समय संस्कृत परिवर्तन, नये-नये कार्यक्रमों की स्वीकृति, 15 वर्षों बाद संस्कृत में प्रार्थना का सुनिश्चय आदि क्रमश: होने वाले परिवर्तनों को देखकर मन में यह प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि इसमें संघ की कार्यपध्दति की कौन सी विशेषता है? हर बार अपने सहयोगी कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के साथ वार्तालाप के पश्चात सर्वसम्मति से ही यह परिवर्तन होता गया है- इसलिए सभी ने उसे मन:पूर्वक स्वीकार भी किया। स्वाभाविकतया पू. डॉक्टरजी ने अपनी प्रतिभा और कार्यकुशलता से भी को स्वीकार्य ऐसा परिवर्तन, आवश्यकतानुसार संघ कार्य में लाया है- यही संघ की कार्यपध्दति की विशेषता है। कोई भी परिवर्तन सर संघचालक ने आदेश देकर नहीं किया- सबके साथ, खुले दिल से विचार-विनिमय कर, सबकी सहमति से ही कोई परिवर्तन करने की संघकार्य में आदत डालना- यही कार्यपध्दति की विशेषता है।

23. स्वदेशी का व्रत

उन दिनों खादी का उपयोग करने का आग्रह करनेवाला वातावरण था। सार्वजनिक स्थलों पर विदेषी कपड़ों की होली जलाने के प्रति नवयुवकों का उत्साह सर्वत्र दिखलाई पड़ता। तकली पर सूत के कार्यक्रमभी सार्वजनिक रूप में होते। जो कार्यकर्ता यह बताता कि उसने जो कपड़े धारण किये हैं, वे सभी स्वयं अपने हाथों से काते गये सूत से बने हैं, तो उसे श्रेष्ठ दर्जे का कार्यकर्ता माना जाता। उत्सव प्रसंगों पर स्वागत करते समय अध्यक्ष अथवा अतिथि के गले में अपने घर में काते गये सूत से बना हार ही डालने का रिवाज चल पड़ा था। स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करो, स्वदेशी कपड़े धारण करोए विदेशी माल का बहिष्कार करो- इस प्रकार की घोषणाओं से गुंजित वातावरण का स्वाभाविकतया स्वयंसेवकों के मन पर भी असर होता। उन दिनों सफेद शक्कर मारीशस से आयात होती थी। भावुक युवकों ने उसका उपयोग त्यागने का निर्णय लिया। उन दिनों कानपुर और मिर्जापुर में बनने वाली शक्की कुछ पीला रंग लिये होती - फिर भी इसी शक्कर के उपयोग का आग्रह किया जाता। महाल (नागपुर) स्थित केळीरोड पर चलने वाली दुकान - 'स्वदेशी शक्कर का आंबेकर किराना भंडार' में उन दिनों ग्राहकों की भीड़ लगी होती। उस दुकान का नाम चमकने लगा था। 
ऐसे स्वदेशी से भरे माहौल में, स्वयंसेवकों के मन में भी स्वाभाविकतया यह विचार उठता कि संघ में आने वाले स्वयंसेवकों पर भी, देश प्रेम और देशभक्ति की भावना हृदयस्थ करने के लिए विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और खादी के कपड़ों का उपयोग करने का बंधन (अनिवार्यता) डालना क्या उचित नहीं होगा? चाय यदि विदेशी है तो उसे नहीं पीने का नियम वह उपने लिये क्यों न बनाये? गणवेश भी खादी का ही हो, ऐसा आग्रह क्यों न किया जाए? ऐसे अनेक प्रश्न स्वयंसेवकों के मन में उभरते। स्वयंसेवकों ने इस सम्बन्ध में अपनी राय व्यक्त की। डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों के विचार सुने और कहा, स्वदेशी का विषय, महत्व का विषय है अत: हम कल इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे। 
दूसरे दिन विचार-विनिमय प्रारंभ होने पर स्वदेशी वस्त्रों के उपयोग के बारे में सभी की सहमति पायी गयी। किंतु, डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों पर स्वयं अपने हाथों से काते गये सूत से बने कपड़ों का उपयोग करने की शर्त लादी जाना, क्या उचित रहेगा? इस पर स्वयंसेवकों से उन्होंने राय मांगी। किसी ने कहा कि इसके लिये तो सूत कताई पर ही रोज चार-पांच घटे खर्च करने पड़ेंगे। अपना काम धंदा, उपजीविका चलाने हेतु किया जाने वाला उद्योग-व्यवसाय, शाला-कॉलेज के समय के अलावा अतिरिक्त अध्ययन करने के बाद सूत कताई के लिये इतना समय निकालना प्राय: असम्भव ही है। डाक्टरजी ने कहा, अगर ऐसी बात है तो,हर व्यक्ति, भारत के प्रत्येक देशप्रेमी नागरिक को यह आग्रह नहीं करना चाहिए कि अपने हाथों से काते सूत से बने कपड़े ही पहने जाएं। यदि उपने लिए सूत कातना संभव नहीं हो तो फिर दूसरे भारतीयों द्वारा काते गये सूत से बने कपड़े भी इतनी मात्रा में उपलब्ध होना तो संभव नहीं कि सभी भारतवासियों की आवश्यकताओं को पूर्ण किया जा सके। अत: विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आग्रह रखते हुये भी, यह तो किया जा सकता है कि हम भारतीय मिलों में अथवा भारतीय बुनकरों द्वारा हाथकरघे पर बुने गये वस्त्रों का अवश्य उपयोग करें। इसके लिये स्वयंसेवकों ने कहा, अपने जीवन को सही मोड़ देने के लिये हम नित्य अपनी प्रार्थना में, अपनी मातृभूमि की वंदना करते हैं। यह शरीर मातृभूमि के ही काम आए - यह इच्छा जाहिर करते हैं। यह विचार यदि हमारे मन में दृढ़ता स्थापित करता है तो जो जो स्वदेशी है, भारत में ही तैयार हुई वस्तुएं हैं, उनका ही उपयोग करना हमारा स्वभाव बनना चाहिये। विदेशी वस्तुओं का परित्याग, यह स्वाभाविक रूप में हरेक के जीवन की सार्थकता का विषय बनना चाहिये। इसके लिये आदेश देने या आदेश प्रसारित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। डॉक्टरजी ने कहा, यह विचार तो ठीक है किन्तु 'स्वदेशी' के अन्य पहलुओं पर भी हम सभी को मिलकर विचार करने की आवश्यकता है। 'स्वदेशी' के ये अन्य पहलू क्या हो सकते हैं, इसका विचार करते हुए स्वयंसेवक अपने घर लौट गये। 
अगले दिन डॉक्टरजी की उपस्थिति में, पुन: स्वदेशी की चर्चा चल पड़ी। जो वस्तुयें भारत में तैयार नहीं होती उनके विषय में स्वयंसेवकों के मन में तिरस्कार की भावना पैदा होनी चाहिए। विदेशी वस्तुओं का स्पर्श भी त्याज्य माना जाना चाहिऐ - एक स्वयं सेवक ने अपना मत व्यक्त करते हुऐ कहा कि भारत में चष्में के कांच तैयार नहीं होते अत: हमें चष्मा पहिनना ही छोड़ना होगा। उन दिनों चष्में के कांच तैयार करने के कारखाने भारत में नहीं थे अत: उन्हे विदेशों से आयात करना पड़ता था। एक अन्य स्वयंसेवक ने कहाए अपने यहां घड़ियों और साइकिलें भी विदेशों से आती हैं। उन दिनों स्कूटर और मोटर साइकिलों का प्रचलन प्राय: नहीं के बराबर था। मोटर साइकिल का उपयोग करने वाला स्वयंसेवक अपवाद स्वरूप ही मिलता। इसलिये किसी ने स्कूटर और मोटर साइकिल की बात नहीं निकाली। जहां तक घड़ियों, साइकिलों और चष्में की बात है, यह ठीक है कि भारत में इसके कारखाने खुलने चाहिए - क्योंकि ये सब सामान्य लोगों की आवश्यकताएं है। इसलिए तब तक ऐसी वस्तुओं को स्पर्श ही नहीं किया जाए, यह कहना उचित और व्यावहारिक नहीं होगा। जिन्हे उसकी आवश्यकता है, उन्हे अवश्य उनका उपयोग करना चाहिए किन्तु यह ध्यान रहे कि केवल शौक या 'प्रतिष्ठित जीवन' के प्रतीक के रूप् में उन्हे खरीदना चाहिऐ। सभी स्वयंसेवक इस राय से सहमत हुए। साथ ही, सारे समाज को स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की आदत डालनी हो, तो इसकी शुरूआत स्वयं से करनी होगी। यदि हम स्वयं स्वदेशी को न अपनाएं और अन्यों से उसका आग्रह करें तो हमारे कहने या आग्रह करने का कोई पहरणाम नहीं होगा। 'बोले तेसा चाले' अर्थात जिसकी कथनी और करनी में समानता हो, ऐसे स्वयं सेवक ही समाज को प्रभावित कर सकेंगे - यह विचार भी स्वयंसेवकों ने प्रकट किया। पू0 डॉक्टर जी ने कहा कि इस सम्बन्ध में एक मनोरंजन अनुभव फिर कभी बताऊंगा और बैठक वहीं समाप्त हो गयी। 
कुछ दिनों बाद स्वयंसेवकों से वार्तालाप करने का अवसर मिलते हए कुछ स्वयंसेवकों ने डॉक्टरजी से अपना वह मनोंरंजक अनुभव सुनाने का आग्रह किया। डॉक्टरजी ने उस अनुभव को सुनाते हुए कहाए 'विदेशी चाय पीना छोड़ो' - इस प्रकार का प्रचार चल रहा था। इसी निमित्त नागपुर के चिटणीस पार्क में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन भी किया गया था। उसमें भाषण देने वाले नेता बड़े आवेश में बोले जा रहे थे - चाय बागान में मजदूरों के साथ  गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता है। हंटर (कोड़े) मारकर उनसे जबरन काम लिया जाता है। उनके खून का लाल रंग चाय में भी उतरता है - इसलिए देशवासियों चाय पीना छोड़ दो। नेताजी के भाषण पर लोग तालियां पीटते दिखाई देते। ऐसा आवेशपूर्ण भाषण देने के बाद वह नेता पड़ौस के होटल में पिछले दरवाजे से घुसा और अपने पूर्व परिचित उस होटल के मालिक से कहने लगा - पांडोबा, (पांडोबा बापट उस होटल मालिक का नाम था) जरा, दो कप स्पेशल गरम चाय जल्दी तैयार करना। पांडोबा का मित्र परिवार काफी बड़ा था - वह स्वयं खादी पहनता था - नाड़ी वाली चड्डी जो घुटनों के नीचे तक उतरती थी, और हाथों की कुहनी से नीचे उतरती बांहों वाली बनियान धारण करने वाली इस मूर्ति को उसके क्षेत्र के अनेक लोग जानते थे - भाषणकर्ता नेताजी से भी उसका परिचय था। पांडोबा ने कहा, मैंने आपका भाषण सुना - बहुत ही प्रभावी रहा फिर भी आप स्वयं........! पांडोबा इस वाक्य को पूरा करता, इसके पूर्व ही नेताजी ने उसे टोकते हुए कहा - अरे, पांडोबा मुझे अभी और सभा में ऐसा ही भाषण देने जाना है - गला सूख गया है, जरा चाय जल्दी लाओं! डॉक्टरजी द्वारा बताये गये इस अनुभव को सुनकर वहां उपस्थित सभी स्वयंसेवक ठहाके लगाकर हंसने लगे। 
शाखा समाप्ति के बाद, एक दिन पुन: डॉक्टरजी स्वयंसेवकों के साथ वार्तालाप में रम गये। उन्होने कहा, स्वदेशी कपड़े - स्वदेशी वस्तुएं - स्वदेशी टोपी - आदि तो आवश्यक है ही किन्तु ये सब शरीर को ढांकने वाले आवरण मात्र हैं। टोपी के नीचे स्थित सिर में भी स्वदेशी का विचार दृढ़ता से रहना चाहिए। यह कहकर डॉक्टरजी ने पुन: स्वदेशी संबंधी विचारों को चालना दी। स्वदेशी आवरण के भीतर भी स्वदेशी का ज्वलन्त अभिमान होना चाहिए और यह संघ कार्यार्थ समाज में सर्म्पक करते समय सौम्य किंतु आग्रह पूर्वक शब्दों में व्यक्त होना चाहिए। इस पर स्वयंसेवक भी अपने विचार खुलकर प्रकट करने लगे। किसी ने कहा, शरीर ढांकने वाले कपड़े खादी के, किन्तु अंग्रेजी में सभाभाषण करने वाले लोगों को सभ्य-सुस्ंकृत माना जाता है और संस्कृत का अध्ययन अथवा अपनी मातृभाषा में बोलने वाला पिछड़ा-असभ्य माना जाता है - ऐसा मानने वाले पढ़े- लिखे लोगों को अंग्रजों ने अपनी शिक्षा पध्दति से अंग्रेजियत में ढालने का प्रयास किया है। एक अन्य स्वयं सेवक ने कहा - अपने विचारों के समर्थन में शेक्सपीअर अथवा मिल्टन के उदाहरण सन्दर्भ के रूप में बताने की बजाए कालिदास अथवा भवभूति के सन्दर्भ बताना निश्चित ही स्वदेशी भावना का परिचय देना, माना जाएगा। डॉक्टरजी ने कहा, हरेक को अपनी भाषा, दर्शन शास्त्र, अर्थनीति आदि के प्रति अभिमान रहना चाहिए। बातचीत करते समय, उसका आग्रह भी स्वाभविकतया प्रकट होना चाहिए। किंतु, इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि अंग्रेजों के अच्छे गुण भी हमें आत्मसात करने चाहिए। विश्व के किसी भी दिशा और देश से आने वाले उत्ताम विचारों को हम ग्रहण करेंगे - ऐसी वृत्ति हमारी होनी चाहिए। एक स्वयं सेवक ने यह शंका प्रस्तुत की कि अंग्रेजों ने तो हमें गुलाम बनाया, भारत की सारी सम्पत्ति लूट कर ले गये और हमें निर्धन बनाया, तब उन अंग्रेजों से सीखने या ग्रहण करने योग्य कौन सी बात हो सकती है? दूसरे स्वयंसेवक ने उत्तार दिया - अंग्रजों से उत्तम देशभक्ति सीख सकते हैं। मुगल सम्राट की एक कन्या बीमार थी - एक अंग्रेज डॉक्टर के इलाज से वह ठीक हो गयी। इस सेवा के बदले में उस अंग्रेज डॉक्टर ने अपनी अंग्रेजी कम्पनी को भारत में व्यापार करने की सहूलियत मांगी - अपने खुद के लिए उसने कुछ नहीं मांगा। उसकी यह स्वदेश भक्ति वास्तव में अनुकरणीय हैं। डज्ञॅक्टरजी ने कहा, इंग्लैण्ड विश्व में सर्वोत्तम सुंसगठित राष्ट्र है - एक सुंसगठित समाज के रूप् में आंग्ल समाज हमारे सामने नमूने के रूप् में रह सकता है। अपने पीछे इंग्लैण्ड की सारी शक्त्ति खड़ी है, इस आत्मविश्वास के साथ ही एक गोरा (अंग्रेजी) सार्जेंट, भारत में किसी बड़ी सभा के चलते, उसे तुरंत बर्खास्त करने का आदेश लेकर निर्भयता के साथ उस भरी सभा के बीच से अध्यक्ष तक जा धमकता है और, सरकारी मनाई हुकूमत का कागज अध्यक्ष के हाथों में थमाता है!! ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए एक अंग्रेज नवयुवक सैकड़ों मील दूर अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में, निर्भयता पूर्वक अकेला ही निकल पड़ता है। अंग्रेजों से यह गुण हमें ग्रहण करना चाहिए। किसी जमाने में भारत के भी साधू-सन्यासी अमेरिका, मेक्सिको, चीन, जापान जेसे दूरस्थ देशों में गये थे। वहां उन्होने अपनी श्रेष्ठ संस्कृति व हिंदु जीवन पध्दति का और राम-कृष्ण आदि आदर्शों का प्रचार कर, वहां के जन-जीवन को प्रभावित किया था - इसका हमें स्मरण रखना चाहिए।  
एक बार बैठक में चाय के बारे में पुन: चर्चा चल पड़ी कि चाय तो विदेशी पेय है। अत: उसकी बजाय हमें दूध, विशेषतया गो-दुग्ध का सेवन करने का आग्रह करना चाहिए। डाक्टर जी ने कहा,  गाय के प्रति हमारे मन में श्रध्दा और पूज्य भाव तो होने ही चाहिये, किंतु संघ का कार्य करते समय, सभी स्तर के लोगों से सम्पर्क करने के हमारे कार्य में, कहीं हमारी व्यक्तिगत आदत बाधा तो नहीं बनती, इसका ध्यान रखना भी जरूरी है। यदि हम किसी के यहां जाते हैं और वह चाय जैसी आयानी से तैयार होने वाली वस्तु के साथ हमारा स्वागत करना चाहता है तो उसे यदि इस बात का पता चल जाए कि हम तो सिर्फ दूध और वह भी गाय का दूध ही लेते हैं, चाय को तो स्पर्श तक नहीं करते, त बवह धर्मसंकट में पड़ जायेगा। हमारे घर आत्मीयता के साथ वार्तालाप करने आये व्यक्ति को मैं चाय भी नहीं दे सकता और घर में गाय का दूध नहीं है; इस भावना से वह दु:खी होगा। अत: इस दृष्टि से हमें सतर्क रहना चाहिऐ। हमारे किसी व्यवहार या आदत से सामने वाले व्यक्ति की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचे, इसका हमें सदैव ध्यान रखना चाहिये। 
स्वयंयसेवकों का हृदय स्वदेशी बनना चाहिये। कार्य की चिंता करते समय स्वदेशी विचारों और अपनी संस्कृति को सर्वोपरि महत्तव दिया जाना चाहिये। जो केवल अंग्रेजी भाषा ही जानता है, मराठी अथवा हिंदी नहीं समझ पाता, उसके साथ पत्र-व्यवहार में अंग्रेजी भाषा का ही उपयोग करना पड़ेगा किन्तु अपने आत्मीयजनों से स्वदेशी या मातृभाषा कस आग्रह ही रखना होगा। कपड़ों-वस्त्रों का उपयोग भारतीय पध्दति से किया जाना चाहिए। यह समझने का कोई कारण नहीं कि जो फेलपैंण्ट, टाय और हैट पहिनता है वही सभ्य और श्रेष्ठ है और जो कुरता-पायजामा-धोती पहिनता है वह गंवार, अनपढ़ और असभ्य है। ऐसा सोचना मानसिक गुलामी का लक्षण है। व्यक्ति का मूल्यांकन उसके कपड़ों से नहीं गुणों से करना चाहिए। इस आशय के विचार डॉक्टरजी ने स्वयंसेवकों के साथ अनौपचारिक वार्तालाप में व्यक्त किये। मन स्वदेशी हुआ तो वयवाहर भी अपने आप स्वदेशी के लिए पोषक होगा। यह विचार स्वयंसेवकों के मन में पैठ गया। और संघ की कार्यपध्दति में 'स्वदेशी का व्रत' आवश्यक अंग के रूप में स्वयंसेवकों ने स्वीकार किया।

24. समाचार पत्रो में प्रसि‍ध्दि

डॉक्टरजी के यहां स्वयंसेवकों से अनौपचारिक वार्तालाप के समय पुणे के एक समाचार-पत्र में प्रकाशित समाचार का उल्लेख हुआ। पुणे में सम्पन्न स्वयंसेवकों के निजी कार्यक्रम से समबन्धित वह समाचार था। एक स्वयंसेवक ने कहा कि संघ के कार्यक्रमों को यदि समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाये तो संघ के विचार लोगों तक पहुंचाना आसान होगा। इस पर अन्य स्वयंसेवक ने कहा, यदि यही पध्दति अपनायी गयी तो आगे चलकर स्वयंसेवक यह भी सोचने लगेंगे कि संघ के उत्सवों की निमंत्रण पत्रिकाएं घर-घर जाकर देने की अपेक्षा वर्तमान-पत्रों में ही उसका प्रकाशन करना उचित होगा। फिर किसी स्वयंसेवक ने यह आशंका प्रकट की कि समाचार-पत्र संघ के कार्यक्रमों का वृत्ता सही ढंग से प्रकाशित करेंगे, इसका क्या भरोसा? कुछ स्वयंसेवकों की राय में संघ के विचारों का प्रसार-प्रचार करने के लिए समाचार पत्रों का उपयोग किया जाना चाहिए। डॉक्टरजी ने कहा, समाचार पत्रों में प्रसिध्दि के चक्कर में संघ कार्य को क्षति पहुंचे तो उसे उचित नहीं माना जा सकता। यह विषय महत्व का है। इस पर सभी को सावधानी पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है- सभी सका विचार करें। अवसर मिलने पर, पुन: इसका विचार हम अवश्य करेंगे। 
दो-चार दिन बाद विचार-विनिमय अवसर उपलब्ध हुआ। इस बीच दिल्ली का, संघ से सम्बन्धित समाचार प्रकाशित हुआ था। उस समाचार में कहा गया था कि श्री बाबासाहेब आपटे और श्री वसंतराव ओक- ये दोनों संघ प्रचारक इन दिनों संघ कार्य करने हेतु दिल्ली में आये हुए हैं और वे यहां संघ की शाखाएं खोलेंगे। भारत की राजधानी में संघ का कार्य प्रारंभ होने जा रहा है, यह जानकर स्वाभाविकतया स्वयंसेवकों के मन में प्रसन्नता और समाधान की भावना पैदा हुई। डॉक्टरजी ने कहा, दिल्ली में अभी हाल ही में जैसे-तैसे संघ का कार्य प्रारंभ होने जा रहा है। अत: ऐसे समय इस प्रकार समाचार-पत्र में ऐसा समाचार प्रकाशित होना ठीक नहीं हुआ। संघ का कार्य वहां जड़ जमाये, इसके पूर्व ही ऐसे समाचार के प्रकाशन से चतुर और तीक्ष्ण बुध्दिवाले अंग्रेज शासकों का ध्यान भी उस ओर आकर्षित होगा- जो यह नहीं चाहते कि संघ कार्य बढ़े, ऐसे लोग भी हमारे काम में नाहक कठिनाईयां पैदा करने का प्रयास कर सकते हैं। कार्य बढ़ने के बाद सार्वजनिक कार्यक्रम का वृत्ता भले ही वह संक्षेप में क्यों न हो, अगर प्रकाशित होता है तो वह हमें चल सकता है और उसमें अनुचित ऐसा कुछ भी नहीं। बाद में, समाचार पत्र भी हमारे कार्य की उपेक्षा नहीं कर पायेंगे। हमारे कार्य की प्रसिध्दि और प्रचार संघ शाखाओं के प्रभाव से होनी चाहिए। डॉक्टरजी के विचार स्वयंसेवकों के मन में बैठ कर रहे थे। डॉक्टरजी ने कहा, उक्त आशय का पत्र मैंने श्री वसंतराव के नाम भेजा है और भविष्य में, इस बारे में सावधानी बरतने की सूचना भी दी है। 
कुछ दिनों बाद, प्रसिध्दि का यह विषय पुन: चर्चा में आया। नागपुर के विजयादशमी महोत्सव के अध्यक्षीय भाषण का वृत्ता तैयार कर समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजा गया था- वह प्रकाशित हो, ऐसा अनुरोध भी डॉक्टरजी ने संपादकों से किया था। भूतपूर्व राज्यपाल श्री तांबे और सर मोरोपंत जोशी संघ के उतसव में अध्यक्ष और प्रमुख अतिथि के नाते उपस्थित हुए थे। सरकारी दरबार में उनके शब्दों का वनज था। इस कारण, समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके भाषणों का अच्छा परिणा हुआ। संघ पर तथा सरकारी सेवाओं में कार्यरत स्वयंसेवकों पर किसी प्रकार की पाबन्दी लगाने का विचार करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को, इन भाषणो के बाद, संघ पर कोई आरोप लगाने या आपत्ति उठाने का विचार कुछ काल के लिए त्योगने को विवश होना पड़ा। क्योंकि, उक्त दोनों वक्ता महोदयां ने अपने भाषणों में संघ कार्य की प्रशंसा ही की थी। 
एक बार बैठक में 'आइना' (दर्पण) और उसकी उपयोगिता की चर्चा निकल पड़ी। एक स्वयंसेवक ने कहा, हम कैसे दिखाई देते हैं, आईना हमें बिना किसी झिझक के बताता है है। सिर पर के बाल ठीक से संवारे नहीं हो, शर्ट की कॉलर एक ओर से भीतर की ओर दबी हुई हो, आंखों की किनोर साफ नहीं हो, चाय की कुछ बूंदे मूछों पर जमीं हों तो ये सारी बातें अपने उस स्वरूप का हूबहू दृश्य हमें आईना ही दिखाता है। एक स्वयंसेवक ने वहां बैठक एक बड़ी मूछों वाले स्वयंसेवक की ओर देखकर उक्त बातें बड़े विनोद में कही तो सारे स्वयंसेवक खिलखिलाकर हंस पड़े। इस प्रकार हास्य-विनोद के साथ बैठकें चला करती। डॉक्टरजी भी उसमें सहभागी होते। डॉक्टरजी ने कहा, हम कैसे दिखाई देते हैं यह तो आईना हमें बताता है किन्तु हम दिखते कैसे हैं, इसकी बजाए हम कैसे हैं, यह बात क्या अधिक महत्वपूर्ण नहीं? सिर पर बाल कैसे हैं, इसकी अपेक्षा सिर में निरपेक्ष देशभक्ति के विचारों पर ही हमें अधिक बल देना चाहिए। शरीर पर धारण किए गए कपड़ों की इस्त्री ठीक है या नहीं, इसकी अपेक्षा उस शरीर का हष्ठपुष्ट बलशाली होना अधिक महत्वपूर्ण है। डॉक्टरजी की बातें, स्वयंसेवक बड़ी गंभीरता से सुन रहे थे। समाचार पत्रों में संघ का वृत्ता प्रमुखता से प्रकाशित हो, इसकी बजाय हमें अपनी संघ शाखाओं को अधिक सुदृढ़ करने, स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ाने, उनमें आत्मीय सम्बन्ध बढ़ाने, अनुशासन को जीवन का स्थायी भाव बनाने आदि बातों पर अधिक बल देना चाहिए। समाचार पत्रों में प्रसिध्दि की चाह या भूख तो तीव्रता से बढ़ती जाती है और तब हमारा ध्यान शाखा के विधायक कार्य की बजाय, विचलित होकर हम भारी प्रसिध्दि के शिकार बनते हैं। 
एक बैठक में, विजयादशमी की निमंत्रण पत्रिकाओं की वितरण व्यवस्था पर चर्चा हो रही थी। उत्सव के 8-10 दिन पत्रिकाओं का वितरण हो जाना चाहिए। निमंत्रण पत्र बांटने में काफी समय लेता है। किसी कम परिचित या अपरिचित व्यक्ति के यहां निमंत्रण पत्र देते समय उसके साथ इसी निमित्ता परस्पर वार्तालाप करना ही पड़ता है। संघ कार्य विषयक जानकारी उसे देनी पड़ती है और वह उत्सव में अवश्य पधारे, इसका प्रयास किया जाता है। यह प्रयास कुछ मात्राओं में सफल भी होता है। किन्तु इस प्रकार निमंत्रण पत्र के वितरण में प्रतिदिन केवल 4-6 सज्जनों के यहां जाना ही संभव हो पाता। एक स्वयंसेवक ने अपना उक्त अनुभव सुनाया। डॉक्टरजी ने कहा, हां इसी पध्दति से निमंत्रण पत्रों का वितरण होना चाहिए। इससे अपने समाज के सज्जनों से निकटता प्रस्थापित होती है और आगे चलकर उन्हें भी कार्य से जोड़ा जा सकता है। इसकी बजाय यदि हम निमंत्रण पत्र को समाचार-पत्रों में प्रकाशित कर सार्वजनिक निमंत्रण देने की व्यवस्था करें तो, लोग हमारे कार्यक्रम में कम-अधिक मात्रा में आयेंगे ही, किन्तु प्रत्यक्ष सम्पर्क के द्वारा अपना विचार घर-घर तक पहंचाने और उसके द्वारा सम्पूर्ण समाज को संगठित करने का काम नहीं हो पायेगा। हां, निमंत्रण-पत्रों का ठीक ढंग से वितरण करने के बाद यदि हम उसे समाचार-पत्रों में प्रकाशित करवाएं तो वह उपयोगी हो सकता है। 
संघ की कार्यपध्दति में उत्कृष्ट संघ शाखाओं के निर्माण पर ही अधिक बल दिया जाता है। कुछ ठोस कार्य होने पर अपनी योजना से ही आवश्यकतानुसार प्रसिध्द का सहारा लिया गया। उसका लाभ भी मिला। लोग संघ पर यह आरोप लगाते थे कि Sangh is shy of publicity- संघ प्रसिध्दि से दूर भागना चाहता है। हम इस आरोप को चुपचाप सहन करते रहें। आज अनेक सत्ताधारी नेता भी यह कहते पाये जाते हैं कि संघ प्रसिध्दि क पीछे कभी नहीं रहा, इसलिए संघ की शक्ति कितनी है, उसकी जड़ें समाज जीवन में किस गहराई तक पहुंच चुकी हैं, इससे हम बेखबर रहे। संघ के प्रारंभिक काल में, प्रसिध्दि के सम्बन्ध में इस प्रकार समन्वय साधने की नीति संघ कार्य पध्दति का स्वाभाविक अंग बन गई।

उपसंहार

आज तक संघ पर अनेक बार शासनकर्ताओं की ओर से आघात किये गये। पूर्णतया, असत्य आरोप लगाकर संघ को अवध घोषित किया गया। संघ स्थान पर कार्यक्रम करना भी असंभव हो गया। प्रारंभ में संघ का साहित्य भी अत्यल्प था। संघ की प्रार्थना और स्वयंसेवकों का जीवन ही साहित्य के रूप में संघ के पास है- यह बात 1938 के अप्रैल में, महाराष्ट्र की एक बैठक में डॉक्टरजी ने जब कही थी, उस समय तक संघ कार्य भारत के सभी प्रांतों में फैल चुका था। डॉक्टरजी उक्त उत्तार सुनकर अनेक सुविद्य प्रतिष्ठित लोग आश्चर्यचकित रह गये। संघ कार्य और पध्दति के विकास में, पहले कार्य शुरु हुआ- और पध्दति क्रमश: विकसित होती गई। समाज के साथ सम्पर्क, नये-नये स्वयंसेवकों को शाखा में लाना समता शारीरिक कार्यक्रमों को सामान्य होने पर भी मन:पूर्वक तथा ठीक ढंग से करना, इन बातों पर डॉक्टरजी का सदा आग्रह रहता। इन बातों से ही जनमानस को प्रभावित किया जा सकता है। कार्य शुरु होने के बाद, आवश्यकतानुसार सर्व सम्मति से कार्यपध्दति का स्वाभाविकतया विकास होते गया। जहां आवश्यक होता, वहीं डॉक्टरजी उद्बोधन करते। यहां अनायास ही भगवत गीता का वह प्रसंग स्मरण हो आता है। कुरुक्षेत्र में युध्द के लिए तैयार खड़े अर्जुन को श्रीकृष्ण भगवान ने गीता सुनायी। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की मानसिक दुर्बलता को जाते थे, किन्तु उस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष उपदेश और मार्गदर्शन, युध्द प्रारंभ होने के पूर्व यथोचित समय पर ही उन्होंने किया। डॉक्टरजी ने भी ठीक उसी तरह स्वयंसेवकों के राष्ट्रनिष्ठ जीवन के निर्माण में ही पहले अपनी सारी शक्ति लगाई और कार्य करते हुए, सामूहिक चिंतन से, आवश्यकतानुसार संघ की कार्यशैली का विकास किया।

---------------- Note: Content of this blog post is writer's personal opinion and may not be SanghParivar.org or Sangh's view.

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NAND LAL SAHU's picture

hi

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praful Nikam's picture

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