भारत-वर्ष को मीडिया की देन

हम सभी जानते हैं कि भारत-वर्ष विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है। इस बात से हम सभी सहज ही ये अंदाज़ लगा सकते हैं कि इतने बड़े देश की एकता और अखण्डता को बनाए रखने में मीडिया कि जिम्मेदारी कितनी बढ़ जाती है। लेकिन हमारे देश के अधिकांश पत्रकार इस देश को विभाजित करने में कोई कसर नही छोड़ रहे हैं। उनसे जो बन पड़ता है, करते हैं। राजनीतिज्ञों और पत्रकारों ने मिल कर तो धर्मनिरपेक्षता का मतलब ही बदल दिया है। आज-कल धर्मनिरपेक्ष का सीधा मतलब है "हिन्दू-विरोधी"। देश में जितने भी दंगे होते हैं, उनमें मीडिया की भूमिका राजनीतिज्ञों से कहीं ज्यादा होती है। शायद आपको ये बातें कुछ अजीब लगे, लेकिन यही वास्तविकता है। कुछ उदाहरण देता हूँ:

* मीडिया को उड़ीसा और कर्णाटक के कुछ ईसाईयों की इतनी चिंता है कि वो पिछले लगभग एक महीने से प्रतिदिन पहले पृष्ठ पर उनके बेघर होने का समाचार छापते हैं, लेकिन लाखों की संख्या में एक दशक से भी ज्यादा समय से बेघर कश्मीरी पंडितों की उन्हें कोई परवाह नहीं।
* मीडिया को ये पता है कि ईसाईयों के बेघर होने को लेकर महेश-भट्ट (फ़िल्म निर्माता) अल्पसंख्यकों की एक फौज लेकर राष्ट्रपति से मिले, लेकिन इस दंगे के कारण (स्वामी लक्षमनानंद की ह्त्या और हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अपशब्दों के प्रयोग वाले पुस्तकों का वितरण) पर किसी की नज़र नहीं जाती।
* मीडिया और सरकार को उड़ीसा और कर्णाटक के ईसाईयों से तो बहुत हमदर्दी है, लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों(जहाँ ईसाई जनसंख्या 75%-95% है) और कश्मीर(जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं) के हिन्दुओं के लिए उनके मन में कभी हमदर्दी क्यूँ नहीं आती?
* देश में प्रतिदिन कितने ही लोगों की हत्याएँ होती हैं और इनमें से कई हिन्दू भी होंगे। मीडिया को इसकी चिंता नहीं है। यहाँ तक कि सीमा पर शहीद होने वाले सैनिकों के समाचार भी कभी-कभी ही आते हैं और वो भी सातवें-आठवें पृष्ठ पर। लेकिन कोलकाता जैसे बड़े शहर में एक शिक्षक मरता (ह्त्या या आत्महत्या) है तो उसे 15 दिन से भी ज्यादा समय तक पहले पृष्ठ पर छापा जाता है, सिर्फ़ इसलिए कि वो व्यक्ति एक मुस्लिम था। और इस से भी दिलचस्प बात है लिखने का तरीका। एक समाचार पत्र ने लिखा था: Md. Rizwanur Rahman, a muslim teacher....... मुझे ये समझ में नहीं आया कि यहाँ "muslim" लिखने की क्या आवश्यकता थी।
* एक ही दिन में दो समाचार आते हैं, दोनों के लिखने का तरीका देखिये: 1) एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के 6 लोगों को ज़िंदा जला दिया। 2). उपद्रवियों ने कई दूकान जला दिए, इनमें से अधिकांश मुस्लिमों के थे। (पहले वाले समाचार में जिन लोगों को जिंदा जलाया गया, वो सभी हिन्दू थे)
* रांची में ईद के पवित्र दिन (Dec 2000-Jan 2001) एक सड़क-दुर्घटना में एक बच्ची की मौत होती है, इसके बदले में वहाँ के लोग देसी बम का इस्तेमाल करके D.S.P. (Shaheed U. C. Jha) की ह्त्या कर देते हैं। और इसके बाद भी इतना दंगा करते हैं की पूरे शहर में 3-4 दिनों तक कर्फ्यू लगा रहता है। किसी भी समाचार-पत्र में ये नहीं आता है कि मुस्लिमों ने D.S.P. की हत्या की। कई समाचार-पत्रों ने तो इसे महज़ एक दुर्घटना बताया। (उस समय मैं स्वयं रांची में था)
* किसी भी गैर-हिन्दू पर कोई हमला हुआ हो या किसी गैर-हिन्दू लड़की का बलात्कार हुआ हो तो मीडिया तुरंत बताती है कि ये दुष्कर्म कट्टरपंथी हिन्दुओं ने किया है। कई बार तो कुछ दिन बाद पता चलता है कि किसी लड़की का बलात्कार हुआ ही नहीं था, इस ख़बर को भी नहीं छापा जाता है।
* हिंदू धर्म के कई संतों पर अनेकों आरोप लग चुके हैं, शंकराचार्य, आशाराम बापू, बाबा रामदेव, इत्यादि। यहाँ तक कि साईं बाबा, राम-कृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद को भी नही छोड़ा गया। लेकिन आज तक किसी पोप या किसी इमाम पर कोई आरोप नहीं लगा।
* मीडिया की ही देन है कि आज भारत-वर्ष में भाजपा एकमात्र साम्प्रदायिक राजनीतिक दल है और शेष सारे दल धर्मनिरपेक्ष हैं और आज पढ़े-लिखे लोग भी यही सोचते हैं। लेकिन वास्तविकता इस से बिल्कुल परे है।

मीडिया ने लोगों के सोचने की दिशा ही बदल डाली है। दिल्ली के "Operation Batla House" को ही लें। मीडिया के प्रभाव के कारण कई तथाकथित बुद्धिजीवि लोग इस मुठभेड़ को नकली मुठभेड़ बता रहे थे। मीडिया ने भी इसे नकली साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार के ठेकेदार अर्जुन सिंह भी पीछे नहीं थे। कई websites तो ऐसे हैं जिनको लगता है कि सारे मुस्लिम निर्दोष हैं। ये websites ना तो रांची के D.S.P. की ह्त्या में मुस्लिमों को दोषी मानते हैं और ना ही "Operation Batla House" में मारे गए और पकड़े गए लोगों को आतंकवादी। लेकिन अब जब ये स्पष्ट हो गया है कि मारे गए लोग आतंकवादी ही थे और शहीद मोहनचंद शर्मा की मौत उन आतंकवादियों की गोली से ही हुई थी, मीडिया ने इस समाचार को उतना महत्त्व देना उचित नहीं समझा।

अगर देश को इन साम्प्रदायिक दंगों से बचाना है तो सबसे पहले हमें इन दंगों के मूल को ख़त्म करना होगा। दोषी व्यक्ति चाहे जिस किसी भी धर्म का हो, हिन्दू, मुस्लिम या ईसाई, सभी भारतीयों का कर्त्तव्य बनता है कि उसका सामजिक बहिष्कार किया जाए। हम सभ को ये सुनिश्चित करना होगा कि उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिले ताकि फिर कोई व्यक्ति ऐसी ग़लती नहीं करे। तभी हम अपने आने वाली पीढ़ी को एक सुंदर और शांत समाज दे पायेंगे।

हिन्दू-धर्म बहुत ही सहिष्णु है, इसका ये मतलब नहीं है कि इसमें अनंत सहिष्णुता है। किसी भी चीज़ की एक सीमा होती है। मुझे लगता है कि अगर मीडिया और राजनीतिज्ञों का रवैया ऐसे ही पक्षपातपूर्ण रहा तो ऐसे दंगे हमेशा ही होते रहेंगे। और सबसे दुःख की बात तो ये है कि ऐसे दंगों में हमेशा निर्दोष लोग ही मारे जाते हैं।

मैं किसी की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता हूँ। अगर इस Post से किसी को ऐसा लगता है तो मैं माफी चाहता हूँ। मैं बस ये कहना चाहता हूँ कि जिस प्रकार से किसी हिन्दू-संगठन के ग़लत काम की आलोचना सभी लोग (हिन्दू, मुस्लिम...) करते हैं, उसी प्रकार अगर कोई मुस्लिम ग़लत करता है (हाल के बम-ब्लास्ट के घटनाओं को ही लें) तो उसकी आलोचना मुस्लिम लोग भी करें और शहीद मोहनचंद शर्मा का सम्मान भी सभी लोगों से अपेक्षित है। मैंने "Operation Batla House" को ग़लत बताये जाने के कारण हताश होकर ही ये Post लिखा है। मुझे बहुत दुःख हुआ जब किसी भी मुस्लिम या मुस्लिम संगठन ने शहीद मोहनचंद शर्मा के बारे में दो शब्द भी कहना उचित नहीं समझा और ना ही उन आतंकवादियों की आलोचना की। रांची वाले प्रकरण में भी ऐसा ही हुआ था। M. F. Hussain के द्बारा बनाए गए भारत-माता और हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न तस्वीरों की आलोचना कोई भी मुस्लिम या मुस्लिम संगठन नहीं करता है और ना ही मीडिया. धर्म को सिर्फ़ अपने पूजा-पद्धति तक ही सीमित रखा जाना चाहिए. धर्म के नाम पर ग़लत को संरक्षण और सही की आलोचना नहीं होनी चाहिए। जब ऐसा होगा तभी आपस में भाईचारा बढ़ेगा और "भारत-वर्ष" का विकास होगा।

amrendrasingh399's picture

Jai Hind aapki baat main

Jai Hind

aapki baat main bilkul jhooth nahin ki humari media humare logon ko sahi tasveer nahin dikha rahi hai aur humare politician bhi humare desh ko loot ke khane ke liye hi baite hain. yeh sabhi baten hum sabhi ko pata hain aur hum sab bhi acchi tarah se jante hain ki yeh kitna ghatak hai apne desh ki ekata aur akhandata ke liye. Per main sirf ek baaat janna chata hoon ki jab yeh sab kuch hum jante hain to phir hum saamne akar kuch karte kyun nahin. Kya yeh sab chupchap dekhte rehana yeh sabit nahin karta ki hum sab bhi ismain utne hi jimmedar hain jitne ki yeh media wale or politician. Mera kehna sirf itna hai ki jis desh ko Bhagat Singh, Ajad aur Subash jaise jane kitne hi shahidon ne apne khoon se sincha hai hum uski izzat lutte hue aise hi dekhte rahen. Kya sirf kisi site per comment likhne matra se hi humara kartvya poora ho jata hai. Woh bhi us site per jise bahut hi kum log yaniki mere aap jaise hi dekhthe hain. Main sirf yeh kehan chata hoon ki hum sabko ab kuch karna bhi chaiye kyunki agar abhi bhi humane kuch nahin kiya to sayad bahut der na ho jaye mujhe nahin pata kya karna chahiye aur yeh sab kaise karna chahiye.Per hum sab ko ab ek saath aa kar apne desh ko bachane ke liye kuch to karna chahiye. Aap logon main kisi ke pass bhi kuch ideas aur agar kuch suggestion ho kripya unko bhi likho. Khali samsya hi nahin kripye smadhan bhi likhen kyunki mujhe samajh main nahin aata hai ki kis tarah se in sab cheejon ko roka jaye. Mujhe pata hai ki humare desh ki aadhi se jayada janta in sab cheejon ko acche tarike se janti hai.......
sabhi ke man main kahin na kahin desh bhakti to hoti hai jarurat hai to bas use jagane ki....
kripya apne suggestions aur ideas bhi likhen .....
Koi aisa sanghthan khada karna chiye jiska uddesh sirf aur sirf desh ko is cancer se mukt karna hona chahiye.

Bharat Mata Ki Jai

Amrendra Singh
09619201532
Mumbai, Maharastra
Bharat

chandpinu's picture

JAI HIND MERA MANNA HAI K

JAI HIND
MERA MANNA HAI K DESH KA SAARA MIDIA SIRF PIASA BANANAY MAIN LAGA HAI HI FI PARTY MIAN JAANAY KI BEMAARI JO PAD GAYI HAI

bhupender kumar's picture

नमस्ते, नमस

नमस्ते,
नमस्ते,
महोदय मै आपकी बात से सहमत हू कि भरतीय चैनल सही तस्वीर नही दिखते वो सिर्फ अपनी खबरो को परोसते है ये दन्गे भढ्काने का काम करते है चीज निष्पक्ष रूप से दिखनी चाहिये. लेकिन आज दन्गो के रूप मे इन्सानियत का खून हो रहा है ये बन्द होना चाहिये निर्दोश लोग मारे जाते है हमारे प्यारे मां बाप भाई हमारे सामने मार दिये जाते है बहन बेटीयो की िज्जत लूटी जाती है चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान मै ये पूछ्ना चाहता हूं सभी से कि कुछ लोगों द्वारा कि गई गलती कि सजा पूरी बस्ति या पूरे शहर को देना क्या ठीक है

Syndicate content