मुम्बई में हुए हमले को महज इस्लामी आतंकवाद कहकर अन्य आतंकी घटनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता।
पाकिस्तान का अनेक हिस्सों में विभाजन, इस्लामी घनत्व वाले क्षेत्र की कठोर निगरानी, बांगलादेशी घुसपैठियों का निष्कासन, सेना एवं खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण तथा कठोर आतंकरोधी कानून सबकी एक साथ जरूरत है। भारत सरकार को सभी दिशाओं में एक साथ आगे बढ़ना होगा। किन्तु इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए जो काँग्रेस की कठपुतली सरकार में नहीं है। रीढ़विहीन परजीवी कृमियों से राष्ट्र नहीं चलता, इसलिए जरूरी है कि सबसे पहले सत्ता-परिवर्तन किया जाए।
अब तक हुए अन्य आतंकी हमलों से यह न केवल अधिक भयावह और बड़ा है बल्कि बिना किसी राष्ट्र की प्रत्यक्ष भागीदारी के ऐसी घटना को अंजाम देना असंभव है। हालांकि भारत में हुई प्रत्येक आतंकवादी घटना के तार पाकिस्तान से जुड़ते हैं, किन्तु इस हमले में पाकिस्तान का प्रत्यक्ष सहयोग उजागर हुआ है। पाकिस्तानी सरकार और आतंकवादी संगठनों के सम्मिलित प्रयास से ही इस तरह की बड़ी आतंकवादी घटना हो सकती है। अब तक पकड़े या मारे गये सारे आतंकवादी पाकिस्तान के हैं और ये कराची से अल्फाज नामक पाकिस्तानी बोट से समुद्र के रास्ते रवाना हुए थे। 14 नवम्बर को ही पोरबन्दर के विनोद भाई बाबूभाई मसाणी का बोट 'कुबेर' लापता हो गया था जिसकी जानकारी कोस्टगार्ड और कस्टम को दी गयी थी। आतंकवादी अल्फाज छोड़कर इसी बोट से कोलाबा समुद्र तट से लगभग 70 नॉटिकल मील की दूरी तक आये थे जहाँ से वे राफ्ट में सवार होकर मुम्बई पहुँचे। इन्होंने हथियार और गोला बारूद कराची से ही ले लिया था। बिना पाकिस्तानी नौ सेना की सहायता से क्या इस तरह की कार्रवाई संभव हो सकती थी? कई बार पाकिस्तानी नौ सेना ने भारतीय मछुआरों की बोट पर कब्जा किया है। लेकिन, इस बार उस बोट का इस्तेमाल उनहोंने आतंकवादियों के लिए किया 'कुबेर' बोट पाकिस्तानी नौ सेना ने आतंकवादियों को मुहैया कराया। संभव है कि हथियार और गोला बारूद भी उन्होंने ही उपलब्ध कराये हों। इसलिए इस आतंकी हमले को युद्ध के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन अब प्रश्न उठता है कि ये विदेशी आतंकवादी मुम्बई के ताज, ओबराय और नरीमन हाउस जैसी अतिसुरक्षित इमारतों में अचानक कैसे घुस गये? क्या बिना स्थानीय सहयोग के इस तरह की वारदात संभव हो सकती है? इसलिए इसमें भारतीय इस्लामी आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन या उसके आनुषंगिक संगठनों का हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता। वस्तुत: इस तरह की घटना एक गहरी और लम्बी प्लानिंग का परिणाम है जिसमें पाकिस्तानी सरकार एवं सेना भारतीय और पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन सबकी सम्मिलित भूमिका है। यह भारत की आर्थिक राजधनी पर हमला कर उसके अर्थक्षेत्र को नुकसान पहुँचाने की रणनीति का हिस्सा है, जो बिना किसी बाहरी शक्ति के संभव नहीं हो सकता।चूँकि पकिस्तान का अस्तित्व ही भारत विरोध् से परिभाषित होता है इसलिए उसकी आंतरिक एकता बनाये रखने के लिए जरूरी है कि वह भारत के खिलापफ सदैव आक्रमणकारी की मुद्रा में हो। गौरतलब है कि पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान, सिंध, पंजाब आदि सारे प्रांत अपनी अस्मिता अलग-अलग परिभाषित कर स्वतंत्रा देश की माँग करते रहे हैं। अपने आंतरिक विघटन से बचने के लिए पाकिस्तान के पास केवल एक ही उपाय है कि वह भारत को अपना शत्रु प्रोजेक्ट करे। पाकिस्तान के बार-बार के भारत पर हमले के पीछे यही कारण है। लेकिन बार बार की हार और बांगलादेश के स्वतंत्र अस्त्वि में आने के बाद वह प्रत्यक्ष युद्ध में सम्मिलित नहीं हो सकता। आज भारत की सामरिक क्षमता पाकिस्तान के मुकाबले कम-से-कम तीन गुनी है और आर्थिक महाशक्ति के रूप में भी दुनिया भारत को पहचानने लगी है। इसके विपरीत पाकिस्तान दिवालियेपन के कगार पर है और उसका चिर मित्र चीन भी उससे किनारा करने लगा है। ऐसी स्थिति में वह प्रत्यक्ष युद्ध नहीं कर सकता। पाकिस्तान के साथ एक और विडम्बना है वह यह कि उसके राजनयिक, उसकी सेना और उसकी खुपिफया एजेंसियों में कोई तालमेल नहीं है: फिर आतंकवादी संगठन भी वहाँ अपनी समानान्तर सत्ता रखते हैं। एकमात्र भारत-विरोध ही वह केन्द्र है जिस पर सब सहमत होते हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान सदैव आक्रमणकारी मुद्रा में रहकर ही अपना अस्तित्व कायम रख सकता है। यह अकारण नहीं है कि जब-जब संबंधों के सुधर की बात राजनयिक स्तार पर होती है पाकिस्तानी सेना उसकी उल्टी प्रतिध्वनि प्रस्तुत करती है। कारगिल एक ऐसी ही प्रतिधवनि थी वाजपेयी जी के लाहौर की बस यात्रा के बाद। अभी जरदारी के भारत को प्रिय लगने वाले बयान कि 'पाकिस्तान भारत पर पहले परमाणु आक्रमण नहीं करेगा' की प्रतिक्रिया सामने है। इसलिए भारत और पाकिस्तान के सम्बंध् ठीक नहीं हो सकते या यों कहें कि पाकिस्तान ठीक नहीं होने दे सकता तो ज्यादा सही होगा। ऐसे में अहम सवाल है कि भारत को क्या करना चाहिए।
आज विशेषज्ञों की यह स्पष्ट मान्यता है कि पाकिस्तान पंद्रह से बीस सालों में विखण्डित हो जाएगा। अमेरिका ने इस क्षेत्रा में प्रयास भी शुरू कर दिया है। आतंकवाद के खात्मे के बहाने उसने अपफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमांत क्षेत्रों में सैनिक जमीन भी तैयार कर ली है। वह ब्लूचिस्तान की संसाधनयुक्त भूमि पर कब्जा चाहता है। भारत को भी यथाशीघ्र इस ओर कदम बढ़ाने चाहिए, क्योंकि बलूची जनता का भारत को समर्थन हासिल है। बिना पाकिस्तान के अनेक भागों में विखण्डन के भारत में आतंकवाद का स्थायी निदान संभव नहीं है। चूँकि पाकिस्तान भी यह जानता है कि उसका विखण्डन अवश्यंभावी है इसलिए वह अंतिम अस्त्रा के रूप में तीव्र भारत विरोध का ही इस्तेमाल करेगा। ऐसे में आतंकवादी घटनाएँ बड़े पैमाने पर भारत में हों, इसका पूरा प्रयास पाकिस्तान करेगा।
लेकिन पाकिस्तान को विखंडित करने से भारत का आंतरिक आतंकवाद कैसे खत्म हो जाएगा, यह सवाल महत्वपूर्ण है। चूँकि, भारत के कम्युनिस्टों और कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों की प्रतिबद्धता भारत के साथ नहीं है। लेकिन इनका कोई न कोई केन्द्र होता है जो इनमें आत्मविश्वास और जेहादीपन पैदा करता है। रूस के विखण्डन के बाद कम्युनिस्टों का केन्द्र केवल चीन रह गया है। क्यूबा आदि कमजोर देशों के प्रति प्रतिबद्धता से कोई खास असर नहीं पड़ता। चीन भी अब पूँजीवाद के दौर में दाखिल हो गया है इसलिए कम्युनिस्ट आन्दोलन कमजोर हो गया है। संभव है यह जेहादीपन शीघ्र खत्म हो जाए- बस नक्सली आतंकवाद के खात्मे के लिए प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। के.पी.एस. गिल ने तो दावा किया है कि चार से छ: सप्ताह में इसे कुचल दिया जा सकता है। जैसे ही पाकिस्तान विखंडित होगा कट्टरपंथी मुसलमानों की प्रतिबद्धता के केन्द्र समाप्त हो जाएँगे। इस्लामी देशों में पाकिस्तान ही सामरिक रूप से सर्वाध्कि समर्थ है इसलिए कट्टरपंथियों का केन्द्र पाकिस्तान होता है, प्रतिब(ता पाकिस्तान के प्रति होती है। इसके बाद उनकी प्रतिबद्धता इस्लाम के प्रति तो होगी लेकिन किसी खास देश को वे अपना मसीहा नहीं मानेंगे। यहाँ तक कि बांगलादेश का मसीहा भी पाकिस्तान ही है जिससे वह अलग हुआ। भारत के पूर्वी क्षेत्रों में बांगलादेशी मुसलमानों के बीच बांगलादेश के बजाय पाकिस्तान का झंडा ही प्रचलित है जो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
पाकिस्तान के विखंडित होने के बाद हालांकि स्थितियाँ बहुत कुछ सुधर जाएँगी, लेकिन जब तक वह विखंडित नहीं होता तब तक कुछ अलग रणनीतियाँ बनानी होंगी। आज भारत में सरायमीर जामियानगर जैसे बहुत सारे क्षेत्र मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले हैं। इन इलाकों को खुफिया-तंत्र की कठोर निगरानी में रखना होगा। जीरो जोन या छोटा पाकिस्तान कहे जानेवाले इलाकों में पुलिस की आवाजाही बढ़ानी होगी। लगभग पाँच करोड़ बांगलादेशी घुसपैठिये भारत में हैं और इनके तार हूजी और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों से जुड़े हैं। बांगलादेश की सीमा पर भारतीय क्षेत्र में 905 मस्जिद और 439 मदरसे हैं तथा बांगलादेश के क्षेत्र में 960 मस्जिद और 469 मदरसे हैं। चिकननेक पट्टी पर 1800 मदरसे हैं। बांगलादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालकर पूर्वोत्तर सीमा को सुरक्षित किया जाना चाहिये। इस समय पहली बार आतंकवादी समुद्री रास्ते से आये हैं इसलिए इस क्षेत्रा पर भी निगरानी रखनी होगी। नरेन्द्र मोदी की बातों पर अमल करते हुए इनमें भी सैनिक चौकियाँ स्थापित करनी होंगी।
इस विडम्बनापूर्ण स्थिति में जबकि भारत आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है, आतंकवादी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं, राजनयिकों को वोट बैंक की क्षुद्र राजनीति से उपर उठकर प्रबल इच्छाशक्ति से काम लेना होगा। राजनयिकों को देशहित में कुछ कड़े निर्णय लेने होंगे। पोटा जैसे कठोर कानून को लाना होगा, खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा। राजनीति के प्रति विश्वास पैदा करना होगा। अगर राजनीति के प्रति यह अविश्वास बरकरार रहा तो संभव है सेना और जनता स्वयं कानून हाथ में ले ले। यह देश के लोकतंत्र के लिए घातक होगा। काँग्रेस की निकम्मी सरकार ने जिस तरह सेना के जवानों पर वोट बैंक के लिए लांछन लगाया है वह राष्ट्रहित के लिए घातक है। अफजल जैसे आतंकवादी को फाँसी नहीं दिया जाना राजनीति के प्रति अविश्वास पैदा करता है। भारतीय राजनीति को यह विश्वास हासिल करना है।
अत: पाकिस्तान का अनेक हिस्सों में विभाजन, इस्लामी घनत्व वाले क्षेत्र की कठोर निगरानी, बांगलादेशी घुसपैठियों का निष्कासन, सेना एवं खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण तथा कठोर आतंकरोधी कानून सबकी एक साथ जरूरत है। भारत सरकार को सभी दिशाओं में एक साथ आगे बढ़ना होगा। किन्तु इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए जो काँग्रेस की कठपुतली सरकार में नहीं है। रीढ़विहीन परजीवी कृमियों से राष्ट्र नहीं चलता, इसलिए जरूरी है कि सबसे पहले सत्ता-परिवर्तन किया जाए।
वन्दे मातरम्! भारत माता की जय!
ह/- अंजनी कुमार श्रीवास्तव, सचिव, अभाविप जे.एन.यू.
ह/- विवेक विशाल, संयुक्त सचिव अभाविप जे.एन.यू.
28.11.2008 को जेएनयू में विद्यार्थी परिषद् द्वारा जारी पर्चा
