काश, एक हथगोला मीडिया कवरेज कर रहे “गिद्धों” पर भी आ गिरता…
Media Coverage Mumbai Terror Attack
मुम्बई में जो दर्दनाक घटनायें हुईं उसका मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक “लाइव” कवरेज भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया। जरा कुछ बानगियाँ देखिये इन गिद्धों के कवरेज की…
1) एक व्यक्ति के हाथ पर गोली लगी है, खून बह रहा है, माँस गिर रहा है, लेकिन उसकी मदद करने की बजाय एक गिद्ध पत्रकार उसके हाथ की फ़ोटो खींचने को उतावला हो रहा है और उसके पीछे भाग रहा है…
2) सुबह के सात बजे – ताज होटल के भीतर हमारे जाँबाज सिपाही आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं, दो दिन से भूखे-प्यासे और नींद को पीछे ढकेलते हुए… और ताज के बाहर कैमरे के पिछवाड़े में लेटे हुए गिद्ध आराम से कॉफ़ी-सैण्डविच का आनन्द उठा रहे हैं मानो क्रिकेट मैच का प्रसारण करने आये हों…
3) वीटी स्टेशन पर आम आदमियों को मारा जा चुका है, लेकिन गिद्ध टिके हुए हैं ओबेरॉय होटल के बाहर कि कब कोई विदेशी निकले और कब वे उसका मोबाईल नम्बर माँगें…
4) एक और पत्रकार(?) मनोरंजन भारती एक ही वाक्य की रट लगाये हुए हैं “ताज हमारे “देस” की “सान” (शान) है… और इस “सान” का सम्मान हमें बचाये रखना है…सेना का अफ़सर कह रहा है कि अब कोई आतंकवादी नहीं बचा, लेकिन ये “खोजी” बड़बड़ाये जा रहे हैं कि नहीं एक आतंकवादी अन्दर बचा है…
5) “आपको कैसा लग रहा है…” जैसा घटिया और नीच सवाल तो न जाने कितनी बार और किस-किस परिस्थिति में पूछा जा चुका है इसका कोई हिसाब ही नहीं है, आरुषि हत्याकाण्ड में भी कुछ पत्रकार ये सवाल पूछ चुके हैं…
6) अमेरिका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद किसी चैनल ने लाशों, रोते-बिलखते महिलाओं-बच्चों की तस्वीरें नहीं दिखाईं, लेकिन यहाँ तो होड़ लगी थी कि कौन कितनी लाशें दिखाता है, कितना बिखरा हुआ खून दिखाता है… इन गिद्धों पर सिर्फ़ लानत भेजना तो बहुत कम है, इनका कुछ और इलाज किया जाना आवश्यक है।
7) जीटीवी द्वारा 28 तारीख की रात को बड़े-बड़े अक्षरों में “कैप्शन” दिखाया गया “हम समझते हैं अपनी जिम्मेदारी…”, “सुरक्षा की खातिर लाइव प्रसारण रोका जा रहा है…” और यह अकल उन्हें तब आई, जब सेना ने अक्षरशः उन्हें “लात” मारकर ताज होटल से भगा दिया था, वरना यह “सुरक्षा हित” पहले दो दिन तक उन्हें नहीं दिखा था… “टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…
क्या-क्या और कितना गिनाया जाये, ये लोग गिरे हुए और संवेदनाहीन तो पहले से ही थे, देशद्रोही भी हैं यह भी देख लिया। कई बार लगता है प्रिंट मीडिया इनसे लाख दर्जे से बेहतर है, भले ही वह भी ब्लैकमेलर है, राजनैतिक आका के चरण चूमता है, विज्ञापन पाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है, लेकिन कम से कम “सबसे तेज” बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इतना नीचे तो नहीं गिरता… किसी चैनल ने सीएसटी स्टेशन पर मारे गये लोगों की सहायता के लिये हेल्पलाईन नहीं शुरु की, किसी चैनल ने रक्तदान की अपील नहीं की, किसी भी चैनल ने “इस खबर” को छोड़कर तीन दिन तक समूचे भारत की कोई खबर नहीं दिखाई मानो भारत भर में सिर्फ़ यही एक काम चल रहा हो…
मजे की बात तो ये कि कवरेज कर कौन रहा था, एक पूरे वाक्य में छः बार “ऐं ऐं ऐं ऐं” बोलने वाले पंकज पचौरी यानी इस्लामिक चैनल NDTV के महान पत्रकार। विनोद दुआ नाम के पद्म पुरस्कार से सम्मानित(?) एक पत्रकार, जिन्हें उपस्थित भीड़ द्वारा वन्देमातरम और भारत माता की जय बोलना रास नहीं आया और वे स्टूडियो में बैठे मेजर जनरल से खामखा “धर्म का कोई मजहब नहीं होता…” जैसी बकवास लगातार करते रहे… अमिताभ स्टाइल में हाथ रगड़ते हुए और अपने आप को “एस पी सिंह” समझते हुए पुण्यप्रसून वाजपेयी… यानी कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक महान लोग…
सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे, इन गिद्धों की टीआरपी गिराओ, इन्हें विज्ञापनों का सूखा झेलने दो, इन्हें सार्वजनिक रूप से देश की जनता से माफ़ी माँगने दो कि “हाँ हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है और इस प्रकार की राष्ट्रीय आपदा के समय आगे से हम सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग करेंगे… और पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखेंगे…”।
नोट - एक बात के लिये आप मुझे माफ़ करें कि बार-बार मैंने “गिद्ध” शब्द का उपयोग किया, जबकि गिद्ध तो मरे हुए जानवरों की गंदगी साफ़ करता है, लेकिन टीआरपी के भूखे गिद्ध तो……
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