हिन्दू - एक विडम्बना ।
कितना आश्चर्य है कि जो सबका स्वामी है वह केवल अपनी मूर्खता वश सब्का दास बना हुआ है ! आधुनिक शिक्षा पद्धति ने हिन्दुओं के मन - बुद्धी में अच्छी तरह से ये धारणा बैठा दी है कि हिन्दू धर्म पुरी तरह से कपोल कल्पित है । आधुनिक वैज्ञानिक आविश्कारों से वह पूरी तरह ठगा गया है । जो सत है वो तो उसे असत नजर आ रहा है जो असत है वो सत नजर आ रहा है ! वाह रे माया !!
यह गलत धारणा ही इनके पतन का कारण है ।
हिन्दुओं को चाहिये कि वे गलत धारणा का त्याग करें ।
हिन्दुओं को चाहिये कि वे अच्छई तरह से मान लें कि उनका धर्म सत है और आधुनिक विज्ञान असत । इस सच्ची धरणा को मन में बैठाने से कालांतर में ऐसा अवश्य अनुभव हो जयेगा ।
असत धारणा कितनी ही मजबूत हो जाये पर अन्तत: खत्म होगी व टिक नहीं सकती ! सत धारणा कितनी ही कमज़ोर हो जाये मिट नहीं सकती !! हिन्दू धर्म पुरी तरह से कपोल कल्पित है - जब इस असत धारणा से वही आभास होना शुरु हो गया है तो जो वस्तविक सत है उसे मन - बुद्धि में धारण करने से वैसा अनुभव क्यॊं नही होगा ?
धारणा अष्टांग योग विद्या का एक अंग है । इसमें "मैं देह हूँ", "मैं कर्ता हूँ" इत्यादि गलत धारणाओं को मिटा कर सच्ची धारणाओं को बैठा कर अन्त में उसी वस्तविकता का अनुभव करना होता है । मनुष्यों के स्वभाव व रुचि के अनुसार हिन्दू धर्म में अनेकों योग बताये गये हैं - कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ती योग, हठ योग, राज योग, क्रिया योग, लय योग इत्यादि । योग वास्तव में हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग है । इनमें से किसी एक का भी आचरण करता हुआ मनुष्य अपने स्वरूप का साक्षात्कार कर सर्वोच पद को प्राप्त करलेता है । इतना सब होते हुए भी हिन्दू दास बना हुआ है? क्योकि उसने "सहिष्णुता" कि गलत परिभाषा स्वीकार कर ली है । "सहिष्णुता" का यह अर्थ नही है कि कोई राम-कृष्ण को गाली दे या काल्पनिक कहे तो चुपचाप सह ले ! हिन्दू धर्म कह्ता है कि भगवान का अपमान करने वाले की, अपने में सामर्थ्य होने पर भगवान का अपमान करने वाले की जीभ खीच ले, सामर्थ्य न हो तो कानों में अंगुली डाल वहां से चला जाये ! हां, कोई अपना अपमान करे तो उसे अवश्य सह लेना चाहिये - यही "सहिष्णुता" की सही परिभाषा है । ईश निंदा करने वा सुनने से मनुष्य पाप का भागी होता है । मानव जीवन का लक्ष्य ही भग्वतप्राप्ती है - भगवान की निन्दा में शामिल हो गये तो जीवन का अर्थ ही क्या रह गया? यह सीख वास्तव में हमें मुसल्मानों से लेनी चाहिये - वे सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं पर अल्लाह व कुरान पर कोइ प्रतिकूल टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर सकते !
हिन्दूओं को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि उनका धर्म पूरी तरह से सत है तथा इसमें जो विरोधाभास का अध्यारोप है वह केवल प्रतीति मात्र है अत्यन्त गहरे अधययन से यह प्रतीति निवृत हो जाती है ।
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