राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Monday, 1 December, 2008

भारत को क्या करना चाहिए?

मुम्बई में हुए हमले को महज इस्लामी आतंकवाद कहकर अन्य आतंकी घटनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता।

पाकिस्तान का अनेक हिस्सों में विभाजन, इस्लामी घनत्‍व वाले क्षेत्र की कठोर निगरानी, बांगलादेशी घुसपैठियों का निष्कासन, सेना एवं खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण तथा कठोर आतंकरोधी कानून सबकी एक साथ जरूरत है। भारत सरकार को सभी दिशाओं में एक साथ आगे बढ़ना होगा। किन्तु इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए जो काँग्रेस की कठपुतली सरकार में नहीं है। रीढ़विहीन परजीवी कृमियों से राष्ट्र नहीं चलता, इसलिए जरूरी है कि सबसे पहले सत्ता-परिवर्तन किया जाए।
अब तक हुए अन्य आतंकी हमलों से यह न केवल अधिक भयावह और बड़ा है बल्कि बिना किसी राष्ट्र की प्रत्यक्ष भागीदारी के ऐसी घटना को अंजाम देना असंभव है। हालांकि भारत में हुई प्रत्येक आतंकवादी घटना के तार पाकिस्तान से जुड़ते हैं, किन्तु इस हमले में पाकिस्तान का प्रत्यक्ष सहयोग उजागर हुआ है। पाकिस्तानी सरकार और आतंकवादी संगठनों के सम्मिलित प्रयास से ही इस तरह की बड़ी आतंकवादी घटना हो सकती है। अब तक पकड़े या मारे गये सारे आतंकवादी पाकिस्तान के हैं और ये कराची से अल्फाज नामक पाकिस्तानी बोट से समुद्र के रास्ते रवाना हुए थे। 14 नवम्बर को ही पोरबन्दर के विनोद भाई बाबूभाई मसाणी का बोट 'कुबेर' लापता हो गया था जिसकी जानकारी कोस्टगार्ड और कस्टम को दी गयी थी। आतंकवादी अल्फाज छोड़कर इसी बोट से कोलाबा समुद्र तट से लगभग 70 नॉटिकल मील की दूरी तक आये थे जहाँ से वे राफ्ट में सवार होकर मुम्बई पहुँचे। इन्होंने हथियार और गोला बारूद कराची से ही ले लिया था। बिना पाकिस्तानी नौ सेना की सहायता से क्या इस तरह की कार्रवाई संभव हो सकती थी? कई बार पाकिस्तानी नौ सेना ने भारतीय मछुआरों की बोट पर कब्जा किया है। लेकिन, इस बार उस बोट का इस्तेमाल उनहोंने आतंकवादियों के लिए किया 'कुबेर' बोट पाकिस्तानी नौ सेना ने आतंकवादियों को मुहैया कराया। संभव है कि हथियार और गोला बारूद भी उन्होंने ही उपलब्ध कराये हों। इसलिए इस आतंकी हमले को युद्ध के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन अब प्रश्न उठता है कि ये विदेशी आतंकवादी मुम्बई के ताज, ओबराय और नरीमन हाउस जैसी अतिसुरक्षित इमारतों में अचानक कैसे घुस गये? क्या बिना स्थानीय सहयोग के इस तरह की वारदात संभव हो सकती है? इसलिए इसमें भारतीय इस्लामी आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन या उसके आनुषंगिक संगठनों का हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता। वस्तुत: इस तरह की घटना एक गहरी और लम्बी प्लानिंग का परिणाम है जिसमें पाकिस्तानी सरकार एवं सेना भारतीय और पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन सबकी सम्मिलित भूमिका है। यह भारत की आर्थिक राजधनी पर हमला कर उसके अर्थक्षेत्र को नुकसान पहुँचाने की रणनीति का हिस्सा है, जो बिना किसी बाहरी शक्ति के संभव नहीं हो सकता।

चूँकि पकिस्तान का अस्तित्व ही भारत विरोध् से परिभाषित होता है इसलिए उसकी आंतरिक एकता बनाये रखने के लिए जरूरी है कि वह भारत के खिलापफ सदैव आक्रमणकारी की मुद्रा में हो। गौरतलब है कि पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान, सिंध, पंजाब आदि सारे प्रांत अपनी अस्मिता अलग-अलग परिभाषित कर स्वतंत्रा देश की माँग करते रहे हैं। अपने आंतरिक विघटन से बचने के लिए पाकिस्तान के पास केवल एक ही उपाय है कि वह भारत को अपना शत्रु प्रोजेक्ट करे। पाकिस्तान के बार-बार के भारत पर हमले के पीछे यही कारण है। लेकिन बार बार की हार और बांगलादेश के स्वतंत्र अस्त्वि में आने के बाद वह प्रत्यक्ष युद्ध में सम्मिलित नहीं हो सकता। आज भारत की सामरिक क्षमता पाकिस्तान के मुकाबले कम-से-कम तीन गुनी है और आर्थिक महाशक्ति के रूप में भी दुनिया भारत को पहचानने लगी है। इसके विपरीत पाकिस्तान दिवालियेपन के कगार पर है और उसका चिर मित्र चीन भी उससे किनारा करने लगा है। ऐसी स्थिति में वह प्रत्यक्ष युद्ध नहीं कर सकता। पाकिस्तान के साथ एक और विडम्बना है वह यह कि उसके राजनयिक, उसकी सेना और उसकी खुपिफया एजेंसियों में कोई तालमेल नहीं है: फिर आतंकवादी संगठन भी वहाँ अपनी समानान्तर सत्ता रखते हैं। एकमात्र भारत-विरोध ही वह केन्द्र है जिस पर सब सहमत होते हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान सदैव आक्रमणकारी मुद्रा में रहकर ही अपना अस्तित्व कायम रख सकता है। यह अकारण नहीं है कि जब-जब संबंधों के सुधर की बात राजनयिक स्तार पर होती है पाकिस्तानी सेना उसकी उल्टी प्रतिध्‍वनि प्रस्तुत करती है। कारगिल एक ऐसी ही प्रतिधवनि थी वाजपेयी जी के लाहौर की बस यात्रा के बाद। अभी जरदारी के भारत को प्रिय लगने वाले बयान कि 'पाकिस्तान भारत पर पहले परमाणु आक्रमण नहीं करेगा' की प्रतिक्रिया सामने है। इसलिए भारत और पाकिस्तान के सम्बंध् ठीक नहीं हो सकते या यों कहें कि पाकिस्तान ठीक नहीं होने दे सकता तो ज्यादा सही होगा। ऐसे में अहम सवाल है कि भारत को क्या करना चाहिए।

आज विशेषज्ञों की यह स्पष्ट मान्यता है कि पाकिस्तान पंद्रह से बीस सालों में विखण्डित हो जाएगा। अमेरिका ने इस क्षेत्रा में प्रयास भी शुरू कर दिया है। आतंकवाद के खात्मे के बहाने उसने अपफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमांत क्षेत्रों में सैनिक जमीन भी तैयार कर ली है। वह ब्लूचिस्तान की संसाधनयुक्त भूमि पर कब्जा चाहता है। भारत को भी यथाशीघ्र इस ओर कदम बढ़ाने चाहिए, क्योंकि बलूची जनता का भारत को समर्थन हासिल है। बिना पाकिस्तान के अनेक भागों में विखण्डन के भारत में आतंकवाद का स्थायी निदान संभव नहीं है। चूँकि पाकिस्तान भी यह जानता है कि उसका विखण्डन अवश्यंभावी है इसलिए वह अंतिम अस्त्रा के रूप में तीव्र भारत विरोध का ही इस्तेमाल करेगा। ऐसे में आतंकवादी घटनाएँ बड़े पैमाने पर भारत में हों, इसका पूरा प्रयास पाकिस्तान करेगा।

लेकिन पाकिस्तान को विखंडित करने से भारत का आंतरिक आतंकवाद कैसे खत्म हो जाएगा, यह सवाल महत्वपूर्ण है। चूँकि, भारत के कम्युनिस्टों और कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों की प्रतिबद्धता भारत के साथ नहीं है। लेकिन इनका कोई न कोई केन्द्र होता है जो इनमें आत्मविश्वास और जेहादीपन पैदा करता है। रूस के विखण्डन के बाद कम्युनिस्टों का केन्द्र केवल चीन रह गया है। क्यूबा आदि कमजोर देशों के प्रति प्रतिबद्धता से कोई खास असर नहीं पड़ता। चीन भी अब पूँजीवाद के दौर में दाखिल हो गया है इसलिए कम्युनिस्ट आन्दोलन कमजोर हो गया है। संभव है यह जेहादीपन शीघ्र खत्म हो जाए- बस नक्सली आतंकवाद के खात्मे के लिए प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। के.पी.एस. गिल ने तो दावा किया है कि चार से छ: सप्ताह में इसे कुचल दिया जा सकता है। जैसे ही पाकिस्तान विखंडित होगा कट्टरपंथी मुसलमानों की प्रतिबद्धता के केन्द्र समाप्त हो जाएँगे। इस्लामी देशों में पाकिस्तान ही सामरिक रूप से सर्वाध्कि समर्थ है इसलिए कट्टरपंथियों का केन्द्र पाकिस्तान होता है, प्रतिब(ता पाकिस्तान के प्रति होती है। इसके बाद उनकी प्रतिबद्धता इस्लाम के प्रति तो होगी लेकिन किसी खास देश को वे अपना मसीहा नहीं मानेंगे। यहाँ तक कि बांगलादेश का मसीहा भी पाकिस्तान ही है जिससे वह अलग हुआ। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में बांगलादेशी मुसलमानों के बीच बांगलादेश के बजाय पाकिस्तान का झंडा ही प्रचलित है जो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

पाकिस्तान के विखंडित होने के बाद हालांकि स्थितियाँ बहुत कुछ सुधर जाएँगी, लेकिन जब तक वह विखंडित नहीं होता तब तक कुछ अलग रणनीतियाँ बनानी होंगी। आज भारत में सरायमीर जामियानगर जैसे बहुत सारे क्षेत्र मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले हैं। इन इलाकों को खुफिया-तंत्र की कठोर निगरानी में रखना होगा। जीरो जोन या छोटा पाकिस्तान कहे जानेवाले इलाकों में पुलिस की आवाजाही बढ़ानी होगी। लगभग पाँच करोड़ बांगलादेशी घुसपैठिये भारत में हैं और इनके तार हूजी और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों से जुड़े हैं। बांगलादेश की सीमा पर भारतीय क्षेत्र में 905 मस्जिद और 439 मदरसे हैं तथा बांगलादेश के क्षेत्र में 960 मस्जिद और 469 मदरसे हैं। चिकननेक पट्टी पर 1800 मदरसे हैं। बांगलादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालकर पूर्वोत्तर सीमा को सुरक्षित किया जाना चाहिये। इस समय पहली बार आतंकवादी समुद्री रास्ते से आये हैं इसलिए इस क्षेत्रा पर भी निगरानी रखनी होगी। नरेन्द्र मोदी की बातों पर अमल करते हुए इनमें भी सैनिक चौकियाँ स्थापित करनी होंगी।

इस विडम्बनापूर्ण स्थिति में जबकि भारत आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, आतंकवादी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं, राजनयिकों को वोट बैंक की क्षुद्र राजनीति से उपर उठकर प्रबल इच्छाशक्ति से काम लेना होगा। राजनयिकों को देशहित में कुछ कड़े निर्णय लेने होंगे। पोटा जैसे कठोर कानून को लाना होगा, खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा। राजनीति के प्रति विश्वास पैदा करना होगा। अगर राजनीति के प्रति यह अविश्वास बरकरार रहा तो संभव है सेना और जनता स्वयं कानून हाथ में ले ले। यह देश के लोकतंत्र के लिए घातक होगा। काँग्रेस की निकम्मी सरकार ने जिस तरह सेना के जवानों पर वोट बैंक के लिए लांछन लगाया है वह राष्ट्रहित के लिए घातक है। अफजल जैसे आतंकवादी को फाँसी नहीं दिया जाना राजनीति के प्रति अविश्वास पैदा करता है। भारतीय राजनीति को यह विश्वास हासिल करना है।

अत: पाकिस्तान का अनेक हिस्सों में विभाजन, इस्लामी घनत्‍व वाले क्षेत्र की कठोर निगरानी, बांगलादेशी घुसपैठियों का निष्कासन, सेना एवं खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण तथा कठोर आतंकरोधी कानून सबकी एक साथ जरूरत है। भारत सरकार को सभी दिशाओं में एक साथ आगे बढ़ना होगा। किन्तु इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए जो काँग्रेस की कठपुतली सरकार में नहीं है। रीढ़विहीन परजीवी कृमियों से राष्ट्र नहीं चलता, इसलिए जरूरी है कि सबसे पहले सत्ता-परिवर्तन किया जाए।

वन्दे मातरम्! भारत माता की जय!

ह/- अंजनी कुमार श्रीवास्तव, सचिव, अभाविप जे.एन.यू.
ह/- विवेक विशाल, संयुक्त सचिव अभाविप जे.एन.यू.

28.11.2008 को जेएनयू में विद्यार्थी परिषद् द्वारा जारी पर्चा

Friday, 28 November, 2008

पाटिल से डरते हैं आतंकवादी!


फोटो समाचार- द ट्रिब्‍युन से साभार
भारत के नालायक गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने देशवासियों का जीना हराम कर दिया हैं। उनके हाथ निर्दोष लोगों के खून से लाल हो गए हैं। स्वाभिमानी भारत में उन्होंने भय और दहशत का माहौल कायम कर दिया है।

अपने उलुल-जुलूल और रटी-रटायी बयानों के चलते मजाक का पात्र बन चुके शिवराज पाटिल इस बार फिर लोगों के आक्रोश के शिकार बन गए हैं। पाटिल मुंबई में हुए आतंकी हमलों का जायजा लेने कल सुबह मुंबई पहुंचे। लौटने के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा, कामा अस्पताल और रेलवे स्टेशन पर हमला करने वाले आतंकवादी मेरे वहां पहुंचने से पहले ही भाग चुके थे।

Thursday, 27 November, 2008

विडियो- ओ पालन हारे, निर्गुण और न्यारे



ओ पालन हारे, निर्गुण और न्यारे
तुम्‍हरे बिन हमरा कौनो नहीं....

हमरी उलझन सुलझाओ भगवन
तुम्‍हरे बिन हमरा कौनो नहीं....

तुम्ही हमका हो संभाले
तुम्ही हमरी रखवाले
तुम्‍हरे बिन हमरा कौनो नहीं...

चन्दा में तुम ही तो भरे हो चांदनी
सूरज में उजाला तुम ही से
यह गगन हैं मगन, तुम ही तो दिए इसे तारे
भगवन, यह जीवन तुम ही न सवारोगे
तो क्या कोई सवारे

ओ पालनहारे ......

जो सुनो तो कहे प्रभुजी हमरी है विनती
दुखी जन को धीरज दो
हारे नही वो कभी दुखसे
तुम निर्बल को रक्षा दो
रह पाए निर्बल सुख से
भक्ति दो शक्ति दो

जग के जो स्वामी हो, इतनी तो अरज सुनो
हैं पथ में अंधियारे
देदो वरदान में उजियारे

ओ पालन हरे ......

Wednesday, 26 November, 2008

मार्क्सवाद तथा मुस्लिम

लेखक- डा. सतीश चन्द्र मित्तल

मार्क्सवाद तथा इस्लाम कभी एक-दूसरे के सहचर नहीं हो सकते।
सोवियत रूस की भांति मार्क्सवादी चीन ने भी नरसंहार में कोई कमी न रखी। एक करोड़ से भी अधिक मुसलमानों पर कहर ढहाना प्रारम्भ किया। चीन में यह ज्वलंत प्रश्न सदैव बना रहा है कि आखिर चीन में मुसलमान कहां गायब हो गए? एक प्रसिध्द लेखक असा बाफीगीह ने जकार्ता से प्रकाशित 'ग्रीन फ्लैग' (अप्रैल, 1956) में लिखा, 'चीन में रहने वाले लाखों मुसलमानों का क्या हुआ? क्या ये फारमोसा भाग गए या अब कम्युनिस्ट बन गए? वह केवल दो संभावनाएं मानता है-या तो उन्हें मार दिया गया या वे भूमिगत हो गए। रफीक खां ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक 'इस्लाम इन चायना' में इसका विस्तृत वर्णन किया है। मुसलमानों के साथ अमानुषिक अत्याचार किए गए। सम्पूर्ण उत्तर पश्चिम प्रांतों में सैनिकों को भेजकर उनका नरसंहार हुआ। उन्हें श्रमिक शिविरों में भेजा गया। उनके वक्फ बोर्ड खत्म कर दिए। अरबी लिपि बन्द कर दी गई। मुस्लिम लड़कियों की शादी हान-चीनियों से, जिनसे मुसलमान पहले ही घृणा करते थे, की गई। कई हजार मुस्लिम कश्मीर भाग गए। चीन में 16,600 मस्जिदों में से अधिकतर नष्ट कर दी गईं।
साम्यवादी देश मार्क्स को मानते हैं, न कि मस्जिदों या मीनारों को। इस्लाम सोवियत संघ तथा चीन में लम्बे समय तक झगड़े की जड़ रहा है।

कुरान, हदीस, शरीयत आदि जिहाद की भावना को ही पुष्ट करते हैं। वे सामान्य मुस्लिम भाईचारे में विश्वास करते हैं, न कि मानवीय भ्रातृत्व में।

इसके विपरीत मार्क्स तथा एंजिल ने अपने विविध ग्रंथों तथा लेखों में धर्म को 'एक भद्दा प्रत्यक्षीकरण' 'अफीम की पुड़िया' तथा 'मायावी सुख' बताया है। वे धार्मिक चमत्कारों से युक्त सामग्री तथा धार्मिक पूजा के आवश्यक तत्वों को नष्ट करना अनिवार्य मानते हैं। वे ईसाइयत के कार्य को धोखाधड़ी से जोड़ते हैं। लेनिन ने धर्म को 'आध्यात्मिक शोषण' का हथियार माना है। उसने उद्धोष किया-धर्म का अन्त करो, नास्तिकता अमर रहे।

धर्म के सन्दर्भ में कार्ल मार्क्स तथा लेनिन के विचारों को साम्यवादी रूस तथा चीन ने व्यावहारिक स्वरूप देने का प्रयत्न किया।

स्टालिन के नेतृत्व में पड़ोसी मुस्लिम राज्यों को हड़प लिया गया तथा सोवियत साम्राज्यवाद का अंग बना लिया। उन्हें 'जनता का दुश्मन', उनके कार्यों को 'सोवियत विरोधी' कहा गया। उद्धोष किया 'मीनारें या मस्जिदें नहीं मार्क्स चाहिए।' पोकरोवस्काई ने इस्लाम को 'अरब सौदागरों' द्वारा पूंजीवाद की कृति बताया। रोशीकोव ने इसे सामान्तवाद की सफलता बताया। कीलाविच ने इसे एक विज्ञान विरोधी प्रतिक्रियावादी विश्व का विचार बताया। इन विचारकों ने मक्का की यात्रा की और अरब सौदागरों तथा सामन्तों की आय का साधन बताया।

इसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम समुदाय पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया। हजारों मस्जिदें ढहा दी गईं। एक प्रसिध्द मुस्लिम मुफ्ती जियाउद्दीन-इब्न-इसान के अनुसार मध्य एशिया क्षेत्र में जहां पहले 25,000 मस्जिदें थीं, केवल एक हजार रह गईं। अनेक मुस्लिम मजहबी स्थलों में ताले डाल दिए गए। उन्हें शीघ्र ही स्नानघरों, जेलखानों, होटलों तथा नास्तिकों के संग्रहालयों में परिवर्तित कर दिया गया। अनेक मजहबी त्योहार बन्द कर दिए गए। इदुलजुहा, रमजान, मुहर्रम तथा खतने की प्रथा बन्द कर दी गई। मुसलमानों को उनके कानूनों, मदरसों तथा शरियत की अदालतों से वंचित कर दिया गया। उन्हें परम्परागत लोकगीत के स्थान पर रूसी तराने गाने को मजबूर किया। परम्परागत चायघर (चयानास) बन्द कर रूसी शराब 'बोदका' पीने तथा बेचने को मजबूर किया। सचाई यह है कि लाखों मुसलमानों ने रातोंरात परिवर्तित हो 'प्रगतिशील कम्युनिस्ट' कहकर जान बचाई।

सोवियत रूस की भांति मार्क्सवादी चीन ने भी नरसंहार में कोई कमी न रखी। एक करोड़ से भी अधिक मुसलमानों पर कहर ढहाना प्रारम्भ किया। चीन में यह ज्वलंत प्रश्न सदैव बना रहा है कि आखिर चीन में मुसलमान कहां गायब हो गए? एक प्रसिध्द लेखक असा बाफीगीह ने जकार्ता से प्रकाशित 'ग्रीन फ्लैग' (अप्रैल, 1956) में लिखा, 'चीन में रहने वाले लाखों मुसलमानों का क्या हुआ? क्या ये फारमोसा भाग गए या अब कम्युनिस्ट बन गए? वह केवल दो संभावनाएं मानता है-या तो उन्हें मार दिया गया या वे भूमिगत हो गए। रफीक खां ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक 'इस्लाम इन चायना' में इसका विस्तृत वर्णन किया है। मुसलमानों के साथ अमानुषिक अत्याचार किए गए। सम्पूर्ण उत्तर पश्चिम प्रांतों में सैनिकों को भेजकर उनका नरसंहार हुआ। उन्हें श्रमिक शिविरों में भेजा गया। उनके वक्फ बोर्ड खत्म कर दिए। अरबी लिपि बन्द कर दी गई। मुस्लिम लड़कियों की शादी हान-चीनियों से, जिनसे मुसलमान पहले ही घृणा करते थे, की गई। कई हजार मुस्लिम कश्मीर भाग गए। चीन में 16,600 मस्जिदों में से अधिकतर नष्ट कर दी गईं। मार्क्स के लिए भारत में ब्रिटिश शासन होने के कारण रूस तथा चीन की भांति कोई आधार न था। मार्क्सवाद भारत में एक विदेशी जंगली पौधे के रूप में रोपा गया। यहां इसका आधार कुछ मुजाहिद तथा खलीफा आन्दोलन से प्रभावित कुछ मुसलमान बने। ताशकन्द से भारतीय साम्यवादी पार्टी का जन्म हुआ। मुहम्मद शफीक इसके पहले सचिव बने।

भारत में साम्यवादी नेतृत्व प्रारम्भ से ही हिन्दू चिंतन के विरोध से अलग न रह सका। उनकी धार्मिक नीति नास्तिकता की ओर बढ़ने की बजाय सामान्यत: मुस्लिम तुष्टीकरण तथा हिन्दू-मुस्लिम विरोध पैदा करने की रही। इसीलिए वे व्यावहारिक राजनीति में कभी कांग्रेस का विरोध, कभी कांग्रेस में योजनापूर्वक घुसपैठ की कोशिशें करते रहे। अनेक बार उनका मुस्लिम तुष्टीकरण कांग्रेस की सीमाएं भी पार कर गया। सामान्यत: राष्ट्रीय आन्दोलनों में उनकी भूमिका नकरात्मक रही।

यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान के निर्माण में भारतीय मार्क्सवादियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग की घोषणा के बाद सितम्बर, 1942 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित किया कि भारत विविधताओं से भरा एक देश है। यहां प्रत्येक को आत्मनिर्णय का अधिकार है। उन्होंने भारत को एक राष्ट्र नहीं माना बल्कि पाकिस्तान का खुला समर्थन किया। कश्मीर के बारे में उनकी नीति मुस्लिम समर्थक रही। भारत पर पाकिस्तानी या चीनी आक्रमण के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जग जाहिर है।

भारतीय मार्क्सवादियों का मुस्लिम प्रेम बड़ी बेशर्मी से स्पष्ट दिखाई देता है। केरल में मुस्लिम लीग से समझौता, मल्लापुरम जिले का निर्माण उसके उदाहरण हैं। नम्बूदिरीपाद का कथन है कि अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता से कम खतरनाक है। इसीलिए बंगाल की पाठय पुस्तकों में रटाया जा रहा है कि हिन्दू सबसे घटिया है। मुसलमान प्रगतिशील तथा रूस की 1917 की क्रांति सर्वश्रेष्ठ है। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है जहां मार्क्सवादी चिंतन रूस तथा चीन में मुसलमानों का कटु विरोधी रहा, वहां भारत में यह कभी भी हिन्दू हितैषी नहीं रहा। हिन्दू-मुस्लिम विभेद कर इसने भारत में अलगाव को बढ़ावा दिया।

Monday, 24 November, 2008

वामपंथी इतिहास चिन्तन के ये 'मार्गदर्शक'

लेखक- डा. सतीश चन्द्र मित्तल

वामपंथी लेखक तथा इतिहासकार सदैव इतिहास को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग में लाते रहे हैं। वे तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर अथवा गायब कर, अपने भविष्य की सोच के अनुकूल इतिहास गढ़ते तथा तराशते रहे हैं।
भारत में साम्यवाद एकमात्र राजनीतिक दल है जो एक आयातित विचारधारा पर आधारित है। इसका जन्म 1920 में ताशकन्द में सोवियत अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट दल के रूप में हुआ। अत: इसका नाम भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी न होकर 'कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया' है। अपनी सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए पार्टी ने समय-समय पर विभिन्न हथकण्डे अपनाये। कभी महात्मा गांधी का कटु विरोध किया तो कभी कांग्रेस से गठजोड़ किया। द्वितीय महायुध्द में उसकी भूमिका नकारात्मक रही। उन्होंने 1942के आन्दोलन में अंग्रेजों का साथ दिया। पाकिस्तान के लिए जिन्ना की वकालत की तथा भारत को 16-17 स्वायत्त इकाइयों में बांटने का प्रस्ताव भी रखा। आजादी के पश्चात् भी भारतीय कम्युनिस्टों ने 1962 ई. में चीन के भारत पर आक्रमण पर पहले तो अपने मुंह पर ताला लगाए रखा, पर चीन के आगे बढ़ने पर कलकत्ता में उसे लाल सलाम देने को आतुर दिखे।
मार्क्‍सवादियों ने पूर्व सोवियत संघ (रूस) तथा चीन में इतिहास का सरकारीकरण किया। पूर्व सोवियत संघ में लेनिन, स्टालिन तथा ब्रेझनेव ने इतिहास को मनमाने ढंग से लिखवाया तथा प्रमाणरहित परिस्थितयों का विश्लेषण किया। चीन भी इस दिशा में पीछे नहीं रहा।

स्टालिन-इतिहास पर निरंकुश अधिकार
सोवियत संघ में स्टालिन (1924-1953 ई.) अपने क्रूर तथा बर्बर कारनामों के लिए विश्व में जाना जाता है। वह विश्व में 20वीं शताब्दी के क्रूर हत्यारों में से एक माना गया है। इतिहास को मनमाने ढंग से बदलने तथा अपने नियन्त्रण में रखने में वह दक्ष था। उसे सोवियत संघ में इतिहास का जनक कहा जाता था। इसके निर्देशन में इतिहास की एक किताब छपी, जिसका नाम था सोवियत संघ की 'कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास-एक संक्षिप्त पाठयक्रम'। इसमें प्रतिवर्ष स्टालिन की आज्ञा से परिवर्तन तथा संशोधन होता था। 1928 ई. में एक कांफ्रेंस में स्टालिन को इतिहास पर पूर्ण निरंकुशता के अधिकार दे दिए गए थे। 1934 ई. में कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति ने एक आदेश द्वारा इतिहास को पार्टी की विचारधारा के अनुकूल बनाने तथा सभीपाठयपुस्तकों, स्कूलों, विश्वविद्यालयों तथा संस्थाओं को, इसके अनुसार कार्य करने का फरमान दिया। (देखें, डेविड रैमनिक, लेनिन' स टूम्ब, दा लास्ट डैज आफ दा सोवियत एम्पायर, न्यूयार्क, 1993, पृ. 17)

स्टालिन ने स्वयं 5 करोड़ पुस्तकों की प्रतियों के लेखन तथा प्रकाशन को जिम्मेदारी ली। इतिहासकार जेनरिख जोफी ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे प्रत्येक स्कूल के लड़के एवं लड़कियों के दिमाग को झूठी घटनाओं से भरने का षडयंत्र कहा। डेविड रैमानिक, जो स्वयं रूस के विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे थे, ने इस संक्षिप्त पाठयक्रम के बारे में लिखा, 'यह एक पूर्व निश्चित इतिहास की पाठय पुस्तक थी। जिसमें सभी प्रमुख घटनाओं, आवश्यक रूप से वर्तमान शासन के सच तथा शक्ति को, कठोरता से एक शानदार परिणाम बताती थी। (देखें, अध्याय-द रिटर्न आफ हिस्ट्री, पृ. 16-51)। ऐसी पाठय पुस्तक में इतिहास आन्तरिक संघर्षों, अनिश्चित व प्रतिइच्छा, निरर्थकता तथा दुखान्त से मुक्त रहा था, किसी प्रकार के प्रश्न या लेखन को अस्वीकार करना अपराध माना जाता था। अत: लिखित पाठयक्रम को नकारना, अपनी मौत को बुलाना था।

ल्योनिद ब्रेझनेव: स्टालिन के अनुगामी
इतिहास चिन्तन की यह दिशा, स्टालिन के पश्चात् भी सोवियत अधिकनायकों का मार्गदर्शन करती रही। उदाहरण के लिए, ल्योनिद ब्रेझनेव (अक्तूबर 1964-नवम्बर 1982 ई.) ने विश्व तथा सोवियत इतिहास के विश्लेषण में स्टालिन का मार्ग अपनाया। उन्होंने सरगेई ट्रेपोजेवीकोव को विज्ञान तथा शिक्षा व्यवस्थाओं की केन्द्रीय समिति का अध्यक्ष बनाया, जिन्होंने किसी अन्य चिंतन या विरोधी मत को लिखने की स्वतंत्रता नहीं दी। सभी संस्थानों पर कठोरता से नियंत्रण किया। लेनिन द्वारा प्रथम संविधान सभा की समाप्ति से लेकर 1968 ई. तक चेकोस्लोवाकिया पर रूसी आक्रमण की सभी घटनाएं इतिहास से गायब कर दी गईं अथवा इन्हें विरोधी मत से अज्ञात रखा। यहां तक कि 1979 ई. को रूस के अफगानिस्तान पर आक्रमण को अन्तरराष्ट्रीय कर्तव्य या समाजवादी भाइयों का निमंत्रण बताया।

चीन में माओ त्सेतुंग तथा उनके उत्तराधिकारियों की इतिहास दृष्टि
सोवियत संघ की भांति चीन के माओ त्सेतुंग (1949-1976 ई.) ने भी चीनी इतिहास, संस्कृति तथा जीवन प्रणाली की मनमानी व्याख्या की। लगभग 28 वर्षों तक वह चीन के निरंकुश अधिनायक रहे। उन्होंने स्वयं अपने पहले तीन वर्षों के शासन काल के बारे में लिखा, 'पिछले तीन वर्षों में हमने 20 लाख से अधिक डाकुओं को खत्म कर दिया और क्रांतिकारियों और गुप्तचरों को बन्दीगृह के कठोर नियंत्रण में रख दिया।' (राहुल सांस्कृत्यायन, माओत्सेतुंग, इलाहाबाद, 1983, पृ. 266)। नौकरशाही का इतना दमन किया कि सभी कहने लगे कि माओ कभी गलती नहीं करते। माओ के बाद, पुन: पार्टी के उद्भव से लेकर 1976 ई. तक के इतिहास पर विचार किया गया और नवीन इतिहास रचा गया। माओ के विचारों को दफना दिया गया।

यहां एक उदाहरण देना उपयुक्त होगा। रौस टेररिल नामक एक आस्ट्रेलियाई पत्रकार ने चीन के इतिहास तथा जीवन को समझने का प्रयास किया। उन्होंने 1970 के दशक में चीन की 25 से अधिक यात्राएं कीं, माओ की पत्नी पर एक पुस्तक 'द व्हाइट बैनेड डैमन' लिखी। 1989 ई. में इसे उन्होंने चीन से छपवाया जिसमें पुस्तक का 20 प्रतिशत मुख्य भाग गायब था। अत: चीन में भ्रष्टाचार न केवल आर्थिक क्षेत्र में, बल्कि लेखन तथा प्रकाशन के क्षेत्र में भी व्याप्त था। (देखें, डेविड आइकमैन, पैसीफिक रोम, 1986, पृ.237)

भारत में वामपंथ का प्रवेश
भारत में साम्यवाद एकमात्र राजनीतिक दल है जो एक आयातित विचारधारा पर आधारित है। इसका जन्म 1920 में ताशकन्द में सोवियत अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट दल के रूप में हुआ। अत: इसका नाम भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी न होकर 'कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया' है। अपनी सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए पार्टी ने समय-समय पर विभिन्न हथकण्डे अपनाये। कभी महात्मा गांधी का कटु विरोध किया तो कभी कांग्रेस से गठजोड़ किया। द्वितीय महायुध्द में उसकी भूमिका नकारात्मक रही। उन्होंने 1942के आन्दोलन में अंग्रेजों का साथ दिया। पाकिस्तान के लिए जिन्ना की वकालत की तथा भारत को 16-17 स्वायत्त इकाइयों में बांटने का प्रस्ताव भी रखा। आजादी के पश्चात् भी भारतीय कम्युनिस्टों ने 1962 ई. में चीन के भारत पर आक्रमण पर पहले तो अपने मुंह पर ताला लगाए रखा, पर चीन के आगे बढ़ने पर कलकत्ता में उसे लाल सलाम देने को आतुर दिखे।

Friday, 21 November, 2008

भारतीय दर्शन के विपरीत है मार्क्‍सवाद : महेश नौटियाल

रूस की क्रांति के बाद पूरी दुनिया में मार्क्‍सवाद की एक नई लहर पैदा हुई। दुनिया के लगभग सभी देश मार्क्‍सवादी विचारों से प्रभावित हुए। ब्रिटिश राज के शोषण से पीड़ित भारत में भी मार्क्‍सवाद को हाथों-हाथ लिया गया। भारत की मार्क्‍सवादी- शासन को ही भारत की सम्पूर्ण स्वतंत्रता बताकर उसे भूनाने की कोशिश की गई, किन्तु मार्क्‍सवाद का स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं है।
मार्क्‍सवाद का सामाजिक समानता से भी कोई लेना-देना नहीं है बल्कि सत्ता प्राप्ति ही इसका अंतिम ध्येय है। इसके लिए यह दर्शन रोटी, कपड़े, और मकान की आड़ में सामाजिक समानता की बात करता हुआ व्यक्ति के सामने आता है। इस रूप में आकर यह आर्थिक रूप से जूझते व्यक्ति को तत्काल ही आकर्षित करता है। जिन दिनों रूस और चीन में मार्क्‍सवाद जड़ें जमा रहा था उन दिनों भी सामाजिक समानता कहीं नहीं थी। समाज निरकुंश शासक और शोषित प्रजा के बीच बंटा हुआ था।
मार्क्‍सवाद एक निरकुंश अवधारणा है जिसमें व्यक्ति को रोटी, कपड़ा और मकान के बीच ही उलझा कर रखा जाता है। मार्क्‍सवादी दर्शन ने पृथ्वी के विशाल भू-भाग को अपने दर्शन से प्रभावित किया। मार्क्‍सवाद के सफल होने के कारणों की खोजबीन होनी चाहिए।

मार्क्‍सवाद एक भौतिक अवधारणा है। यह केवल दैहिक-आवश्यकताओं को ही परम लक्ष्य मानकर चलने वाला दर्शन है। मार्क्‍सवाद शरीर को मात्र एक पदार्थ मानता है। शरीर के भीतर आत्म-तत्व की उपस्थिति को वह नकारता है। जब शरीर एक पदार्थ भर है और आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है तो व्यक्ति केवल अपनी भौतिक आवश्यकताओं के लिए जीने वाला एक प्राणी भर रह जाता है। जीवन में रोटी, कपड़ा और मकान ही उसकी परम आवश्यकताएं रह जाती हैं। इन्हीं के लिए जीना, इन्हीं के लिए मरना।

जिस समय मार्क्‍सवाद दुनिया में जड़ें जमा रहा था उस समय दुनिया के लगभग सभी देशों में आर्थिक शोषण जारी था। साम्राज्यवादी ताकतें दूसरे देशों के आर्थिक संसाधनों को बलपूर्वक हथिया रही थीं। कमजोर देशों में गरीबी व भुखमरी का आलम था। लोग दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो गए थे। साम्राज्यवादी शोषण का शिकार आम आदमी हो रहा था। आम आदमी को तो यह पता ही नहीं था कि वह किस साम्राज्यावादी कुचक्र का शिकार हो गया है, क्यों उससे उसकी रोटी का अधिकार छीन लिया गया है। धर्म के नाम पर जिन देवी-देवताओं को वह पूजता आया था, संकट की इस घड़ी में वह उसके काम नहीं आए। धर्म पर से विश्वास टूटने लगा क्योंकि भूखा पेट, आम आदमी और धर्म एक साथ नहीं चल सकते। ऐसे में यदि कोई विचार या दर्शन लोगों को साहस दे सकता था तो वह मार्क्‍सवादी दर्शन ही था। कोई विचार या दर्शन जो उन्हें अपनी रोटी छीनकर वापस लेने की प्रेरणा दे सकता था तो वह मार्क्‍सवाद ही था। जब शरीर की जरूरतें बड़ी हो जाती हैं तब धर्म, आध्यात्मिकता मात्र शब्द भर रह जाते हैं। व्यक्ति का इन पर से विश्वास उठ जाता है। यही उस समय भी हुआ।

भारत में भी यही स्थिति थी। भारत में चारों ओर गरीबी, भुखमरी, अकाल व भयानक शोषण व्याप्त था। ऐसी स्थिति में लोगों का मार्क्‍सवादी दर्शन से प्रभावित होना बहुत हद तक जायज था। किन्तु भारत एक आध्यात्मिक देश है। भारत शब्द का तो अर्थ ही है अध्यात्म में लीन रहनेवाला। शरीर की जरूरतें कुछ समय तक के लिए तो बड़ी लग सकती हैं किन्तु हमेशा ही बड़ी रहेंगी यह भारत में संभव नहीं है। ब्रिटिश शासन का दौर गुजरा और हम स्वतंत्र हुए। किन्तु उस दौर के मार्क्‍सवादी झंडाबरदारों का वर्ग संघर्ष आज तक समाप्त नहीं हुआ। आज भी मार्क्‍सवादी अवशेष बात-बात में अपनी प्रासंगिकता जाहिर करने की कोशिश करते हैं। सामाजिक समानता की आड़ में सत्ता तक पहुँचने के प्रयास में लगे हैं।

दरअसल मार्क्‍सवाद का सामाजिक समानता से भी कोई लेना-देना नहीं है बल्कि सत्ता प्राप्ति ही इसका अंतिम ध्येय है। इसके लिए यह दर्शन रोटी, कपड़े, और मकान की आड़ में सामाजिक समानता की बात करता हुआ व्यक्ति के सामने आता है। इस रूप में आकर यह आर्थिक रूप से जूझते व्यक्ति को तत्काल ही आकर्षित करता है। जिन दिनों रूस और चीन में मार्क्‍सवाद जड़ें जमा रहा था उन दिनों भी सामाजिक समानता कहीं नहीं थी। समाज निरकुंश शासक और शोषित प्रजा के बीच बंटा हुआ था।

स्वयं जिन देशों में मार्क्‍सवाद आया मसलन रूस और चीन उन देशों में भी यह विचारधारा अब शेष नहीं बची है। सामाजिक समानता की आड़ में मार्क्‍सवाद इन देशों में व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता को निगल गया। रूस में बर्बर स्टालिन के शासनकाल में हजारों-लाखों लोग मौत के घाट उतार दिये गए। चीन में माओ-त्से तुंग के समय बेगुनाह लोग गाजर-मूली की तरह बेहिचक काट दिये गये। क्यों? दो कारणों से। पहला, क्योंकि शरीर पदार्थ भर है, आत्मा नाम का कोई तत्व उसमें नहीं होता। जब शरीर केवल पदार्थ है तो उसे मारने-काटने में कोई हिचक कैसी। स्टालिन और माओ केवल इसी कारण इतने बड़े पैमाने पर निर्दयतापूर्वक मार-काट कर सके। हजारों-लाखों की हत्या के बाद भी उन्हें किसी प्रकार की कोई ग्लानि नहीं हुई।

दूसरा, रूस और चीन में जनता के बहुत बड़े वर्ग ने स्टालिन और माओ के अनुसार जीने से मना कर दिया। व्यक्ति की स्वतंत्रता का मार्क्‍सवाद में कोई स्थान नहीं है। शासन अपने आप को समा