sohrab ki kahani aur NETAON KA SACH
{द्वारा:आशुतोष जायसवाल}
सोहराबुद्दीन शेख को कांग्रेस ने बनाया मसीहा राजनीती का गिरता स्तर नहीं तो और क्या.इस कथानक की शुरुआत होती है झिरन्या से जहाँ सोहराबुद्दीन का जन्म हुआ था.एक अपराधिक पृष्टभूमि वाले परिवार में पैदा होने के कारण शुरूआती दौर से ही सोहराब लड़ाई झगड़ों में लिप्त रहता था लेकिन समय के साथ ख्वाहिशों ने भी बड़ा रूप लिया और सोहराब धीरे धीरे एक लुटेरा और हत्यारा भी हो गया गाड़ियों को लूटने में माहिर इस शख्स के बारे में लोग बताते हैं की यदि ट्रक या अन्य कोई वाहन ६०-७० की गति पर भी हो तो भी सोहराब उसमे घटना कर लेता था लेकिन यदि अरमान बड़े हों और आस पास के साथ घर का माहोल वैसा हो तो कोई भी गुनाह के उस रास्ते पर तेजी से आगे दौड़ लगा देता है यही सोहराब के साथ हुआ अब उसे झिरनिया छोटा लगने लगा था लेकिन इस बीच उसने अपने लिए झिरनिया को एक सुरक्षित किला बना लिया था जहाँ उसने साम्प्रदायिकता के वो बीज बो दिए थे जिसका नज़ारा उसकी मय्यत के दिन भी लोगो ने देखा.
झिरनिया से निकलकर उसने कदम बडाये इंदौर की तरफ लेकिन वहां कोई दाल न गलती देख वो उज्जैन की तरफ मुड़ गया जहाँ उसे एक साथी मिल गया तुलसी गंगाराम प्रजापति जो वहीँ एक लोकल अपराधी था और उसके अरमान भी सोहराब जैसे थे,ये मध्य प्रदेश पुलिस की सक्रियता कहें या दबाव की दोनों की जोड़ी ने उज्जैन से पलायन करना ही ठीक समझा पर जाने से पहले दोनों दर्जनों अपराधों को अंजाम दे चुके थे जिनमे अपहरण लूट और वसूली जैसे जघन्य अपराध शामिल थे किसी पर गोली चला देना अब इनके लिए सामान्य सी बात थी और लोकल स्तर पर दो कोंग्रेसी नेताओं का साथ हासिल हो गया था जिसमे से एक आज कल प्रदेश स्तर पर सक्रिय हैं खैर दबाव बढता देख सोहराब ने राजस्थान का रुख किया तुलसी पीछे रह गया एक पुराने वारंट के कारण पर जोड़ी बन चुकी थी.राजस्थान में प्रवेश करते ही सोहराब की नज़र वहां की सम्पन्नता पर पड़ी और उसको ताकत और पैसा नज़दीक महसूस होने लगा पर परेशानी थी तो वहां स्थानीय गुंडों और बड़े स्तर पर मोजूद माफिया सरगनाओं से थोड़ी बहुत वसूली के बाद सोहराब को समझ आ गया था की हिन्दुस्तान में अपराध की कमान मुंबई से ही ओपरेट होती है अब क्या था अपराधिक पृष्टभूमि वाला सोहराब मुंबई की तरफ मुड़ गया तब तक उसका साथी तुलसी भी जेल से बाहर आ चूका था,मुंबई महानगरी के रंग और माफिया सरगनाओं के ठाट देख सोहराब की इच्छाएं को भी पंख मिल गए.
एक वरिष्ट पुलिस अधिकारी ने कहा था की दर्ज अपराधों और न दर्ज अपराधों का अनुपात १:४ होता है.सोहराब यह तो समझ चुका था की मौत से बुरा उसका डर होता लेकिन मुंबई की आबो हवा सबको रास आना वह भी जब सरगना देश से बाहर हो कर सत्ता चला रहा हो तो हुकुम बजाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता और ख्वाहिश आसमान छूने की तब वापसी का रुख ठीक है.अंडरवर्ल्ड की पुरानी कहावत है समय से पहले किया वार और उसके बाद किया वार दोनों बेकार यह सोहराब अपने पैत्रिक घर से जानता था,समय आया जब ISI ने देश में आतंकवाद फैलाने की दृष्टि से AK 47 का एक जखीरा मध्य प्रदेश भिजवाया माध्यम था सोहराब,हालाँकि रास्ता दाउद के सहारे था पर प्रभारी सोहराब था,दाउद को धोका देते हुए उसने सारी रायफल अपने परिवार के लोगों की मदद से अपने कुँए में छुपा ली जो बाद में बरामद हुईं उसके पहले पुलिस को सोहराब के परिवार महिलाओं से जूझना पड़ा था.दाउद की अपनी परेशानी बड़ने के कारण उसका ध्यान इस खेप से हट गया,सोहराब ने समझा की वह DON से आगे निकल गया है फिर क्या था उसने मार्बल और ग्रेनाईट के सौदागरों से वसूली शुरू करनी चाही साथ थे तुलसी और कोसर बी लेकिन २६ नवम्बर २००५ को उसका इनकाउन्टर हो गया बाद में तुलसी भी ढेर हो गया.
इनकाउन्टर की जांच शुरू हुई कांग्रेस सोहराब के साथ खड़ी हुई और कई अधिकारी वंजारा,पांडियन,और राजस्थान के अधिकारी भी जेल गए पूर्व मंत्री शाह भी लेकिन प्रश्न सिर्फ एक क्या कोंग्रेस को जांच करवानी थी तो बाकी इनकाउन्टर की क्यों नहीं और तुलसी की क्यों नहीं दिल्ली में हुए किसी भी इनकाउन्टर की क्यों नहीं.एक देशद्रोही की मौत की जांच जबकि देश में लोग भूक से मर रहे हों बच्चे कुपोषण से.कोंग्रेस का चरित्र कैसा हो गया है की एक हत्यारे देशद्रोही अपहरणकर्ता पर सब कुछ लगा रही है.
तमाम नेता किसी भी स्तर के हों जान ले की तुम किसी भी दल में हो तुम्हारी औकात नहीं है गुंडों से जीत जाओ और बिना पुलिस या सुरक्षा तुम पिल्ले से भी कमजोर हो इसलिए अपनी जात और औकात को पहचानते हुए पुलिस पर सिर्फ इतना दबाव बनाओ की वह काम कर सके,यदि एक बार पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए तो यह देशद्रोही तत्व तुम्हे घर में घुसकर मारेंगे तुम कुछ नहीं कर सकते.एक बार बगैर सुरक्षा घेरे के चल कर देखो.
याद रखो सोहराब की मैय्यत में पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे थे जाओ झिरनिया में देख और मालुम कर आओ.
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