Monday, October 06, 2008

Is India ready to crush Terrorism?

It has become a part of India's daily life, to get news about blasts & deaths of innocent citizens. I wonder where would it finally end? Would its result be another partition of India or would it result into another long chain of slavery for us? some of the people may not agree with my views because probably they are under the influence of false dialogues like 'we shall not bow ourselves in front of terrorism', 'we would fight and crush terrorism', 'Terrorists would never be successful in their objectives', ' India's communal harmony would be intact' ....... and all similar statements that we get to hear from our so called leaders.

I agree that such statements help in controlling the emotions of the people and also in sending a message to them that the government is aware of the situation and it is taking some steps to crush the terrorists. But, we must also honestly accept the fact that the government does not seem to be seriousely doing something, beyond just putting forth the same statements and paying some compensatory amount to the family members of the innocent citizens who are victims of the blasts. How can we hope that all these steps would stop the terrorist activities?

It is an irony that a player who shoots bullets and wins a Gold in Olympic games is given a prize of Rs.1,00,00,000/- while an officer who shoots bullets to kill terrorists and dies in that struggle is given a compensation of Rs.5,00,000/- only!! Can we say such discrimination would increase the morale of the armed forces? I am not against honouring our players, but, at this hour, when the country is under a great threat from terrorism, our first and foremost focus must be towards the officers and jawans serving in our forces. Instead, we seem to be continuousely ignoring them on all fronts. The media always keeps questioning the methods of investigations and the motives of the police and other forces. Some of the 5-star activists go to the 'Human Rights Commission' against the killing of some terrorists or Anti-Indian elements. But, I have not even once heard a news of some activists going to the 'Human Rights Commission' to protest against the terrorists who kill innocent people and take away their Basic Human Right, which is the Right to live. Is it good for the country?

On December 13, 2003 Our Parliament was attacked by a group of terrorists. Our brave security personnel fought with them and all of the attackers were killed. Some of our brave soldiers gave their life to save the so-called leaders of the country. Later, the investigation agencies worked hard and found all the clues of this attack and arrested the master-mind who was behind this incident. He was presented in front of the judiciary and even the Supreme court has sentenced him to be hanged. But, he is still alive. The family members of the soldiers who died on Dec.13,2003, have protested aginst this. They have even returned the medals to the president of India, but, Afzal is still alive. Are we going to crush terrorism in this way?

All these questions must be asked to ourselves by each of us. If the point of view of our leaders towards terrorism, does not change,we can only imagine what would be the situation after some more years? what are we going to give the future generations? What would their destiny be? Shall they have the right to live peacefully? All these questions want answers from the leaders and the voters who have given the future of the country in the hands of such leadership.

Monday, September 08, 2008

'हिन्दी-दिवस'

भारत में प्रतिवर्ष १४ सितम्बर का दिन 'हिन्दी-दिवस' के रूप में मनाया जाता है. इस दिन विभिन्न शासकीय-अशासकीय कार्यालयों, शिक्षा संस्थाओं आदि में विविध गोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. कहीं-कहीं 'हिन्दी पखवाडा' तथा 'राष्ट्रभाषा सप्ताह' इत्यादि भी मनाये जाते हैं. विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा भी है. अतः इसके प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करने के लिए ऐसे आयोजन स्वाभाविक ही हैं. परन्तु, दुःख का विषय यह है की समय के साथ-साथ ये आयोजन केवल औपचारिकता मात्र बनते जा रहे हैं.
राष्ट्रगीत,राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रभाषा किसी भी राष्ट्र के मानबिंदु होते हैं. इनका रक्षण, पोषण तथा प्रसार करना प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है.अतः राष्ट्र भाषा होने के कारन हिन्दी का भी व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना आवश्यक है. परन्तु, ऐसा लगता है की भारत में कभी भी इस दृष्टि से विचार नहीं किया गया. स्वतंत्रता के बाद भी पश्चिमी शिक्षा-पद्धति को ही जारी रखने के कारण पश्चिम को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई. इसी प्रकार अंग्रेज़ी का ज्ञान रखने वालों को ही विद्वान मानने की मानसिकता भी दिखाई देती है. इसका दुखद पहलू यह है कि केवल सामान्य जनता में ही नहीं, वरन, शासकों के मन में भी यही भावना विद्यमान है.इसका एक उदहारण यह है कि अपने पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने जब सांसद के रूप में अपना प्रथम भाषण हिन्दी में प्रारम्भ किया, तो इसका विरोध करते हुए अनेक संसद-सदस्य उठकर सदन से बाहर चले गए. आज भी संसद में होने वाली बहस तथा चर्चाओं में बड़े पैमाने पर अंग्रेज़ी का ही प्रयोग होता हुआ दिखाई देता है।

पिछले कुछ वर्षों में वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के नाम पर प्रत्येक क्षेत्र का पश्चिमीकरण करने का प्रयास लगातार जारी है।इसके साथ-साथ ही हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेज़ी को अधिकाधिक प्रसारित करने का कार्य भी चल रहा है।यह प्रचार भी किया जा रहा है की वैश्वीकरण के इस दौर में यदि भारत को एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो अंग्रेज़ी का प्रयोग अनिवार्य है।इसी दुष्प्रचार से भ्रमित होकर छात्रों तथा अभिभावकों में अंग्रेज़ी माध्यम में ही शिक्षा प्राप्त करने की होड़ दिखाई देती है।परन्तु,वैज्ञानिक शोध इस बात को सिद्ध कर चुके हैं की बच्चों के मस्तिष्क, बुद्धि एवं तर्क शक्ति के सहज एवं संपूर्ण विकास के लिए मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना ही सर्वाधिक सहायक है।इसी प्रकार यह तर्क भी ग़लत है की अंग्रेज़ी को अपनाए बिना प्रगति नहीं की जा सकती।फ्रांस, जर्मनी,जापान चीन आदि अनेक देश अपने व्यापार एवं व्यव्हार में सदैव सर्वत्र अपनी-अपनी मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं।यदि अंग्रेज़ी के प्रयोग के बिना भी ये सभी देश विकसित हो सकते हैं, तो भारत क्यो नही?यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की एक भाषा के रूप में मेरा अंग्रेज़ी अथवा किसी अन्य भाषा के प्रति विरोध या विद्वेष नहीं है।परन्तु, मैं अंग्रेज़ी के अनावश्यक प्रयोग तथा प्रत्येक क्षेत्र में किए जा रहे अंधाधुंध अंग्रेजीकरण का विरोधी हूँ.विदेश व्यापर, सॉफ्टवेर, कॉल सेण्टर आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें अंग्रेज़ी का प्रयोग आवश्यक एवं स्वाभाविक है.लेकिन, दैनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अंग्रेज़ी का प्रयोग अनावश्यक तो है ही, साथ ही, यह हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए हानिकारक भी है.अतः एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए पहली आवश्यकता यह है कि हम हिन्दी को हीन मानकर तिरस्कृत करने की बजाय उस पर गर्व करें एवं दैनिक जीवन में आग्रहपूर्वक इसका अधिकाधिक प्रयोग एवं प्रचार-प्रसार करें.
हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओँ में से एक है।६६ से अधिक देशों में हिन्दी जानने वाले लोग रहते हैं.विश्व के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा सीखने की व्यवस्था है.अपनी हिन्दी फिल्मों तथा गीत-संगीत का जादू सम्पूर्ण विश्व को मोहित कर रहा है.यह निश्चित ही हम सभी के लिए गर्व का विषय है.लेकिन, दूसरी और दुखद पहलू यह भी है की धीरे-धीरे अपने ही देश में हिन्दी उपेक्षित हो रही है. वित्ताकोशों(बैंक्स), कार्यालयों, शिक्षण-संस्थाओं इत्यादि में हिन्दी का प्रयोग लगातार कम होता जा रहा है. बाजारों तथा दुकानों में बिकने वाली सामान्य वस्तुओं जैसे दवाएं,साबुन इत्यादि से लेकर बड़े-बड़े उद्योगों तक में सर्वत्र अंग्रेज़ी का प्रयोग ही अधिक दिखाई देता है.यहाँ तक की हमारे देश की शासकीय विमान-सेवा का नाम भी राष्ट्र-भासः में न होकर अंग्रेज़ी में ही है . यह स्थिति बदलनी चाहिए.

भारत विश्व के प्रमुख एवं महत्वपूर्ण देशों में से एक है. संपूर्ण विश्व के विकास एवं सकल मानव-जाति के कल्याण में भारत के योगदान को उपेक्षित नहीं किया जा सकता.संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय से ही भारत इसका सक्रिय सदस्य रहा है.इसके द्वारा संचालित सभी कार्यक्रमों एवं अभियानों को सफल बनने में भारत ने सदैव ही पूर्ण सहयोग दिया है.परन्तु, दुःख का विषय है कि इसकी अधिकृत भाषाओँ की सूची में अंग्रेज़ी, चीनी, फ्रेंच, रूसी, अरबी इत्यादि भाषों को तो स्थान दिया गया है, परन्तु, करोड़ों लोगो द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिन्दी भाषा को अब तक उस सूची में स्थान नहीं मिल सका है.इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी को स्वयं अपने देश में ही यथोचित सम्मान नहीं मिल रहा है. संयुक राष्ट्र संघ की सभाओं एवं बैठकों को संबोधित करनेवाले हमारे सभी प्रधानमंत्रियों में से श्री वाजपेयी के अलावा शायद ही किसी और ने इस मंच पर हिन्दी का प्रयोग किया है.
जिस प्रकार यह सत्य है की हिन्दी की चिंताजनक स्थिति के लिए हम सभी दोषी हैं, उसी प्रकार यह भी सत्य है की इसके विकास एवं प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करना भी हम सभी का उत्तरदायित्व है. यदि हम अपने सामान्य दैनिक जीवन में छोटी-छोटी बैटन का ध्यान रखें एवं कुछ सरल सुझावों का पालन करें, तो हम सभी अपने अल्प प्रयास के द्वारा ही हिन्दी के विकास में बड़ा योगदान दे सकते हैं. हमें अपने दैनिक वार्तालाप में हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग करना चाहिए. समस्त पात्र व्यव्हार का माद्यम हिन्दी ही होना चाहिए.कार्यालयों,न्यायालयों,शिक्षा-संस्थाओं आदि को भेजे जाने वाले आवेदन-पत्र इत्यादि भी हिन्दी में ही भेजें. अंतरताना (इन्टरनेट) पर अनु-डाक(ऐ-मेल) भेजनेवाले भी सरलता से हिन्दी का प्रयोग कर सके हैं. आजकल अनेक वेब-साइटों पर हिन्दी में -मेल भेजने की सुविधा उपलब्ध है.इसी प्रकार अनेक लिप्यान्तरण (ट्रांस्लितेरेशन) सॉफ्टवेर भी विकसित हो चुके हैं, जिनके द्वारा सरलता से हिन्दी में लिखा जाता है. जैसे :- यदि हम अंग्रेज़ी में 'नमस्ते' लिखें, तो यह संगणक के पटल(स्क्रीन) पर हिन्दी में 'नमस्ते' लिखा हुआ दिखाई देगा.सचल दूरभाष(मोबाइल फोन्स) में भी हमें हिन्दी अ विकल्प चुनना चाहिए एवं संदेश आदि भी हिन्दी में ही भेजने चाहिए.इसी प्रकार अपने घरों के बाहर लगाई जाने वाली नाम-पट्टिका(नेम-प्लेट) भी हम हिन्दी में ही लगवाएं तथा विभिन्न अवसरों पर भेजे जाने वाले बधाई संदेश, शोक संदेश आदि भी हिन्दी में ही भेजें.इस प्रकार की चोटी-चोटी बों को अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति हिन्दी के विकास में योगदान दे सकता है.विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी स्वयं हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करते हुए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित किया जन चाहिए.अहिन्दी भाषी राज्यों के लोगों को भी हीनी के महत्व एवं आवश्यकता की जानकारी दी जनि चाहिए.जिस प्रकार हम अंग्रेज़ी आदि विदेशी भाषाओं को सीखने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक भारतीय को हीनी भी सीखनी चाहिए.
परन्तु,केवल सामान्य जनों एवं कुछ संस्थाओं के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं.शासन को भी इस विषय में प्रयास करने होंगे.हिन्दी के विकास के लिए कार्य करनेवाले लेखकों,कवियों,गायकों,संगीतकारों एवं अन्य कलाकारों को पुरस्कृत किया जन चाहिए.सभी विदेशी नेताओं, राजनयिकों एवं प्रतिनिधियों से होने वाली औपचारिक चर्चाओं, बैठकों तथा वार्तालाप आदि भी अनुवादकों तथा दुभाषियों की सहायता से हिन्दी में ही होने चाहिए.इसी प्रकार अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं में देश का प्रतिनिधित्वा करनेवाले खिलाड़ियों के गणवेश पर अंग्रेज़ी में 'इंडिया' लिखने की बजाय हिन्दी में 'भारत' लिखा जन चाहिए. ऐसे छोटे-छोटे कार्य हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत लाभदायक होंगे।

प्रत्येक भारतीय के मन में हिन्दी के प्रति गर्व एवं प्रेम की भावना उत्पन्न करना हम सभी का कर्तव्य है. अतः हमें प्रयास करना चाहिए की 'हिन्दी-दिवस' जैसे आयोजन केवल औपचारिकता मात्र न रहकर हिन्दी के प्रति सम्मान प्रकट करने का मध्यम बनें.अन्यथा, यदि हमारे द्वारा हिन्दी की इसी प्रकार उपेक्षा होती रही, तो सम्भव है की हिन्दी भाषा के समाप्त होने का दुखद-काल भी हमें अपनी आंखों से देखना पड़े और आने वाली पीढियों के लिए १४ सितम्बर का दिन हिन्दी के प्रति सम्मान का दिन बन्ने की बजाय हिन्दी का 'स्मृति-दिवस' बनकर रह जाए. यदि ऐसा हुआ, तो इसके जिम्मेदार हम सब ही होंगे.

Sunday, August 17, 2008

Are we really Independent?

15th August 1947!! An unforgettable day in the history of India!! The golden day, n which centuries old series of slavery ended and we got Freedom. Though, the country was divided, but, this partition brought with, the message that India was free. After the sacrifices of thousands of freeedom fighters, we at last got our freedom. India became 'Independent.' From that day, we celebrate 15th August as our Independence day.But, looking at our country's present situation, a question arises whether we are really independent?
What is Independence? According to me, it is a word with a wide meaning which includes right to make policies about & to work without any external interference or pressure, in all the areas like Administration, Judiciary, Education, Religion, Politics etc. As an Indian, we should ask ourselves whether we have this Independence? The probability of getting a negative answer is higher.
Independent administrative, judicial and educational systems are three important requisites for the development & stability of a country. But, it is a matter of great sorrow and anxiety, that even after so many years of our freedom, there have not been any major changes in any of these three areas.We are still following the same Administrative, Judicial & Educational Systems which were imposed on us by the external (foreign) rulers for their self-interests.As a result, corruption is hollowing the administration like a termite & instead of feeling safe & secure by seeing the police nearby, the common man has thoughts of fear. Thousands of cases are pending in the courts & it is not possible to predict the date of their completion. The condition of our educational system is no different. Children of the country are still learning the same distorted history, which was written by foreigners to remove the feeling of self-respect & pride from the minds of the Indians.Thats why we know about Alexander, 'The Great' (?) but, not about Arya Chanakya or Samrat(King) Chandragupt Maurya. We have all the information about Napoleon, but we know nothing about Samrat Viramaditya. We have knowledge about the contribution of Newton or pythagoras, but, we easily deny even the existance of Aryabhatta, Bhaskaracharya, charak, Sushrut or Bodhayan. We have heard many stories about the voyages of Columbus & Vasco-di-Gama, but, not even once have we heard the name of Vushloon, who trravelled to Mexico, centuries before them. Are these not the indications of our educational system being imperfect? The effect of these defects is that millions of youngsters are still unemployed after getting this education and the aim of most of them is to get a job in some multu-national company and to migrate to some other country.Is it a sign of our Independence?
Even the field of medication and health sciences is not free from foreignization. Despite of having perfect techniques like Yoga & Ayurvedam we hae still kept ourselves burdened with a foreign medicinal system, which is full of side-effects. As a result, the cost of medicines & medical facilities is going beyond the reach of the common man & everywhere there is deficiency of medical services. The condition of most of the government hospitals matches exactly with the description of the hell, found in the ancient texts. 99.99% of our leaders prefer getting medical treatment from private clinics and hospitals or from foreign countries. This is the biggest example of ailure of our medical system.
Its a matter of great concern, that even after so many years if freedom, the social & political situation is so reckoning. Selfishness is growing rapidly among individuals. Crime-rate is increasing. Terrorism, Naxal Activities, foreign intrusion etc. are surrounding the country. Everyday we get news of some terrorist incident, naxal attack or bomb-blast from some or the other part of the country & instead of being united at the critical hour & to crush the enemy, we are fighting amongst ourselves on regional, religious or lingual matters. Either we can't see the truth or else we dont want to. East & west Germany got united. Different countries scattered all over the Europe, joined hands together to make 'European Union' & here in India, we hear about the demand for independence of Kashmir & separation of Nagaland or Manipur. Someone speaks about Telangana, while someone else is worried only about the 'Marathi' Community.Somebody is concerned only about a particual caste while, someone else prefers the interests of a specific community, rather the interests of the country, as a whole. Intruders from neighbouring countries are getting all the facilities & favours. They are even contesting elections & have reached the legislature, while on the other hand, thousands of hindus from Kashmir, are forced to live in asylum as refugees in their own country, since last 18 years!! Those who talk about regionalism, have never uttered a single word about Nationalism. In this situation, how safe is our freedom?
Youth is the biggest asset of a country. They are the creators of Country's future. About 50% of India's Population consists of youngsters. But, what is their condition? Most of them are confused and directionless. The young generation is coveted to adopt foreign language, foreign culture, foreign goods & foreign life-style. In the country, where youth should mean power, knowledge & intellect, most of the youngsters are under influence of Smoking, Alcoholism, Drugs & other addictions. In their lives, self-discipline, patience & peace have been replaced by spontaneity, absurd insanity & uncontrolled life-style. Most of the youngsters know more about Cricket, rather than about revolutionaries or freedom fighters. IN this country of Mahatma Gandhi, where foreign goods & clothes were boycotted & burnt and khadi was the symbol of freedom struggle, the foreign traders & companies have again reached even upto the villages. In this nation, where 'JAI-JAWAAN, JAI KISAAN' was once the slogan of security & progress, family members of the martyrs are returning their medals to the government, in protest of its policies & farmers are committing suicide everyday. The Country which was ocne known as 'Sone ki Chidiya' (The Golden Bird), today looks towards the IMF or the World Bank to get financialhelp, even for the completion of small projects. Our financial policies are befecial more to the other countries, rather than to India. In this situation, how can we claim to be Independent?
We got freedom on 15th August 1947, but, we still have to get Independence. The wule of the country was transformed to the hands of the Indians, but, Indianization of all the parts of governance is also necessary.Till, a foreign system exists in even one of the areas, how canwe call ourselves 'Independent?' The meaning & aim of Independence would be incomplete till India once again stands proudly in front of the world with Swadeshi (own goods), Swabhasha (own language) & Swabhiman (Self-Respect).

Sunday, August 10, 2008

क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं?

१५ अगस्त १९४७!! भारतीय इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन!! वह स्वर्णिम दिवस, जब सदियों से चली आ रही दासता की श्रुंखला टूटी और हमें स्वराज्य प्राप्त हुआ। हांलाकि, देश का विभाजन हो गया, पर यह विभाजन अपने साथ सैकड़ों वर्षों की गुलामी के अंत का संदेश भी लेकर आया। हजारों देशभक्तों के त्याग और बलिदान के बाद आखिर हमें परतंत्रता से मुक्ति मिली। भारत "स्वतंत्र" हो गया। उस दिन से हम हर वर्ष १५ अगस्त का दिन "स्वतंत्रता-दिवस " के रूप में मानते हैं। लेकिन, देश की वर्त्तमान परिस्थिति को देखकर बार बार प्रश्न उठता है कि 'क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं?'
स्वतंत्रता क्या है? यह एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है, जिसमे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, धार्मिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक, न्यायिक, सामरिक, राजनैतिक आदि सभी क्षेत्रों में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के बिना पूर्णतः स्वतंत्र होकर नीतियां बनाने तथा कार्य करने का अधिकार सम्मिलित है। हम एक भारतीय के रूप में स्वयं से पूछें कि क्या हमें यह स्वतंत्रता प्राप्त है? इसका उत्तर नकारात्मक मिलने कि संभावना ही अधिक है।
स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था, न्याय-प्रणाली और शिक्षा पद्धति किसी भी राष्ट्र कि प्रगति एवं स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं। लेकिन,दुःख और चिंता का विषय है कि स्वाधीनता प्राप्ति के इतने वर्षों के बाद भी इन तीनों क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर कोई बहुत बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं। हम आज भी उसी प्रशासनिक व्यवस्था, न्याय-प्रणाली और शिक्षा पद्धति का पालन कर रहे हैं, जो विदेशी शासनकर्ताओं द्वारा उनके स्वार्थ के लिए हम पर लादी गई थी। इसी का परिणाम है कि भ्रष्टाचार दीमक बनकर प्रशासन को खोखला कर रहा है और पुलिस को देखकर सुरक्षा का विचार उत्पन्न होने कि बजाय सामान्य नागरिक के मन में भय का संचार हो जाता है। न्यायालयों में हजारों प्रकरण लंबित हैं,जिनके निराकरण में अभी और कितना समय लगेगा, ये कह पाना सम्भव नहीं है। शिक्षा-पद्धति की दशा भी इससे बहुत अलग नहीं है। देश के बच्चे आज भी पुस्तकों में वही विकृत इतिहास पढ़ रहे हैं, जो भारतीयों के मन से आत्म-गौरव कि भावना को नष्ट करने के लिए विदेशियों द्वारा गढा गया था। यही कारण है कि हम सिकंदर 'महान' (?) को तो जानते हैं, लेकिन आर्य चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त कौन थे,ये हमें नहीं मालूम। हमें नेपोलियन के बारे में सारी जानकारी है, लेकिन, सम्राट विक्रमादित्य के बारे में हम कुछ नहीं जानते। हमें न्यूटन और पाइथागोरस के योगदान का ज्ञान है, लेकिन आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चरक, सुश्रुत और बोधायन जैसे ज्ञानियों के अस्तित्व को हम सहजता से नकार देते हैं। हमने वास्को-डी-गामा और कोलंबस की समुद्री यात्राओं के अनेक वर्णन सुने हैं, लेकिन उनसे सदियों पहले भारत से मेक्सिको तक की समुद्री यात्रा करने वाले वुशलून का नाम भी हमने नहीं सुना। क्या ये हमारी शिक्षा पद्धति के दोषपूर्ण होने का प्रमाण नहीं है? इन्ही दोषों का परिणाम है कि देश के करोड़ों युवा यह शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बेरोजगार हैं और अधिकांश युवाओं का लक्ष्य विदेशों में बस जाना अथवा किसी विदेशी कम्पनी में नौकरी पाना ही है। क्या ये हमारी स्वतंत्रता का लक्षण है?
चिकित्सा का क्षेत्र भी इस विदेशीकरण से अछूता नही है। आयुर्वेद तथा योग जैसी परिपूर्ण पद्धतियों के होते हुए हम आज भी एक विदेशी चिकित्सा पद्धति को ही लादे हुए हैं। फलस्वरूप, दवाओं तथा चिकित्सा सेवाओं की कीमतें आम नागरिक की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं का सर्वत्र अभाव है। अधिकांश शासकीय अस्पतालों का हाल तो प्राचीन ग्रंथों में मिलने वाले नरक के वर्णन से पूरी तरह मेल खता है। स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता तथा चिकित्सा पद्धति की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है की हमारे ९९.९९% नेता और जनप्रतिनिधि अपना इलाज निजी चिकित्सालयों में अथवा विदेशों में ही करवाते हैं।
बहुत दुःख का विषय है कि स्वराज्य-प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी सामाजिक और राजनैतिक हालत इतने अधिक चिंताजनक हैं। समाज में स्वार्थ लगातार बढ़ रहा है। अपराध की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। आतंकवाद, नक्सलवाद, विदेशी घुसपैठ इत्यादि खतरे देश को चारों ओर से घेर रहे हैं। देश के किसी न किसी भाग से प्रतिदिन किसी आतंकवादी घटना,नक्सली हमले या किसी बम विस्फोट का समाचार अवश्य मिलता है और ऐसे कठिन समय में सरे मत-भेद भुलाकर एक होने और इन हमलावरों को कुचलने कि बजाय हम भाषावाद, प्रांतवाद और मजहबी उन्माद से ग्रस्त होकर आपस में ही लड़ रहे हैं। या तो हमें सत्य दिखाई नहीं देता, या हम देखना ही नहीं चाहते। पूर्व और पश्चिम जर्मनी मिलकर पुनः एक हो गए, यूरोप में बिखरे हुए विभिन्न देशों ने 'यूरोपियन यूनियन' नामक एक महासंघ बना लिया और यहाँ भारत में हम कभी कश्मीर की आज़ादी और कभी नागालैंड और मणिपुर की पृथकता के नारे सुन रहे हैं। कोई तेलंगाना की बात कहता है, तो कोई मराठियों की अस्मिता का मुद्दा उछाल रहा है। किसी को केवल अपनी जाति की चिंता है और कोई राष्ट्र की बजाय केवल किसी समुदाय-विशेष के हित को ही प्राथमिकता देता है। पड़ोसी देशों से घुसपैठ करनेवाले सभी सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं, यहाँ तक की चुनाव लड़कर विधायिका तक में पहुँच रहे हैं, और दूसरी और लाखों कश्मीरी पंडित अनेक वर्षों से अपने ही देश में शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं। प्रांतवाद, भाषावाद और क्षेत्रवाद के नाम पर लड़नेवालों ने कभी भी राष्ट्रवाद की बात नहीं की। ऐसेस्थिति में हमारी स्वाधीनता कब तक सुरक्षित रह सकेगी?
किसी देश की सबसे बड़ी पूँजी वहाँ की युवा पीढी ही होती है। युवा ही देश के भविष्य-निर्माता हैं। भारत की लगभग ५०% जनसँख्या युवा है। लेकिन, दुखद पहलु यह है की अधिकांश युवा भ्रमित और दिशाहीन हैं। विदेशी वस्तुं, विदेशी संस्कृति, विदेशी भाषा और विदेशी जीवन शैली को अपनाने के लिए यह युवा पीढी लालायित है। जिस देश में युवावस्था का अर्थ बल, बुद्धि एवं विद्या होना चाहिए, वहाँ अधिकांश युवा इसके विपरीत धूम्रपान, मद्यपान और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थों की चपेट में हैं। उनके जीवन में संयम, धैर्य तथा शान्ति का स्थान स्वच्छंदता, उन्मुक्त जीवन शैली तथा विवेकहीन उन्माद ने ले लिया है। अधिकांश युवाओं को क्रांतिकारियों की कम और क्रिकेट की जानकारी अधिक है। विदेशी वस्तुओं तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर, खादी को प्रतीक बनाकर स्वदेशी के प्रयोग का संदेश देने वाले महात्मा गाँधी के देश में आज कोने कोने तक विदेशी वस्तुओं के विक्रेता पुनः पहुँच गए हैं। जिस देश में कभी 'जय जवान-जय किसान' का मंत्र गूंजता था, वहाँ शासन की नीतियों से व्यथित होकर शहीद सैनिकों के परिजन सरकार को सभी पदक लौटा रहे हैं और किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं। सोने की चिडिया कहलने वाला देश छोटे-छोटे कार्यों में आर्थिक सहायता के लिए कभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, तो कभी विश्व बैंक की और देखता है। हमारी आर्थिक नीतियों से आज भी भारत की बजाय बाहरी देशों को ही अधिक लाभ हो रहा है। ऐसी स्थिति में हम कैसे कह सकते हैं की हम स्वतंत्र हैं?
१५ अगस्त १९४७ को हमें स्वराज्य तो मिल गया, लेकिन, स्वतंत्रता प्राप्त करना अभी शेष है। देश का शासन भारतीयों के हाथों में आ गया, लेकिन, शासन तंत्र के सभी अंगों का भारतीयकरण करना आवश्यक है। जब तक किसी एक क्षेत्र में भी विदेशी तंत्र उपस्थित है, तब तक हम स्वयं को 'स्व-तंत्र' कैसे कह सकते हैं?स्वदेशी, स्वभाषा और स्वाभिमान ही किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के मुख्य स्तम्भ हैं। जब तक इनके आधार पर हम अपना शासन-तंत्र नहीं बदलते, तब तक स्वराज्य को 'सुराज्य' में बदलना भी सम्भव नहीं होगा। जब तक भारत स्वदेशी, स्वभाषा और स्वाभिमान के साथ उठकर पुनः एक बार विश्व के सामने खड़ा नहीं हो जाता, तब तक स्वतंत्रता-प्राप्ति का अर्थ और लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

Friday, July 11, 2008

भारत के युवा. . .

अक्सर ये चर्चा सुनाई देती है की भारत शीघ्र ही दुनिया के प्रमुख शक्तिशाली एवं विकसित देशो की श्रेणी में पहुँच जाएगा। इसके जो विभिन्न कारण गिने जाते है, उनमे एक मुख्या कारण यह है कि भारत कि लगभग ५०% जनसंख्या युवा है और यही युवा पीढ़ी भारत के उज्जवल भविष्य का निर्माण करेगी।
समय के साथ-साथ जैसे सभी क्षेत्रो में परिवर्तन हुए है, उसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी कई बदलाव हुए है। पारंपरिक विषयो के अलावा अनेक नए पाठ्यक्रम शुरू हुए हैं और आज भारतीय युवाओं के पास शिक्षा के विभिन्न विकल्प उपलब्ध हैं। इसका लाभ ये हुआ है कि हमारे देश के युवाओं ने अपनी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार विषय का चुनाव किया और प्रत्येक क्षेत्र में भारत के युवा छा गए। चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो या साहित्य का, शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यापार का, Computers का क्षेत्र हो या अंतरिक्ष अनुसंधान का; हर जगह, हर क्षेत्र में, हर देश में, भारतीय युवाओं ने अपनी छाप छोड़ी है। भारत के युवा जिस देश में गए, वहाँ उन्होंने उस देश कि उन्नति के लिए अपनी पूरी क्षमता का उपयोग मेहनत, इमानदारी और निष्ठा के से किया.इससे दुनिया में भारत का सम्मान निश्चित ही बढ़ा है।
यह तो नि:संदेह गर्व और प्रसन्नता का विषय है कि भारत के युवा जिस देश में भी गए हैं, वहा उन्होंने अपना परचम लहराया है। लेकिन, इससे जुड़े कुछ और पहलू भी हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। भारतीय युवाओं ने विशव के सभी देशों में जाकर सफलता प्राप्त की है और उन देशों के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। लेकिन, आज भारत कि स्थिति क्या है? भूख, गरीबी, बेरोज़गारी, बीमारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिगत द्वेष, अपराध आदि जैसी न जाने कितनी चुनौतियों से अपना देश जूझ रहा है। हर दिन स्थिति बिगड़ती जा रही है। क्या इसे सुधारने के प्रति हमारा कोई कर्तव्य नहीं है?कभी जो आतंकवाद सिर्फ़ देश के सीमावर्ती राज्यों तक सीमित था,आज वह पूरे देश में फ़ैल चुका है। जम्मू-काश्मीर से तमिलनाडु तक और राजस्थान से मणिपुर तक हर राज्य से आतंकवादी घटनाओं कि खबरें मिलती रहती हैं। केरल से पश्चिम बंगाल तक सैकडो जिलों में नक्सली गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। पड़ोसी देशों से होने वाली घुसपैठ लगातार जारी है। दूसरी और हमारी सेना योग्य अफसरों की कमी से जूझ रही है। वायुसेना के अनेक Pilots ज्यादा वेतन और आरामदायक जीवन की चाह में निजी विमान कंपनियों का रूख कर रहे हैं। हमारे स्कूलों और महाविद्यालयों में पढ़ने वाले हजारों युवाओं के मन में USA,UK या ऑस्ट्रेलिया जाने का सपना पल रहा है, लेकिन ऐसे कितने हैं, जो भारतीय सैन्य दल में जाना चाहते हैं?ऐसे कितने हैं, जो विदेश में नौकरी के लुभावने प्रस्ताव को ठुकराकर अपना पूरा जीवन अपने देश की प्रगति के लिए समर्पित करना चाहते हैं?
हमें गर्व होता है की अमरीका में बड़ी संख्या में भारतीय डॉक्टर कार्य करते हैं और उन्हें वहाँ बहुत सम्मान भी मिलता है। दूसरी और ये खबरें भी सुनाई देती हैं की आवश्यक स्वस्थ्य सुविधाओं और दवाओं के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़ अनेक बच्चों और रोगियों की मृत्यु हो रही है। मेरे मन में प्रश्न उठता है की अमरीका में रह रहे जिन भारतीय डॉक्टर पर हमें गर्व होता है, यदि वे सुख सुविधाओं और धन की बजाय देश-सेवा को अधिक महत्व देते तो क्या हमें उन पर और अधिक गर्व नही हुआ होता? हम NASA में कार्य कर रहे भारतीयों की चर्चाएं भी अक्सर सुनते हैं। इसमें संदेह नही है की अंतरिक्ष अनुसंधान का महान कार्य सम्पूर्ण मानवता के लिए है। लेकिन, मानवता के हित का जो कार्य हमारे भारतीय युवा नासा में जाकर कर रहे हैं, वह भारत की अंतरिक्ष संस्था इसरो में भियो तो किया जा सकता था!! आज अनेक युवा वैज्ञानिकों का ध्येय नासा में कार्य करने का है, लेकिन हमारे देश का हर युवा डॉक्टर अवुल पकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम जैसा क्यों नही है, जिन्होंने किसी विदेशी संस्था के लिए काम करने की बजाय देश में रहकर अनुसंधान करना ही ज्यादा पसंद किया? हम सभी आज नासा के Missions पर काम कर चुके भारतीय वैज्ञानिकों को जानते हैं, लेकिन हम में से कितने लोगों को भारत के एक मात्र अन्तरिक्ष यात्री श्री राकेश शर्मा का नाम भी याद है?
मैं विदेशों में जाकर शिक्षा प्राप्त करने, धन कमाने या अनुभव हासिल करने का विरोधी नहीं हूँ। अच्छे से अच्छा और आधुनिक ज्ञान प्राप्त करना, अधिक से अधिक धन-सम्पन्नता और सुख-सुविधा की इच्छा करना, ये सभी प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता भी है और अधिकार भी। इनकी प्राप्ति के लिए सभी तरह के उचित और नैतिक मार्गों से प्रयास भी करना चाहिय। लेकिन, अपनी आवश्यकताओं और अधिकारों की पूर्ति करते हुए हमें अपने देश की आवश्यकताओं और इसके प्रति अपने कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए। हम यह याद रखें की केवल TAX के रूप में कुछ रुपये सरकार को दे देने से हमारा कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता। इस देश में जन्म लेकर, यहाँ के अन्न से पोषण पाकर, इस देश के संसाधनों का उपयोग करके, इस देश में शिक्षा प्राप्त करना और फ़िर इसे हमेशा के लिए छोड़कर विधेसों में बस जाना ठीक नही है। यदि कोई देश से बाहर जाना ही चाहता है, तो कुछ वर्षों तकवहाँ रहकर उसे लौट आना चाहिए और वहाँ से प्राप्त ज्ञान,धन और अनुभव का उपयोग भारत की प्रगति के लिए करना चाहिए। यहाँ मैं यह भी स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ की कुछ वर्षों में लौट आने का अर्थ यह नहीं है की हम पूरी क्रियाशील युवावस्था विदेशों में बिताएं और जीवन के अन्तिम वर्षों में अपने बुढापे का बोझ भारत पर डाल दें।
हम में से अधिकांश लोग देश की वर्तमान चिंताजनक स्थिति और भीषण समस्याओं के लिए सरकार को दोष देते हैं। यह सही है की स्वतन्त्रता के बाद भी हमारी सरकारों ने अंग्रेजों की बनाई हुई नीतियों को ही जारी रखा और उन्हें बढावा भी दिया। लेकिन, हमें यह नहीं भूलना चाहिए की ग़लत नीतियां बनने के लिए यदि सरकार दोषी है, तो ऐसी सरकारों को चुनने वाले मतदाता के रूप में हम भी दोषी हैं, और जो मतदान करते ही नहीं, वो तो और भी अधिक दोषी हैं क्योकि मतदान केवल हमारा लोकतान्त्रिक अधिकार ही नही, बल्कि हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य भी है। इसलिए हमें जागरूक रहकर देश-हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए ही पाने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए।
मैं इस बात से सहमत हूँ की भरात की युवा पीढी ही देश के उज्जवल भविष्य का निर्माण करेगी। लेकिन, हमें यह याद रखना होगा की भरात का पुनर्निर्माण इस देश को छोड़कर चले जाने से नही होगा। वह तभी हो सकता है,जब हम देश के प्रति अपने कर्तव्यों को समझे और इसकी प्रगति में अपना पूरा योगदान करें।
मुझे इस बात का पूरा अहसास है की देश-सेवा और कर्तव्य आदि बातो को पढ़कर कुछ लोग शायद मेरा उपहास भी करेंगे, लेकिन मैं स्पष्ट कहना चाहता हूँ की मैंने ऐसे लोगो के लिए ये सब लिखने का कष्ट नहीं किया है। मैंने तो उन लोगों के लिए ये सब लिखा है, जिनके मन में आज भी अपना महान भारत समाया हुआ है। ऐसे सभी युवाओं से मेरी यही अपील है की किसी भी प्रकार के भ्रम में न पड़ते हुए केवल अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनें और अपने देश की प्रगति में पूरा योगदान करें।
आप सबकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इंतज़ार रहेगा। सृजनात्मक (Creative) सुझावों और सकारात्मक (Positive) आलोचनाओं का मैं हमेशा खुले दिल से स्वागत करूँगा। आपने मेरे विचारों को पढने के लिए अपना समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

Monday, July 07, 2008

Youth . . .

YOUTH . . .

Youth is not a prime of life,
But, a state of mind.
You are as young as your faith,
and as old as your doubts.
you are as young as your self-confidence,
and as old as your fear.

-Shri Yadavrao Joshi.